रविवार का सदुपयोग – अंश - सांतवा

रविवार का सदुपयोग
 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश – सांतवा 
 
उभरते भारत की बदलती तस्वीर 
 
पूरा देश आज आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, आजादी के 75 वर्ष की इस विकास यात्रा में देश को सशक्त एवं मजबूती प्रदान करने में हर भारतीय की अग्रणी भूमिका रही है। आजादी के 75 वर्षों बाद आज जब हम देखते हैं कि भारत देश पूरे विश्व में अपनी एक अलग पहचान रखता है तो हमें भारतीय होने का गर्व होता है, लेकिन आज भी जब हम देखते हैं कि भारत देश में दो तरह के भारत हैं तो मन थोड़ा विचलित हो जाता है।
 
“एक भारत” देश ऐसा है जिसमें रहने वाले प्रत्येक भारतीय के मन में देश के चहुमुखी विकास की संकल्पना है। वह जाति, धर्म, संप्रदाय और ऊंच-नीच जैसी संकीर्ण मानसिकता को त्यागकर सभी को साथ लेकर देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर होते हुए देखना चाहता है।
 
वहीं दूसरी तरफ “एक ऐसा भारत” देश है जहां आज भी अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ और राजनीतिक आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए जाति, धर्म और ऊंच-नीच का भेदभाव को तूल देने का प्रयास किया जा रहा है, जिन जनप्रतिनिधियों के कंधों पर देश के  विकास और विकसित राष्ट्र बनाने की जिम्मेदारी है, वही जनप्रतिनिधि अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को साधने के लिए समाज को जाति और धर्म के आधार पर अलग-अलग बांटने का काम करते हैं। वह नहीं चाहते हैं कि यह लोग एक मंच पर आकर बैठे क्योंकि यदि सभी लोग जाति, धर्म, संप्रदाय के भेद को भुलाते हुए एक मंच पर आकर बैठेंगे तो शायद उनकी राजनीतिक आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं हो पाएगी। 
 
ऐसे में अब निर्णय हम सभी को करना है कि हमें कौन सा भारत चाहिए…?
 
किसी भी परिवर्तन की शुरुआत पहले अपने घर, परिवार, गली, मोहल्ले व समाज से होती है जो धीरे-धीरे प्रदेश और देश को परिवर्तित करती है। वर्तमान परिस्तिथियों में देश को एक और अखंड बनाए रखते हुए विकास के पथ पर आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हम युवाओं की है। हम सभी युवाओं को इसके लिए विचार करना होगा और यदि हमें लगता है कि हम जाति, धर्म, संप्रदाय के आधार पर बने सभी बंधनों को तोड़ते हुए एक मंच पर आ सकते हैं तो मुझे पूरा विश्वास है कि निश्चित रूप से देश में विकास का पहिया दुगनी गति से घूमने लगेगा।
 
आइए आजादी के इस अमृत महोत्सव में हम सभी यह संकल्प लें कि देश में व्याप्त जाति, धर्म, संप्रदाय जैसी कुरीतियों को जड़ से उखाड़ फेकेंगे इंसान-इंसान के बीच कोई खाई नहीं होगी और सभी एक पंक्ति में खड़े होकर  दुनिया को यह संदेश देंगे कि भारत देश न केवल शक्तिशाली राष्ट्र है बल्कि एकजुट भी है।
 
1. क्या आप सोचते हैं की जाति, धर्म, संप्रदाय की बेटियां देश के विकसित राष्ट्र बनाने में बड़ी रुकावट है ?
 
2. क्या आप आजादी के इस अमृत महोत्सव पर सभी नागरिकों को भारतीयता में बंधन में बांधने का प्रयास करेंगे?
 
|| भारत माता की जय ||
 
हृदय की कलम से ! 
 
आपका 
 
– धनंजय सिंह खींवसर