रविवार का सदुपयोग – अंश : 208वाँ

 

रविवार का सदुपयोग
 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश : 208वाँ
 
गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक: आस्था, परंपरा और 10 दिवसीय गणेशोत्सव का महत्व
 
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभकार्येषु सर्वदा॥
 
भारत की संस्कृति में त्योहार केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं होते। ये हमारे जीवन का वह हिस्सा हैं, जिनमें परिवार, आस्था, परंपरा और भावनाएं एक साथ दिखाई देती हैं। त्योहार आते हैं तो घर का वातावरण अपने आप बदल जाता है। सुबह की शुरुआत पूजा की घंटियों से होती है, रसोई से पकवानों की खुशबू आने लगती है, बच्चे उत्साह से तैयार होते हैं और बड़े बुजुर्ग अपनी परंपराओं और मान्यताओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने लगते हैं। गणेश चतुर्थी भी ऐसा ही पर्व है, जिसमें भगवान गणेश की भक्ति के साथ परिवार और समाज को जोड़ने वाली अनेक भावनाएं जुड़ी हुई हैं।
 
भगवान गणेश को भारतीय परंपरा में प्रथम पूज्य माना गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले गणेशजी का स्मरण करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। माना जाता है कि गणेशजी विघ्नों को दूर करने वाले और बुद्धि तथा विवेक प्रदान करने वाले देवता हैं। इसलिए गणेश चतुर्थी केवल गणेशजी की पूजा करने का दिन नहीं है, बल्कि यह अपने जीवन में शुभता, सकारात्मकता और विवेक का स्वागत करने का भी अवसर है।
 
गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन घरों, मंदिरों और सार्वजनिक पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। कहीं गणेशजी एक छोटे से पूजा स्थल में विराजते हैं तो कहीं बड़े और भव्य पंडालों में उनकी स्थापना होती है। फूलों से सजावट होती है, पूजा की तैयारियां होती हैं और पूरा वातावरण गणपति बप्पा के जयकारों से गूंजने लगता है।
 
गणेशजी की स्थापना का समय घर के लिए बहुत विशेष होता है। प्रतिमा को श्रद्धा के साथ घर में लाया जाता है और शुभ मुहूर्त में पूजा करके उन्हें विराजमान किया जाता है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर पूजा करते हैं। गणेशजी को दूर्वा, फूल, मोदक और अन्य प्रसाद अर्पित किए जाते हैं। आरती के समय जब परिवार के सभी लोग एक साथ खड़े होकर गणेशजी की आरती करते हैं, तब वह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह जाता। वह परिवार के साथ होने का एक सुंदर अवसर बन जाता है।
 
गणेशजी को मोदक प्रिय माना जाता है और इसलिए गणेश चतुर्थी पर मोदक बनाने की परंपरा विशेष महत्व रखती है। भारतीय घरों में मां या दादी के हाथों से बने मोदक की अपनी ही खुशबू और स्वाद होता है। कई घरों में बच्चे उत्सुकता से देखते हैं कि मोदक कैसे बन रहे हैं। पहला मोदक भगवान को अर्पित करने के बाद जब परिवार के लोग उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं, तो वह स्वाद भी एक याद बन जाता है।
 
यही छोटी छोटी चीजें हमारे त्योहारों को खास बनाती हैं। किसी के लिए गणेश चतुर्थी पूजा का पर्व है, किसी के लिए घर में खुशियां आने का अवसर और किसी के लिए बचपन की खूबसूरत यादों को दोबारा जीने का मौका। वास्तव में भारतीय त्योहारों की सुंदरता यही है कि वे हर उम्र के व्यक्ति को अपने साथ जोड़ लेते हैं।
 
गणेश चतुर्थी के साथ गणेशोत्सव की परंपरा भी जुड़ी हुई है। सामान्य रूप से गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक चलने वाले उत्सव को दस दिवसीय गणेशोत्सव कहा जाता है। हालांकि हर परिवार में गणेशजी को रखने की अवधि एक जैसी नहीं होती। कहीं डेढ़ दिन, कहीं तीन दिन, पांच दिन या सात दिन तक गणेशजी विराजते हैं। कई स्थानों पर पूरे दस दिनों तक गणेशोत्सव मनाया जाता है।
 
इसलिए जब हम दस दिवसीय गणेशोत्सव की बात करते हैं, तो उसका अर्थ यह समझना जरूरी है कि यह एक ऐसी धार्मिक और सांस्कृतिक यात्रा है जो गणेश चतुर्थी के दिन गणेशजी के आगमन से शुरू होती है और अनंत चतुर्दशी के दिन उनके विसर्जन के साथ पूर्ण होती है। इन दिनों में भक्तिभाव धीरे धीरे बढ़ता है और अंत में गणेशजी को भावपूर्ण विदाई दी जाती है।
 
 
भगवान गणेश का स्वरूप भी अपने आप में बहुत कुछ सिखाता है। उनका बड़ा मस्तक हमें व्यापक सोच और ज्ञान की प्रेरणा देता है। उनके बड़े कान अधिक सुनने और धैर्य रखने की सीख देते हैं। छोटी आंखें एकाग्रता का संदेश देती हैं। उनका बड़ा पेट जीवन की परिस्थितियों को सहजता से स्वीकार करने की क्षमता का प्रतीक माना जाता है।
 
गणेशजी की सूंड भी हमें परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने की सीख देती है। सूंड मजबूत भी होती है और अत्यंत सूक्ष्म कार्य करने में सक्षम भी। इसी तरह जीवन में कभी कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं और कभी बहुत संवेदनशीलता के साथ किसी परिस्थिति को संभालना पड़ता है। गणेशजी का स्वरूप हमें संतुलन का महत्व समझाता है।
 
उनका वाहन मूषक भी एक गहरा संदेश देता है। मूषक को चंचल मन और इच्छाओं का प्रतीक माना जाता है। गणेशजी का उसके ऊपर विराजमान होना इस बात का संकेत माना जाता है कि मनुष्य को अपनी इच्छाओं और चंचलता पर नियंत्रण रखना चाहिए। इच्छाएं हमारे जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन जब इच्छाएं ही हमारे निर्णय लेने लगें तो परेशानी शुरू हो सकती है।
 
गणेशजी को बुद्धि और विवेक का देवता भी माना जाता है। इसलिए गणेश चतुर्थी पर हम केवल यह प्रार्थना न करें कि हमारे जीवन में कोई बाधा न आए। हम यह भी प्रार्थना कर सकते हैं कि जब जीवन में कठिनाइयां आएं तो हमें उन्हें समझने और उनका सामना करने की बुद्धि मिले। क्योंकि जीवन में हर व्यक्ति के सामने किसी न किसी रूप में बाधाएं आती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि हम उन बाधाओं के सामने अपना धैर्य और विवेक न खोएं।
 
गणेशोत्सव का सामाजिक महत्व भी बहुत बड़ा है। सार्वजनिक गणेश पंडालों में अलग अलग परिवारों के लोग एक साथ आते हैं। आरती में सभी शामिल होते हैं और प्रसाद भी सभी को मिलता है। इससे सामाजिक मेलजोल बढ़ता है और लोगों में एक दूसरे के प्रति अपनापन पैदा होता है।
 
गणेशोत्सव की सार्वजनिक परंपरा को विशेष रूप से महाराष्ट्र में व्यापक पहचान मिली और समय के साथ यह देश के अनेक हिस्सों तक पहुंची। आज राजस्थान सहित भारत के कई राज्यों में गणेश चतुर्थी बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है। कहीं छोटे स्तर पर घरों में स्थापना होती है तो कहीं बड़े पंडाल लगाए जाते हैं। स्थान और शैली अलग हो सकती है, लेकिन श्रद्धा का भाव एक जैसा रहता है।
 
गणेशोत्सव का एक महत्वपूर्ण पक्ष पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ा है। भगवान गणेश की प्रतिमा जब प्राकृतिक मिट्टी से बनाई जाती है तो वह प्रकृति के साथ हमारे संबंध की याद दिलाती है। आज पर्यावरण को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, इसलिए गणेशोत्सव को भी पर्यावरण के अनुकूल तरीके से मनाने की आवश्यकता है।
 
मिट्टी की प्रतिमा का उपयोग, प्राकृतिक रंगों को प्राथमिकता देना और विसर्जन के लिए उचित व्यवस्था करना ऐसे छोटे कदम हैं, जिनसे हम अपनी धार्मिक परंपरा का सम्मान करते हुए प्रकृति का भी ध्यान रख सकते हैं। आखिरकार हमारी संस्कृति हमें प्रकृति को पूजनीय मानना सिखाती है। इसलिए किसी भी धार्मिक उत्सव की खुशी प्रकृति की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
 
गणेशजी की स्थापना के बाद धीरे धीरे घर के लोगों का उनसे भावनात्मक जुड़ाव भी बढ़ने लगता है। रोज सुबह उठकर दर्शन करना, फूल चढ़ाना, पूजा करना और शाम को आरती करना दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाता है। कुछ ही दिनों में ऐसा लगता है जैसे घर में कोई विशेष अतिथि नहीं बल्कि परिवार का ही कोई सदस्य विराजमान है।
 
इसीलिए जब अनंत चतुर्दशी का दिन नजदीक आता है तो वातावरण में उत्साह के साथ भावुकता भी दिखाई देने लगती है। जिस गणेशजी का कुछ दिन पहले बड़े प्रेम से स्वागत किया गया था, अब उन्हें विदा करने का समय आता है। परिवार के सदस्य पूजा करते हैं, आरती उतारते हैं और उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे अगले वर्ष फिर उसी प्रेम और श्रद्धा के साथ घर में आएं।
 
विसर्जन के समय “गणपति बप्पा मोरया” के जयकारे पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं। बच्चों में उत्साह होता है तो बड़ों की आंखों में कई बार भावुकता भी दिखाई देती है। गणेशजी को विदा करते समय मन में एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है। आखिर कुछ दिनों तक जिनके सामने रोज दीपक जलाया, फूल चढ़ाए और आरती की, अब उन्हें विदा करना आसान नहीं होता।
 
लेकिन शायद विसर्जन की परंपरा इसी भाव को समझाने के लिए भी है। मिट्टी से बनी प्रतिमा कुछ समय हमारे बीच रहती है और फिर उसी प्रकृति में विलीन हो जाती है, जिससे उसका निर्माण हुआ था। यह हमें याद दिलाती है कि जीवन में हर चीज स्थायी नहीं है। मिलना है तो बिछड़ना भी होगा और शुरुआत है तो किसी न किसी रूप में उसका अंत भी होगा।
 
भारतीय दर्शन में परिवर्तन को जीवन का स्वाभाविक हिस्सा माना गया है। गणेशजी का विसर्जन इसी परिवर्तन को सहजता से स्वीकार करने का एक सुंदर अवसर बन सकता है। गणेशजी की प्रतिमा हमारे सामने नहीं रहती, लेकिन उनसे जुड़ी आस्था हमारे मन में बनी रहती है। यही इस परंपरा की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
 
अनंत चतुर्दशी का धार्मिक महत्व भी विशेष है। यह दिन गणेश विसर्जन के लिए प्रसिद्ध होने के साथ भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की उपासना से भी जुड़ा हुआ है। कई परिवारों में इस दिन अनंत भगवान की पूजा की जाती है और अनंत सूत्र धारण करने की परंपरा भी निभाई जाती है। इस प्रकार एक ही दिन भारतीय धार्मिक परंपरा की विभिन्न मान्यताएं दिखाई देती हैं।
 
हमारे त्योहारों की खूबसूरती यही है कि उनके भीतर अनेक परंपराएं एक साथ सांस लेती हैं। एक ही पर्व किसी परिवार के लिए पूजा का अवसर हो सकता है, किसी दूसरे के लिए सामूहिक उत्सव और किसी तीसरे परिवार के लिए पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को निभाने का अवसर।
 
यही कारण है कि त्योहारों को केवल रस्म की तरह नहीं मनाना चाहिए। उनके पीछे छिपे अर्थ को समझना भी उतना ही जरूरी है। जब कोई बच्चा अपनी दादी से गणेशजी की कथा सुनता है, अपनी मां को मोदक बनाते देखता है, पिता के साथ पूजा की तैयारी करता है और परिवार के साथ आरती करता है, तो वह अपनी संस्कृति को केवल सुन नहीं रहा होता बल्कि उसे जी रहा होता है।
 
भारतीय परिवारों में संस्कार इसी तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचते हैं। हर बात किताबों से नहीं सीखी जाती। कुछ बातें घर के वातावरण से अपने आप सीख ली जाती हैं। पूजा के समय हाथ जोड़ना, बड़ों का आशीर्वाद लेना, प्रसाद सबके साथ बांटना और त्योहार पर जरूरतमंदों की सहायता करना भी संस्कारों का हिस्सा है।
 
गणेशोत्सव हमें यह भी सिखाता है कि भक्ति केवल मंदिर जाने या पूजा करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि गणेशजी को बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है तो उनकी पूजा का एक अर्थ यह भी है कि हम अपने व्यवहार में विवेक लाएं। यदि उन्हें विघ्नहर्ता कहा जाता है तो हम दूसरों के जीवन की बाधाएं कम करने का प्रयास भी कर सकते हैं।
 
किसी जरूरतमंद की मदद करना, किसी दुखी व्यक्ति की बात सुनना, परिवार के किसी सदस्य के साथ प्रेम से व्यवहार करना या किसी से नाराजगी होने पर अहंकार छोड़कर बात कर लेना भी अपने आप में एक अच्छी शुरुआत हो सकती है। भगवान के सामने दीपक जलाने के साथ यदि हमारे व्यवहार में भी थोड़ी रोशनी आ जाए, तो त्योहार का उद्देश्य और सार्थक हो जाता है।
 
गणेश चतुर्थी पर जब गणेशजी हमारे घर में आते हैं तो हम उनसे सुख, समृद्धि और सफलता की प्रार्थना करते हैं। यह स्वाभाविक भी है। हर व्यक्ति चाहता है कि उसका परिवार खुश रहे, बच्चों का भविष्य अच्छा हो और जीवन में परेशानियां कम हों। लेकिन इसके साथ हम यह भी मांग सकते हैं कि हमें सही निर्णय लेने की बुद्धि मिले, कठिन समय में धैर्य मिले और सफलता मिलने पर अहंकार न आए।
 
वास्तव में गणेशजी की पूजा का यही भाव सबसे सुंदर है। जीवन में केवल बाधाओं का समाप्त होना ही जरूरी नहीं है। कई बार बाधाएं हमें मजबूत बनाती हैं और हमें कुछ नया सिखाती हैं। इसलिए हमें ऐसी बुद्धि चाहिए कि हम हर परिस्थिति से कुछ अच्छा सीख सकें।
 
गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक की दस दिवसीय यात्रा इसी कारण विशेष बन जाती है। शुरुआत गणेशजी के स्वागत से होती है। फिर पूजा, आरती, प्रसाद और परिवार के साथ बिताए गए समय के माध्यम से भक्ति गहरी होती जाती है। अंत में विसर्जन के समय मन में भावुकता आती है, लेकिन साथ ही यह विश्वास भी रहता है कि गणेशजी अगले वर्ष फिर आएंगे।
 
“गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ” का जयकारा इसी भावना को व्यक्त करता है। इसमें विदाई का दुख भी है और दोबारा मिलने की उम्मीद भी। शायद यही उम्मीद त्योहार को हर वर्ष नया बना देती है।
 
आज जब जीवन बहुत तेज हो गया है, ऐसे त्योहार हमें कुछ समय रुकने का अवसर देते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि जीवन केवल काम, पढ़ाई, नौकरी और जिम्मेदारियों का नाम नहीं है। जीवन में परिवार के साथ बैठना, परंपराओं को समझना, ईश्वर को याद करना और अपने भीतर झांकना भी जरूरी है।
 
गणेशोत्सव की सबसे बड़ी खूबसूरती शायद यही है कि इसमें भक्ति और परिवार दोनों साथ चलते हैं। घर में गणेशजी की स्थापना होती है तो बच्चे खुश होते हैं, बड़े पूजा करते हैं और बुजुर्ग अपनी परंपराओं की बातें बताते हैं। कुछ दिनों के लिए घर में एक ऐसा वातावरण बनता है जिसमें हर पीढ़ी की अपनी भूमिका होती है। और फिर अनंत चतुर्दशी आती है। गणेशजी की विदाई होती है। प्रतिमा जल में विलीन हो जाती है, लेकिन घर में बिताए वे दिन स्मृति बनकर रह जाते हैं। पूजा की घंटियां शायद बंद हो जाती हैं, लेकिन मन में गणेशजी का नाम बना रहता है। मोदक खत्म हो जाते हैं, लेकिन उनका स्वाद याद रहता है। सजावट उतर जाती है, लेकिन परिवार के साथ बिताए हुए पल लंबे समय तक याद रहते हैं।
 
यही भारतीय संस्कृति की खासियत है। यहां त्योहार समाप्त होकर भी पूरी तरह समाप्त नहीं होते। वे हमारे अनुभवों, यादों और संस्कारों का हिस्सा बन जाते हैं। अगले वर्ष जब गणेश चतुर्थी फिर आती है तो पुरानी यादें फिर ताजा हो जाती हैं और घर में एक बार फिर वही उत्साह लौट आता है।
 
इसलिए गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक का पर्व केवल दस दिनों का धार्मिक उत्सव नहीं है। यह परिवार के साथ समय बिताने, अपनी परंपराओं को समझने, बच्चों को संस्कार देने, समाज से जुड़ने और जीवन के मूल्यों को याद करने का अवसर है।
 
गणेशजी का आगमन हमें खुशी देता है। उनका साथ हमें भक्ति से जोड़ता है और उनका विसर्जन हमें परिवर्तन को स्वीकार करने की सीख देता है। प्रतिमा भले ही जल में विलीन हो जाती है, लेकिन यदि गणेशजी की सीख हमारे जीवन में बनी रहती है तो उनकी उपस्थिति हमारे भीतर हमेशा बनी रहती है।
 
इस गणेश चतुर्थी पर जब गणेशजी आपके घर में विराजें तो उनसे अपनी मनोकामनाएं जरूर कहिए, लेकिन कुछ पल उनके स्वरूप को समझने के लिए भी निकालिए। उनसे बुद्धि मांगिए, विवेक मांगिए, धैर्य मांगिए और ऐसा जीवन जीने की शक्ति मांगिए जिसमें हमारी सफलता के साथ हमारे संस्कार भी बढ़ते रहें।
 
क्योंकि अंत में गणेशोत्सव का सबसे बड़ा संदेश यही है कि ईश्वर को घर में बुलाना जितना सुंदर है, उनके संदेश को अपने जीवन में उतारना उससे भी अधिक सुंदर है।
 
क्या आप मानते हैं कि गणेश चतुर्थी और गणेशोत्सव केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि परिवार और नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और संस्कारों से जोड़ने का एक सुंदर माध्यम भी हैं?
 
क्या आप मानते हैं कि गणेशजी के विसर्जन की परंपरा हमें जीवन में आने वाले बदलाव, मिलन और विदाई को सहजता से स्वीकार करने की महत्वपूर्ण सीख देती है?
 
हृदय की कलम से
 
आपका 
धनंजय सिंह खींवसर
वसर