
रविवार का सदुपयोग
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 169 वाँ
25 दिसम्बर – अत्यंत विशेष दिवस: मेरे प्रेरणास्रोत श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी तथा मेरे परम आदरणीय पिताजी श्री गजेन्द्र सिंह खींवसर का जन्मदिन
“हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा,
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ, गीत नया गाता हूँ…”
– श्रद्धेय श्री अटल बिहारी वाजपेयी
सार्वजनिक जीवन में कुछ तिथियाँ ऐसी होती हैं जो केवल कैलेंडर के पन्नों पर अंकित अंक नहीं होतीं, बल्कि वे हमारे अस्तित्व और हमारे संकल्पों का प्रतिबिंब बन जाती हैं। मेरे लिए 25 दिसम्बर एक ऐसी ही तिथि है। यह दिन दो ऐसे व्यक्तित्वों के जन्मोत्सव का संगम है जिन्होंने मेरे जीवन के कैनवास में आदर्शों के रंग भरे हैं। एक ओर भारतीय राजनीति के देदीप्यमान नक्षत्र, ओजस्वी वक्ता, कवि हृदय और हम सबके मार्गदर्शक भारत रत्न श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्मदिवस है, तो दूसरी ओर मेरे जीवन के प्रथम गुरु, मेरे संबल और मेरे परम आदरणीय पिताजी श्री गजेन्द्र सिंह खींवसर का भी जन्मदिवस है। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो पाता हूँ कि मेरे व्यक्तित्व की निर्मिति में इन दोनों विभूतियों का योगदान अपरिमेय है।
अटल बिहारी वाजपेयी जी केवल एक प्रधानमंत्री या एक दल के नेता नहीं थे, वे भारतीय लोकतंत्र की उस मर्यादा के रक्षक थे जिसे उन्होंने अपने पूरे जीवन से सींचा था। अटल जी का व्यक्तित्व हिमालय की भाँति विशाल और गंगा की भाँति पवित्र था। उन्होंने हमें यह सिखाया कि राजनीति संभावनाओं का खेल होने के साथ-साथ सिद्धांतों की एक कठिन परीक्षा भी है। जब वे संसद में खड़े होकर बोलते थे, तो केवल उनके पक्ष के लोग ही नहीं, बल्कि विपक्ष के धुर विरोधी भी उनकी तर्कशक्ति और शब्दों के चयन के कायल हो जाते थे। उनका अजातशत्रु होना इस बात का प्रमाण था कि राजनीति में बिना किसी के प्रति द्वेष रखे भी वैचारिक युद्ध जीता जा सकता है। उन्होंने गठबंधन की राजनीति को एक नई दिशा दी और यह सिद्ध किया कि विभिन्न विचारधाराओं के मेल से भी राष्ट्रहित का साझा मार्ग निकाला जा सकता है। पोखरण का परमाणु परीक्षण हो या अन्य योजनाएँ….अटल जी ने सदा आधुनिक भारत की नींव को मजबूत करने का कार्य किया।
पिताजी श्री गजेन्द्र सिंह खींवसर के सानिध्य में मैंने सार्वजनिक जीवन की उन बारीकियों को सीखा है जो किसी भी पुस्तक या विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाई जा सकतीं। एक राजनीतिज्ञ के लिए उसका क्षेत्र और वहाँ की जनता ही उसका परिवार होती है, यह सीख मुझे पिताजी से विरासत में मिली है। मैंने उन्हें वर्षों तक लोगों की समस्याओं को धैर्यपूर्वक सुनते और उनके समाधान के लिए तत्पर देखा है। उनके लिए राजनीति कभी भी व्यक्तिगत लाभ का साधन नहीं रही, बल्कि उन्होंने इसे सदैव समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति की सेवा का माध्यम माना। पिताजी का जीवन सादगी और शुचिता का एक जीवंत उदाहरण है। उन्होंने मुझे सिखाया कि जनसेवा के मार्ग पर चलते हुए सत्ता की चकाचौंध से कहीं अधिक महत्वपूर्ण जनता का अटूट विश्वास और प्रेम है। उनके अनुशासन और उनकी कार्यशैली ने मेरे भीतर उस उत्तरदायित्व की भावना को जगाया है जो आज मेरे हर निर्णय का आधार बनती है।
जब मैं इन दोनों महान व्यक्तित्वों के जीवन को देखता हूँ, तो मुझे एक अद्भुत समानता दिखाई देती है। दोनों ने ही अपने-अपने स्तर पर नैतिकता को राजनीति से ऊपर रखा। अटल जी ने जहाँ वैश्विक पटल पर भारत का मस्तक ऊँचा किया, वहीं पिताजी ने जमीनी स्तर पर सेवा की नई परिभाषाएँ गढ़ीं।
आज की बदलती राजनीति में जहाँ मूल्य और मर्यादाएँ अक्सर हाशिए पर धकेल दी जाती हैं, वहाँ अटल जी के विचार और पिताजी के संस्कार मेरे लिए प्रकाश स्तंभ की भाँति कार्य करते हैं। 25 दिसम्बर केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि स्वयं को उन महान उद्देश्यों के प्रति पुनः समर्पित करने का दिन है। लोक कल्याण की इस कठिन डगर पर चलते हुए, मैं सदैव इन दोनों की शिक्षाओं को अपना पाथेय बनाकर आगे बढ़ने का संकल्प लेता हूँ।
अटल जी के काव्य में जो राष्ट्रवाद था और पिताजी के कर्मों में जो संकल्पबद्धता है, उन दोनों का समन्वय ही मेरे जीवन का मूल मंत्र है। मैं इस गौरवशाली विरासत को पूरी ईमानदारी और अटूट निष्ठा के साथ आगे ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हूँ।
क्या आप मानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी जी जैसे विचारशील, दूरदर्शी महापुरुष आज भी जन-जन के प्रेरणास्त्रोत हैं?
क्या आप मानते हैं कि पिता से मिले संस्कार ही किसी व्यक्ति को सार्वजनिक जीवन में विश्वसनीय, संवेदनशील और वैचारिक रूप से मजबूत बनाते हैं?
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर