रविवार का सदुपयोग – अंश : 173 वाँ


रविवार का सदुपयोग

 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश : 173 वाँ 
 
संस्कार: हमारी विरासत, हमारी अमूल्य निधि, भविष्य की पीढ़ी को संस्कारवान बनाना हमारा दायित्व
 
न चोरहार्यं न च राजहार्यं,
 न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
विद्या धनं सर्वधन प्रधानं,
संस्कार युक्तं तु तदेव सत्यम्॥
 
संस्कार वह अदृश्य धागा है जो समाज की मोतियों को एक माला में पिरोकर रखता है। भारतीय मनीषा में संस्कारों को केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन को परिष्कृत करने वाली एक वैज्ञानिक प्रक्रिया माना गया है। जिस प्रकार अग्नि में तपकर सोना कुंदन बनता है, उसी प्रकार संस्कारों की भट्टी में तपकर एक साधारण बालक ‘मनुष्य’ के रूप में निखरता है। हमारी विरासत केवल मिट्टी के महल या सोने के आभूषण नहीं हैं, बल्कि वे नैतिक मूल्य हैं जो हमें हमारे पूर्वजों ने उत्तराधिकार में दिए हैं। आज जब हम इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर खड़े हैं, तो यह प्रश्न अत्यंत विचारणीय हो जाता है कि क्या हम अपनी इस अमूल्य निधि को अपनी आने वाली पीढ़ी तक सही स्वरूप में पहुँचा पा रहे हैं।
वर्तमान समय में युवा पीढ़ी सूचनाओं के महासागर में तैर रही है। तकनीक ने उनके हाथों में पूरी दुनिया समेट दी है, परंतु इस भौतिक प्रगति की चकाचौंध में कहीं न कहीं आंतरिक शांति और चारित्रिक दृढ़ता की कमी खलती है। आज का युवा विश्व के किसी भी कोने की खबर तो रखता है, लेकिन अक्सर वह अपने बगल में बैठे अपनों के दुख-दर्द से अनभिज्ञ रहता है। यह संस्कारों का ही अभाव है कि आज हम बौद्धिक रूप से तो विशाल होते जा रहे हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से संकुचित। संस्कार हमें यह सिखाते हैं कि सफलता का शिखर छूते समय भी हमारे पाँव जमीन पर होने चाहिए और हमारे मन में सबके प्रति करुणा होनी चाहिए।
 
परिवार वह पहली प्रयोगशाला है जहाँ संस्कारों का निर्माण होता है। माता-पिता का आचरण ही वह पाठ्यपुस्तक है जिसे बच्चे सबसे पहले पढ़ते हैं। यदि घर के वातावरण में अनुशासन, प्रेम और पारस्परिकता का अभाव है, तो केवल उपदेशों से बच्चों को संस्कारवान नहीं बनाया जा सकता।
 
आज की युवा पीढ़ी तर्क और प्रमाण चाहती है। हमें उन्हें यह समझाना होगा कि बड़ों का सम्मान करना या अपनी संस्कृति का पालन करना कोई पुरातनपंथी विचार नहीं है, बल्कि यह हमारे मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक है। जब एक युवा अपने घर में बड़ों की सेवा और त्याग का भाव देखता है, तो वह स्वतः ही परोपकार के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित होता है।
 
शिक्षा और संस्कारों का संबंध शरीर और आत्मा जैसा है। बिना संस्कारों के शिक्षा केवल एक ऐसी तलवार है जो समाज की रक्षा करने के बजाय उसे चोट भी पहुँचा सकती है। आज की व्यावसायिक शिक्षा पद्धति ने युवाओं को कुशल मशीन तो बना दिया है, पर संवेदनशील इंसान बनाना भूल गई है। एक उच्च शिक्षित व्यक्ति यदि अपने ज्ञान का प्रयोग भ्रष्टाचार या अनैतिक कार्यों में करता है, तो उसकी शिक्षा का कोई मूल्य नहीं रह जाता। वास्तविक शिक्षा वही है जो व्यक्ति के भीतर विवेक जागृत करे, उसे सत्य और असत्य के बीच भेद करना सिखाए और उसे यह बोध कराए कि राष्ट्र के प्रति उसके क्या कर्तव्य हैं।
 
आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को काटना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को इतना मजबूत बनाना है कि हम किसी भी वैश्विक बदलाव को आत्मसात कर सकें। युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण प्रगतिशीलता नहीं है। हमारी भारतीय संस्कृति ने हमें जो मूल्य दिए हैं, वे आज भी वैश्विक समस्याओं का समाधान करने में सक्षम हैं। चाहे वह पर्यावरण संरक्षण की बात हो या विश्व शांति की, हमारे संस्कार हमें ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का मंत्र देते हैं। जब एक युवा इस गौरवमयी विरासत को अपनाता है, तो उसका आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है।
 
डिजिटल युग की चुनौतियों ने हमारे दायित्व को और भी गुरुतर बना दिया है। सोशल मीडिया की कृत्रिम दुनिया में युवाओं को वास्तविक और आभासी के बीच का अंतर समझाना अनिवार्य है। उन्हें यह सिखाना होगा कि स्क्रीन पर दिखने वाला जीवन ही सब कुछ नहीं है, असली जीवन तो लोगों के साथ मिलकर रहने, उनकी मदद करने और अपने मूल्यों पर अडिग रहने में है। संस्कार ही वह ढाल हैं जो युवाओं को कुसंगति, व्यसन और नैतिक पतन से बचाते हैं। भविष्य की पीढ़ी को संस्कारवान बनाना केवल एक नैतिक कार्य नहीं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा और अखंडता का भी विषय है।
 
अंततः हमें यह स्वीकार करना होगा कि संस्कार थोपे नहीं जाते, वे संचित किए जाते हैं। हमें युवाओं के साथ मित्रवत व्यवहार करते हुए उन्हें अपनी संस्कृति की वैज्ञानिकता और महत्ता से जोड़ना होगा। यदि हम चाहते हैं कि हमारा देश फिर से विश्व गुरु के पद पर आसीन हो, तो हमें अपनी युवा पीढ़ी को संस्कारों की उस अमूल्य निधि से संपन्न करना होगा जो उन्हें एक श्रेष्ठ मानव और एक उत्तरदायी नागरिक बना सके। यह हमारा सबसे बड़ा निवेश होगा, जिसकी सुखद छाया में आने वाली कई पीढ़ियाँ चैन की सांस ले सकेंगी।
 
क्या आप मानते हैं कि वर्तमान की गलाकाट प्रतिस्पर्धा और भौतिकवाद की दौड़ में हमने संस्कारों को पीछे छोड़ दिया है जिसका खामियाजा समाज बढ़ते तनाव और बिखराव के रूप में भुगत रहा है?
 
क्या आप मानते हैं कि आने वाली पीढ़ी को संस्कारवान बनाने का दायित्व केवल विद्यालय का नहीं बल्कि संयुक्त रूप से माता पिता और समाज के हर जागरूक नागरिक का है?
 
हृदय की कलम से
 
आपका 
धनंजय सिंह खींवसर