
रविवार का सदुपयोग
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 176 वाँ
राष्ट्रनीति स्वर्प्रथम
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
भारत की सभ्यता और राजनीति का मूल भाव सदैव राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का रहा है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में जब आर्थिक प्रतिस्पर्धा, आपूर्ति श्रृंखलाएँ, तकनीकी प्रभुत्व और रणनीतिक साझेदारियाँ विश्व व्यवस्था को आकार दे रही हैं, तब भारत ने संतुलित, आत्मविश्वासी और दूरदर्शी नीति के माध्यम से अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखने का प्रयास किया है। यह दृष्टिकोण केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक विकास, वैश्विक सहयोग और आत्मनिर्भरता के समन्वय में भी दिखाई देता है।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत ने बार बार यह संकेत दिया है कि राष्ट्रीय स्वाभिमान और दीर्घकालिक हित किसी भी तात्कालिक लाभ से अधिक महत्वपूर्ण हैं। हाल के वर्षों में लिए गए निर्णयों में आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, डिजिटल अवसंरचना का विस्तार, वैश्विक निवेश आकर्षण और आपूर्ति शृंखलाओं में भारत की बढ़ती भागीदारी स्पष्ट रूप से इसी सोच को दर्शाती है। इसी क्रम में भारत और अमेरिका के बीच घोषित अंतरिम व्यापार ढाँचा भी देखा जा रहा है, जिसमें टैरिफ में कमी, ऊर्जा सहयोग और व्यापक आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने की दिशा में सहमति बनी है, यद्यपि पूर्ण समझौते के सभी विवरण अभी सामने नहीं आए हैं।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत होने की संभावना व्यक्त की जा रही है और दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक आर्थिक सहयोग का मार्ग प्रशस्त होता दिखाई देता है।
साथ ही यह भी स्पष्ट है कि भारत ने किसी भी वार्ता में अपने संवेदनशील क्षेत्रों और रणनीतिक स्वायत्तता को केंद्र में रखा है, जो राष्ट्र प्रथम की नीति का व्यावहारिक रूप है।
भारत की वैश्विक आर्थिक रणनीति केवल एक देश तक सीमित नहीं रही है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने यूरोप, पश्चिम एशिया और एशिया प्रशांत क्षेत्र के कई देशों व समूहों के साथ व्यापार और निवेश सहयोग को मजबूत किया है। मुक्त व्यापार समझौतों, निवेश साझेदारियों और तकनीकी सहयोग के माध्यम से भारत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी उपस्थिति को व्यापक बनाया है। यह विस्तार केवल निर्यात वृद्धि के लिए नहीं बल्कि विनिर्माण, रोजगार, तकनीकी क्षमता और आपूर्ति शृंखला सुरक्षा को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से भी जुड़ा हुआ है।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की कूटनीति की एक प्रमुख विशेषता संतुलन रही है। एक ओर विकसित देशों के साथ रणनीतिक और आर्थिक सहयोग को गहराई दी गई, वहीं दूसरी ओर वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ विश्वास और साझेदारी को भी मजबूत किया गया। यही संतुलन भारत को आज एक विश्वसनीय, स्थिर और संवाद समर्थ शक्ति के रूप में स्थापित करता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की सक्रिय भूमिका, बहुपक्षीय सहयोग की वकालत और वैश्विक संकटों में मानवीय दृष्टिकोण इसी व्यापक राष्ट्रनीतिक सोच को दर्शाते हैं।
राष्ट्र प्रथम की नीति केवल सरकार की योजनाओं से पूर्ण नहीं होती, बल्कि नागरिक सहभागिता से ही उसका वास्तविक प्रभाव दिखाई देता है। जब समाज स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देता है, कर व्यवस्था का ईमानदारी से पालन करता है, सामाजिक सद्भाव बनाए रखता है और राष्ट्र निर्माण के कार्यों में सहभागी बनता है, तब राष्ट्रनीति एक जीवंत शक्ति बनती है। भारत की विकास यात्रा में जनभागीदारी को विशेष महत्व दिया गया है और यही कारण है कि अनेक अभियानों ने जन आंदोलन का रूप लिया है।
आने वाले समय में भारत के सामने अवसर और चुनौतियाँ दोनों हैं। वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की क्षमता, तकनीकी नवाचार में अग्रणी भूमिका, निर्यात आधारित विकास मॉडल और युवाओं के लिए व्यापक रोजगार सृजन जैसी प्राथमिकताएँ भारत की दिशा तय करेंगी। हाल के व्यापारिक और रणनीतिक समझौते इस भविष्य की आधारशिला के रूप में देखे जा सकते हैं, बशर्ते उन्हें संतुलित और दूरदर्शी तरीके से लागू किया जाए।
अंततः राष्ट्रनीति स्वर्प्रथम केवल एक नारा नहीं बल्कि आधुनिक भारत की कार्यशैली का सार है। दृढ़ नेतृत्व, स्पष्ट दृष्टि और राष्ट्रहित के प्रति समर्पण के साथ भारत ने यह दिखाया है कि बदलती विश्व व्यवस्था में भी अपनी पहचान, स्वाभिमान और हितों की रक्षा करते हुए प्रगति की जा सकती है। यही सोच भारत को न केवल आर्थिक शक्ति बल्कि नैतिक और रणनीतिक नेतृत्व की दिशा में भी आगे बढ़ाती है।
क्या आप मानते हैं कि भारत और अमेरिका के बीच उभरता व्यापार ढाँचा दीर्घकाल में भारत की आर्थिक स्थिति को मजबूत करेगा।
क्या आपको लगता है कि राष्ट्र प्रथम की नीति ही भारत को वैश्विक नेतृत्व की दिशा में स्थायी रूप से आगे ले जा सकती है।
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर