रविवार का सदुपयोग – अंश : 192वाँ

 
रविवार का सदुपयोग
 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश : 192वाँ
 
5 जून 2025 : स्मृतियाँ शेष हैं, एक साल बाद भी आप बहुत याद आती हो “मां”… प्रथम पुण्यतिथि पर अश्रुपूरित नमन।
 
जीवन की सबसे गहरी पीड़ा और सबसे बड़ी रिक्तता का दिन…
 
5 जून… यह दिन मेरे जीवन में केवल एक तारीख नहीं है। यह वह दिन है जिसने मेरे जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। एक ऐसा दिन, जिसे याद करते ही मन भारी हो जाता है, आंखें नम हो जाती हैं और स्मृतियों का एक सैलाब भीतर उमड़ पड़ता है। 5 जून को मां को हमसे बिछड़े हुए पूरा एक वर्ष हो जाएगा, लेकिन सच कहूं तो ऐसा लगता है मानो यह घटना अभी कल ही हुई हो। समय अपनी गति से आगे बढ़ गया, कैलेंडर के पन्ने बदल गए, मौसम बदल गए, लेकिन मां के जाने से जो रिक्तता जीवन में आई, वह आज भी वैसी ही है।
 
मुझे आज भी वह क्षण याद है जब मैं राजकोट में था और जयपुर से मां के निधन का समाचार मिला। जीवन के कुछ पल ऐसे होते हैं जिन्हें इंसान चाहकर भी कभी नहीं भूल सकता, और वह पल मेरे लिए ऐसा ही था। फोन पर मिली उस खबर ने जैसे सब कुछ थाम दिया था। कुछ क्षणों के लिए तो विश्वास ही नहीं हुआ कि यह सच हो सकता है। मन बार-बार यही कह रहा था कि ऐसा नहीं हो सकता, लेकिन सच्चाई सामने थी। उस क्षण ऐसा महसूस हुआ मानो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो। जीवन का सबसे मजबूत सहारा, सबसे सुरक्षित छांव और सबसे बड़ा संबल अचानक दूर हो गया था।
 
कहते हैं कि जब तक मां साथ होती हैं, तब तक जीवन की कितनी भी बड़ी कठिनाई छोटी लगती है। शायद इसलिए क्योंकि हमें भीतर से विश्वास होता है कि कोई है जो हर परिस्थिति में हमारे साथ खड़ा है। लेकिन मां के जाने के बाद पहली बार यह एहसास हुआ कि जीवन में कुछ अभाव ऐसे होते हैं जिन्हें कोई भी भर नहीं सकता। चाहे उम्र कितनी भी हो जाए, चाहे व्यक्ति कितना भी मजबूत क्यों न दिखे, मां के बिना वह कहीं न कहीं भीतर से अधूरा ही रहता है।
 
पिछले एक वर्ष में न जाने कितनी बार ऐसा हुआ जब किसी खुशी के क्षण में सबसे पहले मां याद आईं। कोई अच्छी खबर मिली तो मन ने कहा, “काश मां को बता पाता।” किसी कठिन निर्णय का समय आया तो लगा, “काश मां से सलाह ले पाता।” कई बार अनायास ही मन उनके पास पहुंच गया, लेकिन अगले ही पल वास्तविकता सामने आ गई। यही वे क्षण हैं जो यह अहसास कराते हैं कि मां केवल एक रिश्ता नहीं थीं, वे जीवन का आधार थीं।
 
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो महसूस होता है कि मां ने केवल हमारा पालन-पोषण ही नहीं किया, बल्कि हमारे व्यक्तित्व की नींव भी रखी। उन्होंने हमें संस्कार दिए, संघर्ष करना सिखाया, रिश्तों का महत्व समझाया और जीवन को सकारात्मक दृष्टि से देखने की प्रेरणा दी। उनके लिए परिवार ही उनकी दुनिया था। हमारी खुशियां उनकी खुशियां थीं और हमारे दुख उनकी चिंताएं। उन्होंने अपने जीवन का हर क्षण अपने परिवार के लिए समर्पित कर दिया।
 
मां के जाने के बाद अक्सर यह महसूस हुआ कि घर वैसा ही है, लोग भी वही हैं, लेकिन फिर भी कुछ बहुत महत्वपूर्ण अब वहां नहीं है। घर की दीवारें वही हैं, आंगन वही है, आवाजें भी वही हैं, लेकिन मां के बिना सब कुछ अधूरा-अधूरा सा लगता है। शायद इसलिए कहा जाता है कि मां घर की आत्मा होती हैं। उनके होने से ही घर घर लगता है।
 
बीता हुआ यह एक वर्ष मुझे बहुत कुछ सिखाकर गया है। इसने यह समझाया है कि मां का प्रेम केवल उनकी उपस्थिति तक सीमित नहीं होता। मां शारीरिक रूप से भले हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी सीख, उनके संस्कार और उनका आशीर्वाद हमेशा हमारे साथ रहता है। आज भी जब किसी निर्णय के समय उनके शब्द याद आते हैं, जब किसी परिस्थिति में उनके बताए हुए मार्ग पर चलने का प्रयास करता हूं, तब लगता है कि मां कहीं गई नहीं हैं। वे आज भी हमारे भीतर जीवित हैं।
 
कई बार रात के शांत क्षणों में उनकी यादें मन को घेर लेती हैं। बचपन की बातें, उनकी मुस्कान, उनका स्नेह, उनकी चिंता, उनका इंतजार, उनकी सीख….सब कुछ चलचित्र की तरह आंखों के सामने आ जाता है। तब महसूस होता है कि कुछ रिश्ते कभी समाप्त नहीं होते। उनका स्वरूप बदल जाता है, लेकिन उनका अस्तित्व हमेशा बना रहता है।
 
एक वर्ष बीत जाने के बाद भी मन यह स्वीकार नहीं कर पाता कि अब मां सामने नहीं हैं। शायद यह रिक्तता जीवन भर बनी रहेगी। शायद मां की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती। लेकिन इसी के साथ एक सुकून भी है कि उन्होंने जो मूल्य हमें दिए, जो संस्कार हमें सौंपे और जो प्रेम हमें दिया, वह हमारी सबसे बड़ी धरोहर है। यही धरोहर हमें हर दिन आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
 
आज मां की प्रथम पुण्यतिथि पर हृदय भावनाओं से भरा हुआ है। आंखें नम हैं, लेकिन मन में उनके प्रति असीम श्रद्धा और कृतज्ञता भी है। ईश्वर का धन्यवाद कि उन्होंने मुझे ऐसी मां का स्नेह प्राप्त करने का सौभाग्य दिया। मां का साथ भले सीमित समय के लिए मिला हो, लेकिन उनका प्रभाव जीवन के अंतिम क्षण तक साथ रहेगा।
 
आज भी ऐसा लगता है कि जीवन का एक हिस्सा उनके साथ ही चला गया। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि मां कभी पूरी तरह दूर नहीं जातीं। वे अपने बच्चों की स्मृतियों में, उनके संस्कारों में, उनके विचारों में और उनकी हर सफलता में हमेशा जीवित रहती हैं।
 
मां, एक साल बीत गया है, लेकिन आपकी याद आज भी उतनी ही ताजा है। आपकी कमी आज भी उतनी ही गहरी है। आप हमारे बीच भले प्रत्यक्ष रूप से नहीं हैं, लेकिन आपका स्नेह, आपका आशीर्वाद और आपकी सीख आज भी हमारे जीवन का सबसे मजबूत आधार हैं।
 
आप बहुत याद आती हो मां… और हमेशा आती रहोगी।
 
– क्या आप भी मानते हैं कि मां का स्थान जीवन में कोई नहीं ले सकता, चाहे समय कितना भी बीत जाए?
 
– क्या आपकी मां से जुड़ी कोई ऐसी स्मृति है, जिसे याद करते ही आज भी मन भावुक हो उठता है?
 
हृदय की कलम से
 
आपका 
धनंजय सिंह खींवसर