रविवार का सदुपयोग – अंश : 200वाँ

रविवार का सदुपयोग
 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश : 200वाँ
 
200वाँ ब्लॉग: स्नेह, संवाद और विश्वास की अविस्मरणीय यात्रा…
आप सभी का कृतज्ञ आभार
 
 
रिश्ते हर बार मुलाकातों से नहीं बनते,
कुछ रिश्ते शब्दों की ऊष्मा से जन्म लेते हैं।
दो सौ सप्ताह से एक ऐसा ही रिश्ता,
आप सबके स्नेह से निरंतर जीवित है….
 
कुछ यात्राएँ मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं, वे लोगों के दिलों तक पहुँचने के लिए होती हैं। कुछ शब्द केवल लिखे नहीं जाते, वे जिए जाते हैं। कुछ संबंध परिचय से नहीं, बल्कि निरंतर संवाद से बनते हैं। और जब यह संवाद वर्षों तक बिना किसी अपेक्षा, बिना किसी विराम और बिना किसी थकान के चलता रहे, तब वह केवल लेखन नहीं रहता, वह एक आत्मीय परिवार का स्वरूप ले लेता है।
 
आज जब यह 200वाँ ब्लॉग आपके समक्ष है, तब मन में सबसे पहले कोई उपलब्धि का भाव नहीं, बल्कि गहरी कृतज्ञता का भाव है। यह यात्रा केवल मेरी नहीं है। यह उन असंख्य पाठकों की यात्रा है जिन्होंने हर सप्ताह मेरे शब्दों को समय दिया, उन्हें पढ़ा, उन पर विचार किया, अपनी प्रतिक्रियाएँ दीं, कभी सहमति व्यक्त की, कभी नए दृष्टिकोण सुझाए, तो कभी केवल एक स्नेहभरा संदेश भेजकर आगे लिखते रहने का उत्साह दिया।
 
लगभग चार वर्षों से अधिक समय तक निरंतर चलने वाली यह श्रृंखला केवल सप्ताह गिनने का विषय नहीं है। यह विश्वास के उन दो सौ पड़ावों की कहानी है जिन्हें आप सभी ने अपने प्रेम, अपने अपनत्व और अपने अटूट विश्वास से संभव बनाया है। शायद ही कोई सप्ताह ऐसा रहा हो जब संवाद की यह परंपरा थमी हो। यदि कभी किसी कारण से थोड़ा विलंब हुआ भी, तो आपके संदेशों ने यह एहसास कराया कि अब यह केवल लेखन नहीं, बल्कि एक प्रतीक्षा बन चुकी है।
 
लेखन का आनंद अद्भुत होता है। विचारों को शब्द देना आत्मा को हल्का करता है। मन की अनुभूतियों को समाज के साथ साझा करना संतोष देता है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि निरंतर लिखते रहना सरल नहीं होता। हर सप्ताह स्वयं से नया संवाद करना, नए विषय तलाशना, हर बार कुछ ऐसा कहना जो पाठकों के मन तक पहुँचे, यह एक साधना है। कई बार परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं होतीं, समय साथ नहीं देता, व्यस्तताएँ बढ़ जाती हैं, मन भी कभी थक जाता है। फिर भी जब यह स्मरण होता है कि कहीं कोई पाठक इस सप्ताह भी इन शब्दों की प्रतीक्षा कर रहा होगा, तब कलम स्वयं चल पड़ती है।
 
यही तो विश्वास की सबसे बड़ी शक्ति है। वह व्यक्ति को उसकी सीमाओं से आगे बढ़ने का साहस देता है।
इन दो सौ ब्लॉगों के दौरान यदि पीछे मुड़कर देखूँ, तो ऐसा शायद ही कोई विषय होगा जिसे हमने साथ मिलकर न छुआ हो। जीवन के रंग जितने विविध हैं, संवाद भी उतना ही व्यापक रहा। कभी किसी पर्व की शुभता शब्दों में उतरी, कभी किसी राष्ट्रीय दिवस की प्रेरणा। कभी संस्कृति की गौरवशाली परंपराओं पर चर्चा हुई, तो कभी समाज की चुनौतियों पर गंभीर चिंतन। कभी धर्म की आध्यात्मिक ऊँचाइयों पर मनन किया, तो कभी राजनीति के बदलते परिदृश्यों को समझने का प्रयास। कभी युवाओं के सपनों की बात हुई, कभी किसानों के परिश्रम की। कभी महिलाओं की शक्ति पर लिखा, कभी बच्चों की मासूम दुनिया पर। कभी पर्यावरण की चिंता व्यक्त की, कभी शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, साहित्य, खेल, पर्यटन, इतिहास और विरासत जैसे विषयों पर अपने विचार साझा किए।
 
वास्तव में यह ब्लॉग केवल एक विषय तक सीमित नहीं रहा। यह जीवन के हर उस पक्ष का साथी बना, जो हम सभी को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता है।
 
मेरे लिए सदैव यह प्रयास रहा कि प्रत्येक लेख केवल सूचना न दे, बल्कि संवेदना भी जगाए। केवल विचार न रखे, बल्कि विचार करने की प्रेरणा भी दे। केवल शब्द न हो, बल्कि संवाद का निमंत्रण हो। यदि इन वर्षों में कहीं भी ऐसा हुआ कि किसी एक पाठक ने भी किसी लेख को पढ़कर नई दृष्टि से सोचना प्रारंभ किया, किसी के मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ, किसी को अपनी संस्कृति पर गर्व का अनुभव हुआ, किसी ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को नए रूप में समझा, तो मैं मानता हूँ कि यह प्रयास सार्थक हुआ।
 
आज के समय में संवाद सबसे बड़ी आवश्यकता है। विचारों का आदान प्रदान ही समाज को आगे बढ़ाता है। मत अलग हो सकते हैं, दृष्टिकोण भिन्न हो सकते हैं, अनुभव अलग हो सकते हैं, लेकिन संवाद बना रहे, यही लोकतांत्रिक और सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। इसी विश्वास के साथ हर ब्लॉग लिखा गया कि शब्द जोड़ने का कार्य करें, तोड़ने का नहीं। प्रेरित करें, निराश नहीं। आशा जगाएँ, हताशा नहीं।
 
इन दो सौ पड़ावों में मुझे सबसे अधिक जो चीज़ मिली, वह है आपका विश्वास। यह विश्वास किसी पुरस्कार से बड़ा है। किसी सम्मान से अधिक मूल्यवान है। क्योंकि पुरस्कार समय के साथ स्मृति बन जाते हैं, लेकिन विश्वास जीवन भर साथ चलता है।
 
आपमें से अनेक ऐसे हैं जिन्होंने पहले ब्लॉग से लेकर आज तक एक भी लेख पढ़ना नहीं छोड़ा। कई ऐसे भी हैं जो प्रत्येक ब्लॉग पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य लिखते हैं। कुछ मित्र हर बार नई चर्चा प्रारंभ कर देते हैं। कुछ सुझाव देते हैं। कुछ त्रुटियाँ बताते हैं। कुछ केवल दो शब्द लिखते हैं, “बहुत अच्छा”, लेकिन वे दो शब्द भी अगला ब्लॉग लिखने की प्रेरणा बन जाते हैं।
 
लेखन कभी अकेले नहीं होता। लेखक लिखता अवश्य है, लेकिन उसे पूर्ण पाठक बनाते हैं। यदि पढ़ने वाले न हों, तो शब्द केवल कागज़ पर रह जाते हैं। यदि सुनने वाले न हों, तो विचार हवा में बिखर जाते हैं। इसलिए इन दो सौ ब्लॉगों का वास्तविक श्रेय उन सभी पाठकों को है जिन्होंने इन्हें अपना समय दिया।
 
कई बार देश के किसी कोने से संदेश आया कि आज का लेख परिवार के साथ पढ़ा। किसी ने लिखा कि विद्यालय में विद्यार्थियों को सुनाया। किसी ने कहा कि इसे मित्रों के समूह में साझा किया। किसी ने किसी विशेष लेख को वर्षों बाद फिर से पढ़ने की बात कही। ऐसे हर संदेश ने यह विश्वास और मजबूत किया कि शब्दों की यात्रा कभी व्यर्थ नहीं जाती।
 
यह भी सुखद अनुभव रहा कि इस संवाद में केवल एक वर्ग नहीं जुड़ा। युवा जुड़े, वरिष्ठ जुड़े, विद्यार्थी जुड़े, शिक्षक जुड़े, सामाजिक कार्यकर्ता जुड़े, विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले लोग जुड़े। अलग अलग आयु, अलग अलग पृष्ठभूमि और अलग अलग अनुभव रखने वाले लोगों ने अपने विचार साझा किए। यही विविधता इस यात्रा की सबसे बड़ी पूँजी है।
 
जीवन हमें प्रतिदिन कुछ नया सिखाता है। समाज हमें नए प्रश्न देता है। समय हमें नए उत्तर खोजने की चुनौती देता है। यही कारण है कि लेखन भी निरंतर बदलता रहता है। प्रत्येक ब्लॉग के साथ स्वयं सीखने का अवसर मिला। पाठकों की प्रतिक्रियाओं ने कई बार मेरी सोच को भी समृद्ध किया। यह केवल एकतरफा संवाद नहीं था, बल्कि निरंतर सीखने और सिखाने की सामूहिक प्रक्रिया थी।
 
आज जब दो सौवें ब्लॉग तक पहुँचे हैं, तब यह ठहराव नहीं है। यह एक नए अध्याय की शुरुआत है। अभी अनेक विषय शेष हैं। समाज में परिवर्तन की अनेक कहानियाँ लिखी जानी हैं। संस्कृति के अनेक प्रेरक प्रसंग साझा किए जाने हैं। युवाओं के सपनों को शब्द देने हैं। हमारी परंपराओं के गौरव को नई पीढ़ी तक पहुँचाना है। सकारात्मकता के छोटे छोटे दीप जलाते रहना है।
 
मुझे विश्वास है कि जैसे अब तक आपका स्नेह और आशीर्वाद मिला है, वैसे ही आगे भी मिलता रहेगा। यह संवाद यूँ ही चलता रहेगा। शब्द बदलेंगे, विषय बदलेंगे, समय बदलेगा, परिस्थितियाँ बदलेंगी, लेकिन विश्वास और अपनापन नहीं बदलेगा।
 
आज इस विशेष अवसर पर मैं हृदय की गहराइयों से उन सभी का आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस यात्रा को आगे बढ़ाया। जिन्होंने पढ़ा, जिन्होंने साझा किया, जिन्होंने सुझाव दिए, जिन्होंने आलोचना की, जिन्होंने प्रेरित किया और जिन्होंने मौन रहकर भी हर सप्ताह साथ निभाया। आप सभी इस यात्रा के सहयात्री हैं। यदि आपका विश्वास साथ न होता, तो दो सौ ब्लॉगों की यह मंज़िल संभव नहीं होती।
 
कहा भी गया है कि अकेला व्यक्ति केवल चल सकता है, लेकिन कारवाँ तभी बनता है जब लोग साथ जुड़ते चले जाएँ। इन वर्षों में यह अनुभव बार बार हुआ कि जब उद्देश्य सकारात्मक हो, भावना निर्मल हो और संवाद ईमानदार हो, तब लोग स्वयं जुड़ते चले जाते हैं। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
 
आने वाले समय में भी यही प्रयास रहेगा कि हर ब्लॉग केवल पढ़ा ही न जाए, बल्कि महसूस भी किया जाए। हर लेख केवल सूचना न बने, बल्कि प्रेरणा बने। हर शब्द केवल पंक्ति न रहे, बल्कि संबंध का माध्यम बने।
 
 
क्या आप मानते हैं कि शब्दों की शक्ति आज भी दिलों को जोड़ सकती है, यदि उनमें सच्चाई, संवेदना और विश्वास हो?
 
क्या आप इस आत्मीय संवाद की इस यात्रा में आगे भी इसी स्नेह, विश्वास और अपनत्व के साथ मेरे सहयात्री बने रहेंगे?
 
 
हृदय की अनंत गहराइयों से आप सभी का कृतज्ञ आभार।
 
हृदय की कलम से
 
आपका 
धनंजय सिंह खींवसर