रविवार का सदुपयोग - दीपावली विशेष

रविवार का सदुपयोग – दीपावली विशेष
 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश – नौवां
 
दीपावली – संस्कारों से परिपूर्ण त्यौहार 
 
दीपावली का त्यौहार रोशनी के त्योहार के रूप में जाना जाता है।  मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम के लंका विजय के बाद वापस अयोध्या आगमन की खुशी में मनाए जाने वाला यह पर्व मात्र त्यौहार नहीं है बल्कि संस्कारों से परिपूर्ण एक अध्याय है, “दीपावली” के इस पर्व पर यदि हम रामायण और मर्यादा पुरषोत्तम प्रभु “श्रीराम” के व्यक्तित्व और जीवन चरित्र को आत्मसात करेंगे तभी ही इस त्यौहार की सार्थकता साबित होगी। 
 
“प्रभु श्री राम” के जीवन के मूल्यों को आज हमें अंगीकार करने की अवश्यकता है, “रामायण” में जीवन को सार्थक बनाने के अनेकों अनुपम उदाहरण देखने को मिलते है। 
 
वचन निभाने और आज्ञा के अनुपालन की प्रतिबद्धता
 
“रघुकुल रीत सदा चल आई, 
प्राण जाई पर वचन न जाई”
 
प्रभु श्री राम के पिताजी राजा दशरथ ने वचन निभाने के लिए अपने पुत्र को श्री राम को वनवास भेज दिया और प्रभु श्री राम ने अपने पिता की आज्ञा का सम्मान किया। 
 
भाइयों में परस्पर स्नेह 
 
प्रभु श्री राम के अनुज लक्ष्मण और भरत ने भी त्याग की अनुपम मिसाल प्रस्तुत की है, लक्ष्मण जी ने भाई की सेवा में स्वयं को समर्पित कर सब कुछ छोड़कर वनवास में साथ जाने का निर्णय लिया यह भाई के प्रति आदर, स्नेह और सम्मान का उच्चतम मानक है और वहीं दूसरी ओर भरत ने अपने सामने विशाल साम्राज्य की गद्दी होने के बावजूद भी इस सिंहासन पर बैठना तक स्वीकार नहीं किया और पूरे 14 वर्ष अपने बड़े भाई प्रभु श्री राम की खड़ाऊ को सिंहासन पर विराजमान कर एक सेनापति के रूप में शासन चलाया। जब प्रभु श्री राम अयोध्या लौटे तो उनके उनकी पूर्ण आत्मीयता से अपने बड़े भाई का स्वागत किया। 
 
किसी प्रकार का ऊंच नीच का भाव ना होना
 
प्रभु श्री राम के वनवासी जीवन काल से भी हमें काफी शिक्षा मिलती है। जब शबरी उन्हें अपने झूठे बेर खिला रही थी तो वह भी पूरे आनंद के साथ उन झूठे बेरों का लुफ्त उठा रहे थे। इतने बड़े साम्राज्य के राजकुमार होने के बावजूद भी प्रभु श्री राम ने शबरी के झूठे बेर खा कर जाति-पाती, ऊंच-नीच के बंधनों को दरकिनार कर दिया, प्रभु श्री राम के जीवन से प्राप्त यह शिक्षा जीवन को जीने का मूल बताती है की सभी व्यक्ति समान है।
 
आज हम देखते हैं कि छोटे से स्वार्थ के लिए एक भाई दूसरे भाई का दुश्मन बन जाता है। समाज में आए दिन छुआछूत, जाति पाती और ऊंच-नीच की घटनाएं देखने को मिलती है। ऐसे में वर्तमान समय में प्रभु श्री राम के व्यक्तित्व व कृतित्व को अपने जीवन में उतारने की आवश्यकता है। विशेषकर यदि राजनीतिक क्षेत्र में अपने वचन पर अटल रहने, एक दूसरे के प्रति प्रेम, सम्मान और सौहार्द की भावना बनाए रखने जैसे सिद्धांतों को अपनाया जाए तो निश्चित रूप से वर्तमान राजनीति के परिदृश्य को बदला जा सकता है।
 
आइए इस बार की दीपावली पर हम संकल्प ले कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के जीवन चरित्र से प्रेरणा लेकर उनके आदर्शों पर चलने का प्रयास करेंगे।
 
1.क्या आप भी मानते हैं कि दीपावली के पर्व पर हमें राम एवं रामायण के भाव को आत्मसात करना चाहिए ?
 
2. क्या आप भी मेरी इस बात से सहमत हैं कि दीपावली पर्व संस्कारों से परिपूर्ण त्योहार है?
 
हृदय की कलम से ! 
 
आपका 
 
– धनंजय सिंह खींवसर