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साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 190वाँ
वैश्विक संकट के दौर में राष्ट्रधर्म-राष्ट्र प्रथम: आत्मनिर्भर भारत के लिए माननीय प्रधानमंत्री जी की दूरदर्शी अपील
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
भारतीय संस्कृति का यह दिव्य वाक्य केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति समर्पण की वह भावना है जिसने सदियों से भारत की आत्मा को जीवित रखा है। मातृभूमि केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं होती, वह करोड़ों लोगों की आस्था, संघर्ष, त्याग और सपनों का जीवंत स्वरूप होती है। जब भी राष्ट्र किसी कठिन परिस्थिति से गुजरता है, तब केवल सीमाओं पर खड़े सैनिक ही नहीं, बल्कि देश का प्रत्येक नागरिक उसकी शक्ति बनता है। इतिहास गवाह है कि भारत ने हर संकट का सामना अपने सामूहिक साहस और धैर्य से किया है। आज एक बार फिर दुनिया ऐसे ही अस्थिर दौर से गुजर रही है, जहाँ युद्ध, आर्थिक संकट, ऊर्जा असंतुलन और महंगाई ने वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित कर दिया है।
विश्व के कई हिस्सों में चल रहे युद्धों और तनावपूर्ण परिस्थितियों ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। रूस यूक्रेन युद्ध हो या मध्य पूर्व में लगातार बढ़ता संघर्ष, इन परिस्थितियों का प्रभाव केवल सीमित क्षेत्रों तक नहीं रहा। तेल की कीमतों में तेजी, खाद्यान्न संकट, महँगा आयात, संसाधनों की कमी और आर्थिक अस्थिरता जैसी समस्याएँ अब वैश्विक चुनौती बन चुकी हैं। भारत भी इन परिस्थितियों से अछूता नहीं है। एक विकासशील राष्ट्र होने के कारण भारत को भी ऊर्जा, आयात और आर्थिक संतुलन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे समय में केवल सरकारी नीतियाँ ही पर्याप्त नहीं होतीं, बल्कि नागरिकों की जागरूकता, अनुशासन और राष्ट्रहित की भावना भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है।
इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा देशवासियों से की गई अपीलें आज अत्यंत प्रासंगिक और दूरदर्शी प्रतीत होती हैं। उनके संदेश केवल सुझाव नहीं हैं, बल्कि वे भारत को भविष्य के संकटों से सुरक्षित रखने की एक व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। यह समय केवल सुविधाओं और उपभोग का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और संतुलन का समय है। जब देश कठिन दौर से गुजर रहा हो, तब नागरिकों का कर्तव्य केवल अपने हितों तक सीमित नहीं रह सकता। राष्ट्रहित को प्राथमिकता देना ही सच्चा राष्ट्रधर्म बन जाता है।
माननीय प्रधानमंत्री जी ने जहाँ संभव हो, घर से काम करने को प्राथमिकता देने की बात कही है। आधुनिक समय में तकनीक ने जीवन को इतना सक्षम बना दिया है कि अनेक कार्य बिना अनावश्यक यात्रा के भी संभव हो सकते हैं। यदि लोग आवश्यकता के अनुसार घर से काम करने की संस्कृति को अपनाएँ, तो इससे यातायात का दबाव कम होगा, ईंधन की बचत होगी और प्रदूषण में भी कमी आएगी। यह केवल व्यक्तिगत सुविधा का विषय नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों के संरक्षण से जुड़ा हुआ निर्णय है। जब करोड़ों लोग छोटे छोटे स्तर पर बचत को अपनी आदत बना लेते हैं, तब वही बचत राष्ट्र की शक्ति बन जाती है।
आज पेट्रोल और डीजल केवल ईंधन नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता से जुड़ा विषय बन चुके हैं। वैश्विक युद्धों और तनाव के कारण तेल की कीमतों में लगातार उतार चढ़ाव बना हुआ है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए बड़े स्तर पर विदेशी तेल पर निर्भर है। ऐसे समय में यदि नागरिक सार्वजनिक परिवहन को अपनाएँ, अनावश्यक यात्राओं से बचें और ईंधन की बचत को अपनी जिम्मेदारी समझें, तो यह देश के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है। बस, मेट्रो और रेल जैसी सुविधाओं का अधिक उपयोग केवल ट्रैफिक कम करने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने वाला कदम भी है।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा एक वर्ष तक सोना खरीदने से बचने की अपील भी इसी दूरदर्शी सोच का हिस्सा है। भारत दुनिया में सबसे अधिक सोना आयात करने वाले देशों में शामिल है। संकट के समय विदेशी मुद्रा का संरक्षण अत्यंत आवश्यक हो जाता है। यदि अनावश्यक आयात कम हो, तो देश की आर्थिक स्थिति अधिक मजबूत और स्थिर बनी रह सकती है। यह त्याग भले ही व्यक्तिगत स्तर पर छोटा दिखाई दे, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसका प्रभाव अत्यंत व्यापक हो सकता है। कठिन समय में संयम ही सबसे बड़ी समझदारी और परिपक्वता का परिचय देता है।
खाने के तेल के उपयोग में कटौती करने की बात भी केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। भारत बड़ी मात्रा में खाद्य तेलों का आयात करता है और वैश्विक संकट के कारण इनकी कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है। यदि समाज संतुलित उपयोग की आदत अपनाए, तो इससे आयात का दबाव कम होगा और आर्थिक संसाधनों की बचत भी होगी। साथ ही यह नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी सिद्ध होगा। वास्तव में जागरूक समाज वही होता है जो अपनी आवश्यकताओं और अपनी जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना जानता हो।
माननीय प्रधानमंत्री जी ने प्राकृतिक खेती और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने पर भी विशेष बल दिया है। आज वैश्विक परिस्थितियों में खाद और कृषि संसाधनों की उपलब्धता भी प्रभावित हो रही है। ऐसे समय में भारत को अपनी कृषि व्यवस्था को अधिक आत्मनिर्भर बनाना होगा। प्राकृतिक खेती न केवल मिट्टी की गुणवत्ता को बनाए रखती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्वस्थ जीवनशैली की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। हमारी धरती केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है। यदि आज हम प्रकृति का संतुलन बिगाड़ेंगे, तो भविष्य में उसके परिणाम और अधिक गंभीर हो सकते हैं।
स्वदेशी अपनाने का संदेश आज पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। जब भारतीय नागरिक अपने देश में बने उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं, तब वे केवल खरीदारी नहीं करते, बल्कि देश के उद्योगों, व्यापारियों, श्रमिकों और युवाओं के सपनों को भी मजबूती देते हैं। आत्मनिर्भर भारत का वास्तविक अर्थ यही है कि देश अपनी क्षमताओं पर विश्वास करना सीखे। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी लगातार “वोकल फॉर लोकल” का संदेश देते रहे हैं और आज वैश्विक संकट के दौर में यह विचार और अधिक प्रभावी दिखाई देता है। जब स्थानीय उद्योग मजबूत होंगे, तभी भारत वैश्विक चुनौतियों के बीच भी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकेगा।
विदेश यात्राओं में अनावश्यक खर्च से बचने का संदेश भी दूरदर्शी सोच का प्रतीक है। वैश्विक अस्थिरता के समय विदेशी मुद्रा की बचत अत्यंत आवश्यक हो जाती है। साथ ही यदि भारतीय अपने ही देश के पर्यटन स्थलों को प्राथमिकता दें, तो इससे स्थानीय व्यापार, रोजगार और पर्यटन उद्योग को नई ऊर्जा मिलेगी। भारत अपने भीतर इतनी विविधता और समृद्धि समेटे हुए है कि यहाँ का प्रत्येक राज्य अपने आप में एक जीवंत संस्कृति का परिचय देता है। अपने ही देश को जानना और समझना भी राष्ट्रप्रेम का एक सुंदर स्वरूप है।
आज आवश्यकता केवल सरकार से अपेक्षाएँ रखने की नहीं, बल्कि स्वयं जिम्मेदारी निभाने की है। राष्ट्र निर्माण केवल नीतियों से नहीं होता, बल्कि नागरिकों की चेतना और व्यवहार से होता है। जब कोई परिवार बिजली बचाता है, जब कोई युवा स्वदेशी वस्तुओं को अपनाता है, जब कोई किसान प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ता है और जब कोई नागरिक सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देता है, तब वही छोटे छोटे कदम मिलकर एक मजबूत भारत का निर्माण करते हैं।
आज का समय हमें यह भी सिखाता है कि अत्यधिक उपभोग और दिखावे की प्रवृत्ति अंततः समाज को कमजोर ही बनाती है। आधुनिक जीवनशैली में लोग अक्सर आवश्यकता और विलासिता के बीच का अंतर भूल जाते हैं। लेकिन संकट के समय वही समाज मजबूत साबित होता है जो संयम और संतुलन को महत्व देता है। भारतीय संस्कृति सदैव सादगी और संतुलन की संस्कृति रही है। यही कारण है कि कठिन परिस्थितियों में भी भारत ने अपनी आत्मा को कभी कमजोर नहीं होने दिया।
भारत आज विश्व मंच पर एक सशक्त राष्ट्र के रूप में उभर रहा है। पूरी दुनिया भारत की आर्थिक शक्ति, सांस्कृतिक मूल्यों और नेतृत्व क्षमता को नए दृष्टिकोण से देख रही है। लेकिन किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी जनता होती है। यदि नागरिक राष्ट्रहित को अपने जीवन का हिस्सा बना लें, तो कोई भी वैश्विक संकट भारत की प्रगति को रोक नहीं सकता। राष्ट्र की मजबूती केवल बड़े उद्योगों और योजनाओं से नहीं आती, बल्कि आम नागरिकों के अनुशासन और जागरूकता से भी आती है।
युवाओं की भूमिका इस परिवर्तन में सबसे महत्वपूर्ण है। भारत दुनिया का सबसे युवा देश है और यही युवा शक्ति आने वाले भारत का भविष्य तय करेगी। यदि युवा वर्ग आत्मनिर्भरता, नवाचार, ऊर्जा संरक्षण और राष्ट्रहित की भावना को अपने जीवन में उतार ले, तो भारत वैश्विक संकटों के बीच भी मजबूती के साथ आगे बढ़ सकता है। आज का युवा केवल नौकरी पाने तक सीमित नहीं रह सकता, उसे राष्ट्र निर्माण का सहभागी भी बनना होगा।
महिलाएँ भी इस परिवर्तन की आधारशिला हैं। भारतीय परिवारों में संसाधनों के संतुलित उपयोग और बचत में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि महिलाएँ बच्चों में अनुशासन, बचत और राष्ट्रप्रेम के संस्कार विकसित करें, तो आने वाली पीढ़ियाँ अधिक जिम्मेदार और जागरूक बनेंगी। एक मजबूत परिवार ही एक मजबूत राष्ट्र की नींव होता है।
यह समय भय का नहीं, बल्कि जागरूकता और अनुशासन का समय है। वैश्विक संकट हमें यह सिखाता है कि संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग ही भविष्य की सुरक्षा है। यदि आज हम संतुलन और संयम को अपनाएँगे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत तैयार कर सकेंगे।
अंततः राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता, बल्कि करोड़ों नागरिकों की जिम्मेदार सोच, त्याग और अनुशासन से बनता है। जब लोग अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देते हैं, तभी इतिहास बदलता है। आज भारत को भी उसी सामूहिक चेतना की आवश्यकता है, जो हर चुनौती को अवसर में बदलने की क्षमता रखती हो।
आइए हम सभी माननीय प्रधानमंत्री जी की इन अपीलों को केवल शब्दों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ। हम संसाधनों का सम्मान करें, स्वदेशी को अपनाएँ, अनावश्यक उपभोग से बचें और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएँ। यही सच्चा राष्ट्रधर्म है और यही वह मार्ग है जो भारत को हर वैश्विक संकट के बीच भी मजबूत, सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाएगा।
क्या आप मानते हैं कि वैश्विक संकट के इस दौर में प्रत्येक नागरिक की छोटी छोटी जिम्मेदारियाँ भी राष्ट्र को आर्थिक रूप से मजबूत बना सकती हैं?
क्या आप मानते हैं कि आत्मनिर्भरता, संयम और स्वदेशी अपनाने की भावना ही भारत को भविष्य की चुनौतियों से सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी मार्ग है?
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर