रविवार का सदुपयोग – अंश : 179 उत्तरवाँ

 
रविवार का सदुपयोग
 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश : 179 उत्तरवाँ 
 
सौहार्द्र पर्व होली: रंगों में बसती है समाज की समरसता की सौगात
 
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
 
होली का पर्व उदारता व सहिष्णुता का उत्सव है, प्रेम एवं सौहार्द्र का शाश्वत प्रतीक है। जब हम रंगों से एक दूसरे को सराबोर करते हैं, तब हम यह इंगित करते हैं कि इस संसार में कोई पराया नहीं है। रंगों की छटा हमें यह सिखाती है कि विविधता ही सौंदर्य है और समरसता ही समाज की असली पहचान।
 
होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह वसंत के आगमन का उल्लास है, यह नवजीवन की धड़कन है, यह संबंधों में पुनः मधुरता घोलने का अवसर है। जब शीत ऋतु की कठोरता समाप्त होती है और प्रकृति रंगों से सजी हुई दिखाई देती है, तब मनुष्य भी उसी प्रकृति के साथ स्वयं को जोड़ लेता है। खेतों में लहलहाती फसलें, वृक्षों पर नई कोपलें, कोयल की मधुर वाणी, यह सब मिलकर जीवन में आशा का संचार करते हैं।
 
सनातन परंपरा में होली की कथा अत्यंत प्रेरणादायक है। प्रह्लाद की अटूट भक्ति और होलिका के अहंकार का अंत हमें यह संदेश देता है कि सत्य और श्रद्धा की विजय निश्चित है। जब होलिका दहन की अग्नि प्रज्वलित होती है, तब वह केवल एक पौराणिक घटना का स्मरण नहीं कराती, बल्कि यह भी संकेत देती है कि हमारे भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों को भी उसी अग्नि में समर्पित कर देना चाहिए। अगले दिन जब रंगों का उत्सव मनाया जाता है, तो वह उस विजय का उत्सव है जो धर्म और भक्ति ने अधर्म और अहंकार पर प्राप्त की।
 
होली का संबंध प्रेम और माधुर्य से भी है। ब्रजभूमि में श्रीकृष्ण और राधा की होली की लीलाएँ आज भी लोकगीतों और परंपराओं में जीवित हैं। वहाँ रंग केवल खेल नहीं, बल्कि प्रेम की अभिव्यक्ति है। श्रीकृष्ण का राधा और गोपियों के साथ रंग खेलना यह दर्शाता है कि जीवन में आनंद और आत्मीयता कितनी आवश्यक है। यह प्रेम भेदभाव से परे है, यह केवल हृदय से हृदय का संबंध है।
 
समाज की समरसता का अर्थ है परस्पर सम्मान और सहयोग। होली का दिन हमें यह अवसर देता है कि हम अपने मन की संकीर्णताओं को त्यागें। वर्ष भर में यदि किसी से कोई मतभेद हो गया हो, तो इस दिन एक छोटा सा स्नेहपूर्ण प्रयास भी बड़े परिवर्तन का कारण बन सकता है। जब हम कहते हैं कि बुरा न मानो होली है, तो उसका वास्तविक अर्थ यह होना चाहिए कि हम बुराई को मन में स्थान ही न दें।
 
ग्रामीण जीवन में होली सामूहिकता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है। लोग मिलकर होलिका की स्थापना करते हैं, सामूहिक रूप से पूजा करते हैं और फिर रंगोत्सव में सम्मिलित होते हैं। यह सहभागिता समाज को एक सूत्र में बांधती है। बुजुर्ग अपने अनुभव सुनाते हैं, महिलाएँ पारंपरिक गीत गाती हैं और बच्चे उत्साह से रंग खेलते हैं। यह सामूहिक उल्लास सामाजिक दूरी को कम करता है और आत्मीयता को बढ़ाता है।
 
शहरी जीवन में भी होली का महत्व कम नहीं है। व्यस्त दिनचर्या के बीच यह पर्व लोगों को रुककर एक दूसरे से जुड़ने का अवसर देता है। पड़ोसी, सहकर्मी और मित्र एक साथ मिलकर इस उत्सव को मनाते हैं। जो लोग सामान्य दिनों में औपचारिक संबंधों तक सीमित रहते हैं, वे भी इस दिन सहज होकर मिलते हैं। यही सहजता समरस समाज की नींव है।
 
होली हमें क्षमा और विनम्रता का पाठ भी पढ़ाती है। जब हम रंग लगाते हैं, तब मन से यह भाव होना चाहिए कि हम सभी के प्रति शुभकामना रखते हैं। यदि हम सच में अपने अहंकार को त्याग दें और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करें, तो समाज में कई तनाव स्वतः समाप्त हो सकते हैं। समरसता का मार्ग भीतर से प्रारंभ होता है।
 
सनातन संस्कृति में प्रत्येक रंग का अपना महत्व है। लाल ऊर्जा और उत्साह का प्रतीक है, पीला ज्ञान और पवित्रता का, हरा समृद्धि और आशा का, नीला गहराई और विश्वास का। जब ये सभी रंग मिलते हैं, तो एक अद्भुत सौंदर्य उत्पन्न होता है। इसी प्रकार समाज में भी विभिन्न विचार, संस्कृतियाँ और जीवनशैलियाँ मिलकर ही पूर्णता देती हैं। यदि हम केवल अपने रंग को श्रेष्ठ मानें, तो इंद्रधनुष कभी नहीं बन पाएगा।
 
होली का एक आध्यात्मिक आयाम भी है। यह आत्ममंथन का अवसर है। क्या हमारे भीतर कोई ऐसा द्वेष है जो हमें दूसरों से दूर कर रहा है। क्या हम किसी के प्रति पूर्वाग्रह रखते हैं। यदि हाँ, तो होली की अग्नि में उन भावनाओं को समर्पित कर देना चाहिए। जब मन शुद्ध होगा, तभी समाज में वास्तविक समरसता स्थापित होगी।
 
इस पर्व का आर्थिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। रंग, गुलाल, मिठाइयाँ, वस्त्र और अन्य सामग्री बनाने वाले अनेक परिवारों की आजीविका इससे जुड़ी होती है। जब हम उत्सव मनाते हैं, तो हम अनजाने में कई घरों में खुशियाँ पहुंचाते हैं। यह भी सामाजिक समरसता का एक रूप है कि हमारा आनंद किसी और के जीवन में भी प्रकाश लाता है।
 
आज के समय में जब समाज अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब होली का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। हमें यह समझना होगा कि मतभेद स्वाभाविक हैं, परंतु मनभेद विनाशकारी होते हैं। यदि हम विविधता को स्वीकार कर लें और प्रेम का मार्ग चुनें, तो अनेक समस्याएँ स्वतः सुलझ सकती हैं।
 
होली हमें सिखाती है कि जीवन में रंगों का संतुलन आवश्यक है। केवल उत्साह ही नहीं, संयम भी चाहिए। केवल आनंद ही नहीं, उत्तरदायित्व भी आवश्यक है। पर्यावरण की रक्षा करते हुए, प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते हुए और जल का संरक्षण करते हुए यदि हम होली मनाएँ, तो यह समरसता केवल मनुष्यों के बीच ही नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ भी स्थापित होगी।
 
अंततः होली एक संकल्प का पर्व है। यह हमें याद दिलाती है कि हम सब एक ही परम चेतना की संतान हैं। जब हम एक दूसरे को रंग लगाते हैं, तो वह बाहरी क्रिया मात्र नहीं होती, वह यह घोषणा होती है कि हम सभी एक दूसरे के सुख दुख में सहभागी हैं। यही भावना समाज को सशक्त और संगठित बनाती है।
सौहार्द्र पर्व होली हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने जीवन को प्रेम, करुणा और सहयोग के रंगों से भर दें। जब प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यवहार में समरसता को स्थान देगा, तभी समाज में स्थायी शांति और सौहार्द्र स्थापित होगा। रंगों का यह उत्सव तभी सार्थक होगा जब वह हमारे हृदयों को भी रंग दे।
 
-क्या आप मानते हैं कि यदि हम होली के संदेश को अपने व्यवहार में उतार लें तो समाज में स्थायी समरसता स्थापित हो सकती है?
 
-क्या आप इस वर्ष होली पर अपने भीतर की किसी नकारात्मक भावना को त्यागकर प्रेम और सौहार्द्र का नया रंग भरने का संकल्प लेंगे?
 
हृदय की कलम से
 
आपका 
धनंजय सिंह खींवसर