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साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 138 वाँ
एक राष्ट्र, एक चुनाव: विकसित भारत की दिशा में सशक्त कदम
हमारे देश की लोकतांत्रिक प्रणाली जितनी विशाल है, उतनी ही जटिल भी। इस लोकतंत्र को एकीकृत रूप में सुचारु रूप से चलाने हेतु समय-समय पर अनेक सुधार किए गए हैं। इन्हीं सुधारों की श्रृंखला में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक और ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है—”एक देश, एक चुनाव” की दिशा में ठोस पहल। यह केवल एक राजनीतिक योजना नहीं, बल्कि भारत को सशक्त और संगठित राष्ट्र बनाने की एक दूरदर्शी सोच है।
मोदी सरकार ने अपने तीसरे कार्यकाल के संकल्प पत्र में किए गए एक प्रमुख वादे को पूरा करते हुए “एक देश, एक चुनाव” पर केंद्रीय कैबिनेट की मुहर लगाई है। इस पहल को अमलीजामा पहनाने के लिए पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया, जिसने सात देशों की चुनाव प्रणाली का तुलनात्मक अध्ययन कर 18,626 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। यह रिपोर्ट राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को सौंपी गई। समिति ने सुझाव दिया है कि सभी राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 2029 तक बढ़ाकर एकसाथ चुनाव कराए जा सकते हैं, जिससे देश बार-बार चुनावी मोड में उलझे बिना नीति निर्माण और क्रियान्वयन पर पूर्ण रूप से केंद्रित रह सके।
यह विचार बिल्कुल नया नहीं है। 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा व राज्य विधानसभाओं के चुनाव एकसाथ होते थे। लेकिन राजनीतिक अस्थिरता व समयपूर्व विधानसभा भंग होने के कारण यह परंपरा समाप्त हो गई। अब फिर से उसी एकरूपता को पुनर्स्थापित करने का प्रयास हो रहा है, जो भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मूल पहचान रही है।
यह पहल प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में पूर्व में लिए गए कई राष्ट्रीय निर्णयों की अगली कड़ी है, जो “एक राष्ट्र” की भावना को सशक्त बनाते हैं और नागरिकों के जीवन में वास्तविक बदलाव लाते हैं। जैसे—”एक देश, एक पहचान” के रूप में आधार कार्ड ने डिजिटल पहचान सुनिश्चित की; “एक देश, एक स्वास्थ्य बीमा” के अंतर्गत आयुष्मान भारत ने लाखों को मुफ्त इलाज प्रदान किया; “एक देश, एक कर” (GST) ने कर प्रणाली को सरल व पारदर्शी बनाया; “एक देश, एक राशन कार्ड” ने गरीबों को देश के किसी भी कोने में राशन की सुविधा दी; और “एक देश, एक पावर ग्रिड” ने ऊर्जा वितरण को सुलभ बनाया।
इन्हीं सफल पहलों की तरह, “एक देश, एक चुनाव” भी प्रशासनिक दक्षता और स्थायित्व को बढ़ावा देने वाला कदम है। लगातार होते चुनाव न केवल आर्थिक बोझ डालते हैं, बल्कि सरकारों को विकास कार्यों से भटका देते हैं। आचार संहिता लागू होने पर अनेक योजनाएं थम जाती हैं और मूल्यवान समय व्यर्थ होता है। यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाएं, तो सरकारें अपने पूरे कार्यकाल में विकास कार्यों पर केंद्रित रह सकेंगी, नीतियों का कार्यान्वयन तीव्र होगा, प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और राजनीति का केंद्र विकास बन सकेगा।
वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, “एक देश, एक चुनाव” के क्रियान्वयन से भारत की जीडीपी में लगभग 1.5% तक की वृद्धि संभव है। इससे न केवल सरकारी खर्च में कटौती होगी, बल्कि चुनावी प्रचार, जनसंपर्क व अन्य गतिविधियों में लगने वाले संसाधनों की बचत से बहुपरिणामी विकास को गति मिलेगी।
प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से इस विषय पर विशेष जोर देते हुए सभी राजनीतिक दलों से राष्ट्रहित में सहयोग की अपील की। यह राष्ट्रनिर्माण की भावना का जीवंत उदाहरण है, जहां तात्कालिक राजनीतिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी जा रही है।
– ‘एक देश, एक चुनाव’ से लोकतंत्र को नई मजबूती मिलेगी — क्या आप इससे सहमत हैं?
– क्या इसके चलते सरकारें पूरे कार्यकाल में विकास कार्यों में पूरी तरह संलग्न रह सकेंगी?
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर