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साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 205वाँ
नेपाल में प्रकृति का प्रकोप, नेपाल के साथ भारत का संबल
हिमालय की गोद में बसा नेपाल केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृतियों, आध्यात्मिक परंपराओं और आत्मीय संबंधों से जुड़ा हुआ देश है। सदियों से दोनों देशों के बीच रिश्ते केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहे, बल्कि संस्कृति, आस्था, परंपरा, भाषा और मानवीय संवेदनाओं ने इस संबंध को गहराई दी है। यही कारण है कि जब नेपाल प्रकृति के किसी प्रकोप से जूझता है, तो उसकी पीड़ा भारत के लिए भी अपनी पीड़ा जैसी ही महसूस होती है। आज जब प्राकृतिक आपदाएँ नेपाल की धरती को झकझोर रही हैं, तब पूरे भारत की संवेदनाएँ नेपाल के साथ खड़ी हैं।
प्रकृति सुंदर है, जीवनदायिनी है, लेकिन जब उसका संतुलन बिगड़ता है तो वही प्रकृति अपना विकराल रूप भी दिखाती है। भूकंप, भूस्खलन, बाढ़, बादल फटना और अतिवृष्टि जैसी आपदाएँ नेपाल के लिए नई नहीं हैं। पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियों के कारण नेपाल प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील रहा है। ऊँचे पर्वत, दुर्गम घाटियाँ, तेज बहाव वाली नदियाँ और बदलता मौसम वहाँ के जनजीवन को बार बार चुनौती देता है। किसी गाँव में अचानक भूस्खलन हो जाता है, कहीं सड़कें टूट जाती हैं, कहीं पुल बह जाते हैं और कहीं घरों में पानी घुस जाता है। कुछ ही क्षणों में वर्षों की मेहनत मिट्टी में मिल जाती है।
ऐसे समय में सबसे अधिक पीड़ा उन परिवारों को होती है, जिन्होंने अपनी आँखों के सामने अपने घर, खेत, पशुधन और जीवन की जमा पूँजी को प्रकृति के प्रहार में खोते देखा है। किसी माँ के लिए अपना घर खोना केवल ईंट और पत्थर खोना नहीं होता, उसमें उसकी स्मृतियाँ, बच्चों की हँसी और वर्षों का संसार बसा होता है। किसी किसान के लिए खेत केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं होता, बल्कि उसकी आजीविका और आने वाली पीढ़ियों की आशा होता है। जब बाढ़ खेतों को बहा ले जाती है या भूस्खलन गाँवों को अपनी चपेट में ले लेता है, तब नुकसान केवल वर्तमान का नहीं होता, भविष्य भी प्रभावित होता है।
प्राकृतिक आपदा के बाद सबसे कठिन समय वह होता है, जब मलबे के बीच जीवन को फिर से खड़ा करना पड़ता है। सड़कें टूट जाती हैं तो राहत पहुँचाना कठिन हो जाता है। संचार व्यवस्था बाधित होती है तो दूर बैठे परिजन अपनों की कुशलता जानने के लिए बेचैन हो उठते हैं। बिजली और पानी की व्यवस्था प्रभावित होती है। अस्पतालों पर दबाव बढ़ जाता है। ऐसे समय में राहत सामग्री से कहीं अधिक मूल्यवान होता है यह विश्वास कि कोई हमारे साथ खड़ा है।
भारत और नेपाल के संबंधों की सबसे सुंदर विशेषता यही है कि संकट की घड़ी में यह अपनापन केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहता। भारत ने समय समय पर नेपाल की प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत और बचाव कार्यों में सहयोग किया है। आवश्यकता पड़ने पर राहत सामग्री, चिकित्सा सहायता, बचाव दल और आवश्यक संसाधनों के माध्यम से सहयोग पहुँचाया गया है। यह सहायता किसी औपचारिकता का हिस्सा भर नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच सदियों पुराने मानवीय रिश्ते की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।
भारत के लिए नेपाल की पीड़ा को समझना इसलिए भी सहज है क्योंकि दोनों देशों की भौगोलिक और सांस्कृतिक निकटता अत्यंत गहरी है। भारत और नेपाल की सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों के बीच सदियों से सामाजिक और पारिवारिक संबंध रहे हैं। दोनों देशों के नागरिक एक दूसरे के यहाँ आते जाते हैं। धार्मिक यात्राएँ होती हैं। पर्व और त्योहार साझा भावनाओं के साथ मनाए जाते हैं। भाषा और खानपान में भी अनेक समानताएँ दिखाई देती हैं। हिमालय की ऊँचाइयों से लेकर तराई के मैदानी क्षेत्रों तक यह रिश्ता अनेक रूपों में दिखाई देता है।
नेपाल भगवान पशुपतिनाथ की भूमि है तो भारत भगवान राम और कृष्ण की पावन स्मृतियों से जुड़ी धरती है। जनकपुर और अयोध्या का संबंध केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि भारत और नेपाल की साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी और भारत की बौद्ध परंपरा भी दोनों देशों को आध्यात्मिक सूत्र में बाँधती है। इस साझा विरासत ने दोनों देशों के बीच एक ऐसा संबंध बनाया है, जिसे केवल राजनीतिक या कूटनीतिक शब्दों में नहीं समझा जा सकता।
इसीलिए नेपाल में जब कोई संकट आता है तो भारत की संवेदनाएँ सीमारेखा पर रुक नहीं जातीं। मानवता की कोई सीमा नहीं होती। दुःख की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती और सहायता का मूल्य इस बात से तय नहीं होता कि पीड़ित व्यक्ति किस देश का नागरिक है। आपदा के सामने मनुष्य सबसे पहले मनुष्य होता है। यही भावना भारत की सनातन परंपरा का भी मूल संदेश है।
हमारी संस्कृति ने सदियों से सिखाया है कि संकट में पड़े व्यक्ति का साथ देना ही सच्ची मानवता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना हमें यह स्मरण कराती है कि पूरा विश्व एक परिवार है। ऐसे में पड़ोसी देश के नागरिकों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील होना केवल सद्भावना नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना का स्वाभाविक विस्तार है।
नेपाल की वर्तमान परिस्थितियाँ हमें एक और महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर ले जाती हैं। प्राकृतिक आपदाएँ अचानक आती दिखाई देती हैं, लेकिन उनके प्रभाव को कम करने की तैयारी लंबे समय से करनी पड़ती है। जलवायु परिवर्तन ने दुनिया के अनेक पर्वतीय और संवेदनशील क्षेत्रों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी की हैं। मौसम का बदलता स्वरूप, अत्यधिक वर्षा, हिमनदों में परिवर्तन और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाएँ हिमालयी क्षेत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं।
हिमालय केवल नेपाल की संपदा नहीं है। यह भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया के लिए जीवन का आधार है। हिमालय से निकलने वाली नदियाँ करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती हैं, खेतों को पानी देती हैं और पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखती हैं। इसलिए हिमालय की सुरक्षा किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं हो सकती।
भारत और नेपाल को मिलकर पर्यावरण संरक्षण, आपदा प्रबंधन, जल संसाधन और पर्वतीय क्षेत्रों के सतत विकास के लिए दीर्घकालिक प्रयास करने होंगे।
विकास आवश्यक है, लेकिन विकास और प्रकृति के बीच संतुलन उससे भी अधिक आवश्यक है। पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कें, भवन और अन्य आधारभूत संरचनाएँ बनाते समय स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखना होगा। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह, जंगलों और पर्वतीय ढलानों के साथ छेड़छाड़ का प्रभाव आने वाले समय में और गंभीर हो सकता है। आपदा के बाद राहत देना आवश्यक है, लेकिन उससे भी आवश्यक है ऐसी व्यवस्था विकसित करना, जो आपदा के प्रभाव को पहले ही कम कर सके।
आपदा प्रबंधन केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। स्थानीय समुदायों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। गाँवों के लोगों को प्राथमिक उपचार, सुरक्षित स्थानों की पहचान, आपातकालीन संचार और बचाव के प्राथमिक उपायों की जानकारी हो तो आपदा के शुरुआती घंटों में अनेक जीवन बचाए जा सकते हैं। विद्यालयों में भी बच्चों को आपदा के समय सुरक्षित रहने के उपायों की शिक्षा दी जानी चाहिए। स्थानीय स्तर पर राहत दल और स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण भविष्य के संकटों में बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
भारत के पास आपदा प्रबंधन और राहत अभियानों का एक व्यापक अनुभव है। नेपाल के साथ इस अनुभव को साझा करना दोनों देशों के लिए लाभकारी हो सकता है। आधुनिक तकनीक, मौसम पूर्वानुमान, उपग्रह आधारित निगरानी, भूस्खलन की चेतावनी और आपातकालीन संचार जैसी व्यवस्थाएँ प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। यदि दोनों देश मिलकर हिमालयी क्षेत्र के लिए मजबूत पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित करें, तो अनेक आपदाओं के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
लेकिन किसी भी तकनीक से अधिक महत्वपूर्ण है मानवीय संवेदना। जब किसी आपदा की तस्वीर सामने आती है तो कुछ क्षणों के लिए पूरा समाज भावुक हो उठता है, लेकिन वास्तविक सहायता केवल भावनाओं से नहीं, निरंतर प्रयासों से पहुँचती है। राहत सामग्री का सही स्थान तक पहुँचना, जरूरतमंदों की पहचान, बच्चों और बुजुर्गों की विशेष देखभाल, स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता और पुनर्वास की व्यवस्था जैसे कार्य लंबे समय तक चलते हैं।
आपदा के बाद पुनर्निर्माण केवल घर बनाने का नाम नहीं है। इसका अर्थ है लोगों को फिर से आत्मनिर्भर बनाना। बच्चों की पढ़ाई दोबारा शुरू हो, किसानों के खेत फिर से तैयार हों, छोटे व्यापारियों को अपना काम शुरू करने में सहायता मिले और प्रभावित परिवारों को सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर मिले, यही वास्तविक पुनर्वास है।
भारत और नेपाल के बीच सहयोग इसी दिशा में और मजबूत हो सकता है। आपदा राहत के साथ साथ दीर्घकालिक पुनर्निर्माण, कौशल विकास, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग प्रभावित समुदायों को अपने पैरों पर खड़ा करने में सहायता कर सकता है। पड़ोसी का हाथ केवल संकट के समय थामना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे फिर से खड़ा होने तक साथ देना भी आवश्यक है।
नेपाल की पीड़ा हमें यह भी याद दिलाती है कि प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता संघर्ष का नहीं, सहअस्तित्व का होना चाहिए। हिमालय हमें धैर्य सिखाता है। नदियाँ हमें निरंतर प्रवाह का संदेश देती हैं और पहाड़ हमें विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रहने की प्रेरणा देते हैं। यदि हम प्रकृति से केवल संसाधन लेने की दृष्टि रखेंगे और उसके संतुलन की चिंता नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि नेपाल की पीड़ा को केवल एक समाचार के रूप में न देखा जाए। इसके पीछे उन परिवारों का दर्द है, जिनकी आँखों में अपने घर को फिर से बसाने का सपना है। उन बच्चों की उम्मीद है, जो अपनी किताबों के साथ फिर विद्यालय लौटना चाहते हैं। उन किसानों की आशा है, जो सूनी जमीन पर फिर हरियाली देखना चाहते हैं। उन माताओं की प्रार्थना है, जो अपने परिवार को सुरक्षित देखना चाहती हैं।
ऐसे समय में भारत का संबल नेपाल के लिए केवल राहत सामग्री या संसाधनों का संबल नहीं, बल्कि विश्वास का संबल भी है। यह विश्वास कि संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, पड़ोसी अकेला नहीं है। भारत और नेपाल के संबंधों की वास्तविक शक्ति इसी भावना में निहित है।
प्रकृति की मार सीमाओं को नहीं पहचानती। भूकंप को यह नहीं मालूम कि सीमा रेखा कहाँ समाप्त होती है। बादल किसी पासपोर्ट की पहचान नहीं करते और नदियाँ किसी राष्ट्र की सीमाओं को देखकर अपना मार्ग बदलती हैं। इसलिए प्राकृतिक आपदाओं से लड़ने के लिए हमारी संवेदनाएँ और हमारी तैयारियाँ भी सीमाओं से परे होनी चाहिए।
नेपाल आज जिस पीड़ा से गुजर रहा है, वह पूरी मानवता के लिए एक संदेश है। प्रकृति के सामने मनुष्य की शक्ति सीमित है, लेकिन मनुष्य की संवेदना असीमित हो सकती है। हम आपदा को रोक नहीं सकते, लेकिन उसके बाद किसी का हाथ थाम सकते हैं। हम टूटे हुए घर को तुरंत नहीं बना सकते, लेकिन उसके पुनर्निर्माण की पहली ईंट रख सकते हैं। हम किसी परिवार का दुःख पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकते, लेकिन उसके दुःख में सहभागी अवश्य बन सकते हैं।
भारत और नेपाल के बीच संबंधों की यही आत्मीयता भविष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। राजनीति बदल सकती है, परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, सीमाओं के आसपास व्यवस्थाएँ बदल सकती हैं, लेकिन सदियों की सांस्कृतिक निकटता और मानवीय रिश्ते इतनी आसानी से नहीं बदलते।
आज जब नेपाल प्रकृति के प्रकोप से जूझ रहा है, तब भारत की ओर से उठने वाला हर सहायता का हाथ यही संदेश देता है कि पड़ोसी केवल सुख में साथ चलने वाला नहीं होता, बल्कि दुःख की घड़ी में सबसे पहले कंधा देने वाला भी होता है।
नेपाल के पर्वत फिर मुस्कुराएँगे। नदियाँ फिर शांत बहेंगी। उजड़े हुए घर फिर बसेंगे। बच्चों की आवाजें फिर विद्यालयों में गूँजेंगी और खेतों में फिर हरियाली लौटेगी। यह विश्वास ही पुनर्निर्माण की पहली सीढ़ी है। और इस विश्वास के साथ भारत का संदेश स्पष्ट है। नेपाल अकेला नहीं है। प्रकृति का प्रकोप चाहे जितना बड़ा हो, मानवीय संवेदना उससे बड़ी है। संकट चाहे जितना गहरा हो, पड़ोसी का संबल उससे मजबूत हो सकता है। भारत और नेपाल का रिश्ता केवल दो देशों के बीच का रिश्ता नहीं, बल्कि दो समाजों, दो संस्कृतियों और करोड़ों दिलों का रिश्ता है। आज नेपाल को इसी आत्मीयता की आवश्यकता है। नेपाल में प्रकृति का प्रकोप है, लेकिन नेपाल के साथ भारत का संबल है।
क्या आप मानते हैं कि प्रकृति से की गई छेड़छाड़ के कारण आज मानव प्राकृतिक आपदाओं का शिकार हो रहा है?
क्या आप मानते हैं कि भारत की वसुधैव कुटुंबकम की नीति भारत के मानवीय दृष्टिकोण के विस्तार में सदैव ही सहायक रही है?
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर