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साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 186वाँ
अक्षय तृतीया: अबूझ मुहूर्त का दिव्य संदेश और भारतीय संस्कृति का अमर उत्सव
“अक्षयः पुण्यकालोऽयं दानधर्मप्रवर्धनः।
यत्र कृतं शुभं कर्म तदक्षय्यं भवेद् ध्रुवम्॥”
भारतीय संस्कृति में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होतीं, बल्कि वे जीवन को दिशा देने वाले आध्यात्मिक अवसर होती हैं। अक्षय तृतीया, जिसे कई स्थानों पर आखा तीज भी कहा जाता है, ऐसी ही एक पवित्र तिथि है। ‘अक्षय’ का अर्थ है जो कभी समाप्त न हो, जो निरंतर बढ़ता रहे, और ‘तृतीया’ का अर्थ है शुक्ल पक्ष की तीसरी तिथि। इस दिन किए गए शुभ कर्म, दान, जप, तप, पूजन और संकल्प अक्षय फल प्रदान करते हैं, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। यही कारण है कि यह दिन भारतीय जनमानस में अत्यंत विशेष स्थान रखता है।
भारतीय परंपरा में समय को भी दिव्यता से जोड़ा गया है। हर कार्य के लिए शुभ मुहूर्त देखने की परंपरा है, परंतु अक्षय तृतीया एक ऐसा दिन है जिसे ‘अबूझ मुहूर्त’ कहा जाता है। अबूझ मुहूर्त का अर्थ है ऐसा समय जिसमें बिना किसी ज्योतिषीय गणना के भी कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। यह विश्वास केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था का प्रतीक भी है, जिसने लोगों के जीवन को सरल और व्यवस्थित बनाया। जब हर व्यक्ति बिना किसी बाधा के इस दिन अपने शुभ कार्य प्रारंभ कर सकता है, तो यह दिन उत्सव का रूप ले लेता है।
अक्षय तृतीया का महत्व केवल एक दिन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के दृष्टिकोण को बदलने का संदेश देती है। यह हमें बताती है कि सच्चा ‘अक्षय’ वही है जो भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक हो। धन, संपत्ति, और वैभव क्षणिक हैं, परंतु दान, सदाचार, और पुण्य कर्म ही ऐसे हैं जो अक्षय रहते हैं। यही कारण है कि इस दिन दान का विशेष महत्व माना गया है। अन्नदान, जलदान, वस्त्रदान, और जरूरतमंदों की सहायता को सर्वोच्च पुण्य कार्य माना गया है।
भारतीय संस्कृति में यह दिन कई पौराणिक घटनाओं से भी जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि इसी दिन त्रेता युग का आरंभ हुआ था। इसी दिन भगवान परशुराम का जन्म हुआ था, जिन्हें विष्णु के अवतार के रूप में माना जाता है। महाभारत के अनुसार, इसी दिन वेदव्यास जी ने भगवान गणेश को महाभारत लिखने का कार्य प्रारंभ करवाया था। जैन परंपरा में भी इस दिन का अत्यंत महत्व है, क्योंकि यह भगवान ऋषभदेव के एक वर्ष के निराहार तप के बाद इक्षुरस ग्रहण करने की स्मृति का दिन है, जिसे ‘परम तपस्या की पूर्णता’ के रूप में देखा जाता है।
अक्षय तृतीया का एक सामाजिक पक्ष भी है, जो इसे और भी महत्वपूर्ण बनाता है। भारत के कई क्षेत्रों में इस दिन विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यापार शुरू करना, और अन्य शुभ कार्य किए जाते हैं। क्योंकि इसे अबूझ मुहूर्त माना जाता है, इसलिए किसी पंडित या ज्योतिष से मुहूर्त निकालने की आवश्यकता नहीं होती। यह परंपरा समाज के हर वर्ग को समान अवसर देती है, जिससे आर्थिक और सामाजिक बाधाएं कम होती हैं।
आज के समय में अक्षय तृतीया का एक और रूप सामने आया है, जिसमें लोग इस दिन सोना खरीदना शुभ मानते हैं। यह परंपरा अपेक्षाकृत नई है, परंतु इसका मूल भाव समृद्धि और स्थिरता की कामना से जुड़ा हुआ है। हालांकि, यह समझना आवश्यक है कि अक्षय तृतीया का वास्तविक संदेश केवल भौतिक संपत्ति तक सीमित नहीं है। यदि इस दिन केवल खरीदारी तक ही सीमित रह जाएं, तो हम इसके आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को खो देते हैं।
भारतीय संस्कृति की विशेषता यह है कि वह हर पर्व के माध्यम से जीवन का कोई न कोई गहरा संदेश देती है। अक्षय तृतीया हमें सिखाती है कि सच्ची समृद्धि भीतर से आती है। जब हम दूसरों की सहायता करते हैं, जब हम अपने कर्मों को शुद्ध रखते हैं, और जब हम अपने जीवन में संतुलन बनाए रखते हैं, तभी हम वास्तव में ‘अक्षय’ बनते हैं। यह दिन हमें अपने भीतर झांकने और अपने जीवन को सुधारने का अवसर देता है।
ग्रामीण भारत में अक्षय तृतीया का एक विशेष महत्व है। किसान इस दिन को नई फसल और नए कार्यों की शुरुआत के रूप में देखते हैं। यह प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध को दर्शाता है। जब धरती पर नई हरियाली आती है, तो यह दिन उनके लिए आशा और समृद्धि का प्रतीक बन जाता है। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि हमारा जीवन प्रकृति से कितना जुड़ा हुआ है और हमें उसका सम्मान करना चाहिए।
धार्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो अक्षय तृतीया का दिन तप, संयम और साधना के लिए भी अत्यंत उपयुक्त माना गया है। इस दिन उपवास, जप, ध्यान और पूजा का विशेष महत्व है। यह केवल बाहरी अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि आंतरिक शुद्धि का भी माध्यम है। जब हम अपने मन को शांत करते हैं और अपने विचारों को सकारात्मक बनाते हैं, तब हम वास्तव में इस दिन के महत्व को समझते हैं।
आज के आधुनिक युग में, जहां जीवन की गति बहुत तेज हो गई है, वहां ऐसे पर्व हमें ठहरने और सोचने का अवसर देते हैं। अक्षय तृतीया हमें याद दिलाती है कि जीवन केवल दौड़ने का नाम नहीं है, बल्कि यह समझने का नाम है कि हम क्यों दौड़ रहे हैं। यह दिन हमें अपने मूल्यों और परंपराओं से जोड़ता है, जो हमें एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं।
यदि हम इस दिन के संदेश को अपने जीवन में उतारें, तो यह केवल एक दिन का उत्सव नहीं रहेगा, बल्कि हमारे जीवन का हिस्सा बन जाएगा। जब हम हर दिन को अक्षय तृतीया की भावना के साथ जीते हैं, तो हमारे कर्म, हमारे विचार, और हमारे संबंध सभी अक्षय हो जाते हैं। यही इस दिन का वास्तविक उद्देश्य है।
अंततः, अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं है, बल्कि यह एक विचार है, एक दृष्टिकोण है, जो हमें सिखाता है कि सच्चा धन क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है। यह हमें बताता है कि जो कुछ हम दूसरों के लिए करते हैं, वही वास्तव में हमारे लिए अक्षय बनता है।
– क्या आप मानते हैं कि अक्षय तृतीया का वास्तविक महत्व केवल सोना खरीदने में नहीं, बल्कि दान और पुण्य कर्मों में छिपा है?
– क्या आज के समय में हम अक्षय तृतीया के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संदेश को समझकर उसे अपने जीवन में उतार पा रहे हैं?
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर