रविवार का सदुपयोग – अंश : 155 वाँ


रविवार का सदुपयोग

 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश : 155 वाँ 
 
निम्न और घटिया राजनीति का काला अध्याय: कांग्रेस और उसके समर्थित इंडी एलायंस द्वारा माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की दिवंगत पूज्य माताश्री और राष्ट्र सेवकों पर अशोभनीय, अमर्यादित टिप्पणियां लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली है।
 
भारतीय राजनीति में विचारों का टकराव हमेशा रहा है। लोकतंत्र में असहमति और बहस ही वह ताक़त है जो इसे जीवंत रखती है। लेकिन पिछले कुछ समय में बहस की जगह कटाक्ष ने और तर्क की जगह गाली-गलौज ने ले ली है। यह केवल नेताओं के बीच की लड़ाई नहीं रही, बल्कि निजी जीवन तक उतर चुकी है। ऐसे ही एक क्षण ने पूरे देश को झकझोर दिया जब माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की माँ, हीराबेन के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल सार्वजनिक मंच से किया गया।
 
वह एक चुनावी रैली थी। मंच पर जोश था, भीड़ के नारे थे और भाषणों की गर्मी थी। लेकिन अचानक कुछ ऐसे शब्द निकले जिन्होंने राजनीति की सारी मर्यादा तोड़ दी। आलोचना कीजिए, सरकार से सवाल पूछिए, यह आपका अधिकार है मगर माँ के लिए गाली? यह केवल प्रधानमंत्री जी की माँ का अपमान नहीं था, बल्कि उस भावना पर हमला था जिसे हर भारतीय अपने हृदय में सबसे ऊँचे स्थान पर रखता है। भारत में माँ को ईश्वर का दर्जा दिया जाता है। वह केवल व्यक्ति नहीं, संस्कार है और जब राजनीति उस पवित्रता को भी कुचलने लगे तो यह संकेत है कि वे किस हद तक गिर चुके हैं।
 
उस दिन केवल भाजपा कार्यकर्ता ही आहत नहीं हुए थे, आम नागरिक भी आक्रोशित थे। किसी भी विचारधारा से जुड़ा इंसान यह मानता है कि सत्ता के लिए संघर्ष ज़रूरी है, लेकिन क्या वह इतना निर्मम हो सकता है कि परिवार को निशाना बनाया जाए? आलोचना का अर्थ कभी भी अपमान नहीं होना चाहिए। परंतु राजनीति की भाषा इतनी जहरीली हो गई है कि अब सीमा का कोई अर्थ ही नहीं रह गया।
 
इस घटना के कुछ ही समय बाद, एक और बयान आया जिसने माहौल को और विषाक्त कर दिया। इस बार निशाना गृहमंत्री अमित शाह थे। एक मंच से यह कहा गया कि यदि वे सीमा की रक्षा करने में असफल हों तो उनका सिर काटकर प्रधानमंत्री की मेज़ पर रख देना चाहिए। कल्पना कीजिए… यह कोई गली का झगड़ा नहीं था, बल्कि एक सांसद का बयान था। शब्द अलग थे लेकिन संदेश वही था… व्यक्तिगत हमले, हिंसा और नफरत से भरी राजनीति।
 
दोनों घटनाएँ हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि आखिर यह किस दिशा में जा रही है? क्या राजनीति का मक़सद अब केवल विरोधी को अपमानित करना रह गया है? क्या अब बहस का आधार विचार नहीं बल्कि गाली बन गई है? लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है, लेकिन वह मर्यादित होना चाहिए। जब नेता खुद संयम खो देते हैं तो उनके समर्थक भी वही सीखते हैं। मंच से निकला हुआ हर शब्द भीड़ में गूँजता है और धीरे-धीरे समाज का हिस्सा बन जाता है।
 
माननीय प्रधानमंत्री जी की माँ को अपमानित करना केवल एक परिवार की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं था, यह भारत की सामूहिक संवेदना को ठेस पहुँचाना था। हर इंसान जानता है कि चाहे वह कितना बड़ा व्यक्ति हो जाए, उसके माता-पिता उसकी आत्मा का हिस्सा होते हैं और जब राजनीति इस स्तर तक गिरती है कि उन पुण्य आत्माओं को भी निशाना बनाया जाए, तब यह केवल लोकतंत्र की गिरावट नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं का ह्रास है।
 
अमित शाह के खिलाफ दिया गया बयान भी इसी गिरावट का प्रमाण है। सोचिए, एक लोकतांत्रिक देश में जहाँ शब्दों के ज़रिए शासन चलना चाहिए, वहाँ हिंसा की भाषा क्यों आ रही है? यह सिर्फ़ सत्ता न पाने की हताशा का संकेत नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति के बिगड़ते स्वरूप की चेतावनी है। अगर आज यह शब्द प्रधानमंत्री या गृहमंत्री के लिए कहे जा सकते हैं तो कल कोई भी कार्यकर्ता, कोई भी नेता, कोई भी साधारण नागरिक इसका शिकार हो सकता है। यह ज़हर फैलता है और धीरे-धीरे सबको निगल लेता है।
 
राजनीति का उद्देश्य सत्ता पाना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना है। शब्दों में संयम न केवल एक नेता की गरिमा का हिस्सा है, बल्कि यह जनता को भी मार्गदर्शन देता है कि किस तरह मतभेदों को संभालना चाहिए। जब मंच पर अपमान का तांडव होता है, तो जनता का विश्वास भी टूटने लगता है। लोग सोचने लगते हैं कि क्या अब कोई नेता मुद्दों पर बहस नहीं कर सकता? क्या विकास की चर्चा के बजाय केवल अपशब्द ही बचे हैं?
 
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीति में एक नई मर्यादा रेखा खींचनी होगी। परिवार और निजी जीवन को पूरी तरह राजनीति से बाहर रखना होगा। लोकतंत्र में असहमति का स्थान हमेशा रहेगा, लेकिन यह असहमति व्यक्तिगत नहीं, वैचारिक होनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो आने वाली पीढ़ियाँ राजनीति को नफरत के अखाड़े के रूप में देखेंगी, न कि सेवा के साधन के रूप में।
 
हम सबको यह तय करना होगा कि हम किस तरह की राजनीति चाहते हैं। क्या हम चाहते हैं कि हमारे नेता मुद्दों पर तर्क करें या केवल एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए गाली दें? क्या हम चाहते हैं कि परिवार, माता-पिता, बहन-बेटी को राजनीतिक भाषणों में घसीटा जाए या उन्हें समाज के आदर्श के रूप में सम्मान मिले?
 
यह केवल किसी एक दल की समस्या नहीं है। यह पूरे लोकतंत्र की समस्या है। जब भी कोई नेता इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करता है, चाहे वह किसी भी पार्टी से हो, हमें उसका विरोध करना चाहिए। अगर जनता खामोश रही, तो यह गिरावट और बढ़ेगी।
 
राजनीति की असली शक्ति मर्यादा में है। जो नेता अपनी भाषा पर नियंत्रण रख सकता है, वही सच्चा नेता है। सत्ता आने-जाने वाली चीज़ है, परंतु शब्द इतिहास में दर्ज हो जाते हैं। और इतिहास उन शब्दों को कभी माफ़ नहीं करता, जो माँ के सम्मान को चोट पहुँचाएँ।
 
– क्या आप मानते हैं कि राजनीति में परिवार और व्यक्तिगत जीवन को पूरी तरह बाहर रखना चाहिए?
 
– क्या आप मानते हैं कि अपमानजनक भाषा का विरोध जनता को खुद खड़े होकर करना चाहिए, चाहे वह किसी भी पार्टी से हो?
 
हृदय की कलम से
 
आपका 
धनंजय सिंह खींवसर