रविवार का सदुपयोग- अंश दूसरा

 

रविवार का सदुपयोग
 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश दूसरा
 
आज के ब्लॉग का विषय 
 
राजनीति में परिवारवाद : एक ही सिक्के के दो पहलू
 
|| पहला पहलू ||
 
राजनीति में परिवारवाद सदैव चर्चा का विषय रहा है, राजनीतिक विश्लेषक असंख्य बार इस विषय को अपने-अपने अनुसार इसकी व्याख्या करते रहें है, मेरा मानना है कि राजनीति में परिवारवाद एक सिक्के के दो पहलू हैं। 
 
राजनीति में परिवारवाद होना कोई नया विषय नहीं है फिर भी यदि बिना किसी मेहनत, कार्य क्षमता, काबिलियत और योग्यता के कोई भी राजनेता अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों को अपने पारिवारिक सदस्यों को सौंपता है तो निश्चित रूप से यह लोकतंत्र के लिए अभिश्राप है। 
 
अतः बिना मेहनत संघर्ष, अनुभव, क्षमता, काबिलियत और योग्यता के राजनीति में परिवारवाद की शून्य स्वीकार्यता होनी चाहिए। 
 
परिवार का राजनीति से जुड़ाव या परिवार का वृहद राजनीतिक इतिहास किसी भी दृष्टिकोण से राजनीतिक में सफलता का परिचायक नहीं है और ना ही होना चाहिए, राजनीतिक परिवार से संबंध स्थान पर व्यक्ति की योग्यता ही इसका एक मात्र मानक होना चाहिए और वर्तमान परिपेक्ष में यह देखा भी जा रहा है।
 
वर्तमान में देखा भी गया है की राजनीति में परिवारवाद को सिरे से नकारा भी जा रहा है और राजनीतिक परिवार के सिर्फ उन सदस्यों की स्वीकार्यता में वृद्धि हुई है जिन्होंने अपने संघर्ष से राजनीतिक मुकाम हासिल किया है जो की लोकतंत्र की खूबसूरती को बढ़ाता है।
 
आप सभी ने देखा होगा आम तौर पर हमेशा सिक्के के इसी एक पहलू जनता के समक्ष पेश किया जाता रहा है, लेकिन आज हम सिक्के के दूसरे पहलू पर बात करेंगे। 
 
|| दूसरा पहलू ||
 
राजनीति के चलते राजनीतिक परिवारवाद को सदैव ही अलग अलग स्तर अपने अनुसार व्याख्या कर परिभाषित किया है, लेकिन इसके इतर यदि बात करें तो सामान्यत: आपने देखा ही की एक चिकित्सक के बेटे को बेहतर चिकित्सक की उपाधि से सुशोभित कर दिया जाता है जिसे वह चिकित्सक पुत्र अपने संघर्ष और मेहनत से समय आने पर सिद्ध भी करता है, ऐसा ही अध्यापक और अधिवक्ता आदि के परिवार के सदस्यों के साथ भी होता हुआ देखा गया है की उनकी जिम्मेदारियों को उनके पुत्र या परिवार से सदस्य संभालते है, ऐसा ही IAS, IPS के अभिभावकों के पुत्रों और पुत्रियों से साथ भी देखा गया है जब परिवार में पहले से इन प्रशासनिक सेवाओं में समर्पित अपने माता पिता को जनता के सेवा करते देख, प्रेरणा लेकर इसी मार्ग को चुनकर कठिन परिश्रम, वर्षों के संघर्ष और परीक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरकर अपनी अगल पहचान बनाते है और ऐसा राजनीतिक परिवार में होना पूर्णतया संभव और स्वाभाविक है।
 
ऐसे अनेकों उदाहरण है जब IAS, IPS, चिकित्सक, शिक्षक, अधिवक्ता आदि के पुत्रों या परिवार के सदस्यों ने अपनी उत्कृष्ट सेवाओं से अपने कौशल को प्रदर्शित किया है और इनकी मेहनत के प्रतिफल की सुंदरता यह भी है की जनता द्वारा इनके संघर्ष और मेहनत को अपने आशीर्वाद से अनुग्रहित किया गया है तथा इन्हें सहर्ष स्वीकार भी किया है और इससे शायद इससे किसी को ऐतराज होना भी नहीं चाहिए।
 
IAS, IPS, चिकित्सक, शिक्षक और अधिवक्ता आदि सभी में एक समानता है कि जिम्मेदारियां संभालने वाला व्यक्ति योग्यता की कसौटी पर परखा और जांचा जाता है, राजनीति में भी कुछ यही हालात है, यदि किसी राजनेता का पुत्र या परिवार का कोई सदस्य अपनी मेहनत, लगन और निष्ठा के साथ आमजन की सेवा करता है, उनके दु:ख दर्द को बांटने का प्रयास करता है और सेवा की राजनीति का माध्यम अपनाता है तो ऐसे परिवार के सदस्यों को राजनीति में निसंदेह जनता की सेवा का अवसर प्राप्त होना चाहिए।
 
राजनीति में परिवारवाद के चलते ऐसे राजनीतिक परिवार के कुछ सदस्य जिन्होंने आरामदायक जीवन व्यापान किया है उन्हें संघर्ष, कठिन परिश्रम, योग्यता और काबिलियत आगे लाती है ना की परिवारवाद।
 
किसी भी सेवाभावी प्रतिभा का राजनीति में सिर्फ राजनीतिक परिवारवाद की वजह से विरोध हो यह पूर्णतया गलत है बल्कि इसके विपरित परिवारवाद के चलते निसंदेह ऐसी प्रतिभाओं को अतिरिक्त संघर्ष और परेशानियों का सामना कर सफलता का शिखर हासिल करना पड़ता है और स्वयं की अलग पहचान बनानी पड़ती है।
 
किसी व्यक्ति को केवल इस आधार पर नकरना की उसके परिवार का कोई सदस्य राजनीतिक क्षेत्र में है भले ही उसने स्वयं ने वर्षों की मेहनत और अविरल, अनथक संघर्ष कर अपना एक मुकाम बनाया हो तो कहीं ना कहीं यह किसी भी प्रतिभाशाली युवा की प्रतिभा को कुचलने के समान होगा।
 
अब आपको तय करना होगा की राजनीति में परिवारवाद की स्वीकार्यता क्या होनी चाहिए? 
 
किसी राजनीतिक परिवार के सदस्य जिसने अपने संघर्ष और मेहनत से एक मुकाम हासिल किया हो क्या उसे जनता की कसौटी पर परखा और जांचा जाना नहीं चाहिए?
 
क्या संघर्ष से परिपूर्ण किसी राजनीति परिवार का सदस्य राजनीति के नए मानक नहीं स्थापित कर सकता है?
 
|| भारत माता की जय ||
 
हृदय की कलम से ! 
 
आपका 
 
– धनंजय सिंह खींवसर