रविवार का सदुपयोग –अंश : 137 वाँ


रविवार का सदुपयोग 

 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश : 137 वाँ 
 
बाबासाहेब आंबेडकर जयंती विशेष || भारतीय संविधान के शिल्पकार: डॉ. भीमराव आंबेडकर 
 
A Constitution is not a mere lawyer’s document, it is a vehicle of Life and its spirit is always the spirit of Age.
— डॉ. भीमराव आंबेडकर
 
जब भारत सदियों की गुलामी के बाद स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा था तब उसे केवल राजनीतिक आज़ादी नहीं चाहिए थी, उसे एक ऐसी आत्मा की आवश्यकता थी जो पूरे राष्ट्र को एकजुट कर सके। उसे चाहिए था ऐसा संविधान जो हर नागरिक को उसकी पहचान, गरिमा और अवसर की बराबरी का भरोसा दे सके। भारत को एक ऐसे विचारक की ज़रूरत थी जो न केवल कानूनों को शब्दों में ढाल सके बल्कि उन शब्दों में इंसानियत की श्वास फूंक सके। उस ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए जो नाम सामने आया वह था डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर, एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने भारत के भविष्य को दिशा देने वाले सबसे महान दस्तावेज़ का निर्माण किया।
 
डॉ. आंबेडकर केवल एक संविधान निर्माता नहीं थे, वे उस सोच के प्रतिनिधि थे जो आज़ादी को केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं बल्कि समाजिक पुनर्रचना का माध्यम मानती थी। वे एक ऐसे भारत का सपना देख रहे थे जहाँ हर व्यक्ति कानून की निगाह में बराबर हो, जहाँ जन्म से नहीं बल्कि कर्म से पहचान बने और जहाँ संविधान केवल किताब में न रहकर लोगों की सोच और जीवन का हिस्सा बन जाए।
 
जब भारत ने स्वतंत्रता की ओर कदम बढ़ाया तब देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि विभिन्न जातियों, भाषाओं, संस्कृतियों और धार्मिक विश्वासों को एक सूत्र में कैसे पिरोया जाए। स्वतंत्र भारत को एक ऐसा ढांचा चाहिए था जिसमें हर नागरिक को समान अधिकार मिले, न्याय की गारंटी हो और कोई किसी के अधिकारों को छीन न सके। इस चुनौती को स्वीकार कर उसे सिद्ध करने वाले व्यक्ति का नाम है डॉ. भीमराव आंबेडकर… भारत के संविधान निर्माता, विधिशास्त्री, अर्थशास्त्री और एक गहरे विचारशील राष्ट्रनिर्माता।
 
डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू छावनी क्षेत्र में हुआ था। वे एक साधारण परिवार से थे लेकिन साधारणता केवल बाह्य रूप में थी, भीतर एक असाधारण चेतना और बदलाव की आग पल रही थी। उनके पिता रामजी सकपाल ब्रिटिश सेना में कार्यरत थे और शिक्षा के महत्त्व को भलीभांति समझते थे। बचपन से ही भीमराव का मन पढ़ाई में खूब लगता था और वे सवाल पूछने से कभी नहीं डरते थे।
 
उनकी शुरुआती शिक्षा मुंबई के एलफिंस्टन स्कूल में हुई जहाँ पढ़ाई के दौरान उन्हें तमाम सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे अपने समय के सबसे मेहनती और मेधावी छात्रों में गिने जाते थे। लेकिन आगे की पढ़ाई का सपना तब तक अधूरा लगता था जब तक कोई उनकी प्रतिभा को पहचान कर उसका साथ न दे।
 
स्वतंत्रता से पूर्व तत्कालीन राजा महाराजा प्रतिभाओं की प्रोत्साहन हेतु अत्यंत सक्रिय रहे थे। यही वह मोड़ था जहाँ बड़ौदा राज्य के तत्कालीन महाराज सयाजीराव गायकवाड़ ने एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उन्होंने भीमराव आंबेडकर को छात्रवृत्ति प्रदान की जिससे वे उच्च शिक्षा के लिए विदेश जा सके। यह फैसला न केवल एक छात्र का भविष्य बदलने वाला था बल्कि एक राष्ट्र की दिशा तय करने वाला निर्णय भी साबित हुआ। गायकवाड़ ने जो बीज बोया, वह आगे चलकर भारतीय लोकतंत्र का वटवृक्ष बना।
 
1913 में डॉ. आंबेडकर अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी पहुँचे। वहाँ उन्होंने राजनीति, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और दर्शनशास्त्र का गहरा अध्ययन किया। उनकी बौद्धिक क्षमताएं इतनी प्रभावशाली थीं कि वहाँ उन्होंने केवल दो वर्षों में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की और फिर पीएच.डी. भी की। उनका शोध ‘The Problem of the Rupee’ भारत के आर्थिक भविष्य को समझने की एक दूरदर्शी पहल थी।
 
इसके बाद वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स गए जहाँ उन्होंने लॉ और अर्थशास्त्र दोनों में गहन अध्ययन किया। ये वर्ष उनके वैचारिक निर्माण के सबसे निर्णायक क्षण थे। उन्होंने भारतीय समाज की गहराई से विवेचना की और ये महसूस किया कि अगर भारत को वास्तव में स्वतंत्र और समानतावादी राष्ट्र बनाना है तो इसकी बुनियाद ही न्याय और समावेशन पर रखनी होगी।
 
भारत लौटने के बाद डॉ. आंबेडकर ने न केवल एक विधिशास्त्री के रूप में कार्य किया बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के समानांतर एक बौद्धिक आंदोलन की नींव भी रखी। वे मानते थे कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं जब तक प्रत्येक नागरिक को सामाजिक और आर्थिक समानता न मिले। इसी सोच के साथ वे भारतीय राजनीति के एक प्रमुख विचारक बनकर उभरे।
 
1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब देश को एक संविधान की आवश्यकता थी, ऐसा संविधान जो विविधताओं को एकता में पिरो सके जो समाज के सबसे कमजोर वर्ग को भी उतना ही अधिकार दे जितना शक्तिशाली को और जो एक नैतिक व विधिक ढांचा प्रदान करे जिस पर भारत की भविष्य की संरचना टिक सके। संविधान सभा का गठन हुआ और डॉ. भीमराव आंबेडकर को संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति केवल सम्मान का प्रतीक नहीं थी बल्कि उस विश्वास की मोहर थी जो देश ने उनके ज्ञान, दूरदर्शिता और समावेशी सोच पर जताई थी।
 
संविधान निर्माण में डॉ. आंबेडकर ने जिस प्रकार की सूक्ष्मता, संतुलन और नैतिक विवेक दिखाया, वह अभूतपूर्व था। उन्होंने भारतीय समाज की जटिलताओं को समझते हुए ऐसा संविधान बनाया जिसमें सभी धर्मों, जातियों, भाषाओं और लिंगों को समान अधिकार मिले। उन्होंने संविधान में मूल अधिकार, निदेशक सिद्धांत, धर्मनिरपेक्षता, संघीय ढांचा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे प्रावधान शामिल कर भारत को एक लोकतांत्रिक गणराज्य का स्वरूप दिया।
 
उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि संविधान केवल शासकों के लिए नहीं बल्कि हर नागरिक के अधिकार और कर्तव्य का प्रहरी बने। उनका मानना था कि संविधान की असली शक्ति उसके अक्षरों में नहीं, बल्कि उसे लागू करने वाले नागरिकों के आचरण में होती है। 
 
संविधान सभा में उनके विचार इतने गहन और तार्किक होते थे कि वे विरोधियों को भी सहमत कर लेते थे। उन्होंने अपनी बातों में तर्क, दृष्टिकोण और ऐतिहासिक साक्ष्यों का ऐसा संतुलन रखा, जिससे संविधान केवल एक दस्तावेज नहीं रहा बल्कि भारत की आत्मा का प्रतिबिंब बन गया। उन्होंने संविधान के माध्यम से एक ऐसे भारत की कल्पना की जो समानता, बंधुत्व और स्वतंत्रता की नींव पर खड़ा हो।
 
6 दिसंबर 1956 को जब डॉ. आंबेडकर ने अंतिम सांस ली तब वे केवल एक व्यक्ति नहीं थे बल्कि एक विचारधारा बन चुके थे। उनकी दृष्टि, उनके शब्द और उनके सिद्धांत आज भी भारतीय लोकतंत्र के मूल स्तंभ हैं। वे एक ऐसे विचारक थे जिनका मस्तिष्क विश्व के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में तराशा गया और जिन्होंने उस ज्ञान का उपयोग भारत की जनता के लिए किया।
 
जय हिंद
 
भारत का संविधान आज जितना प्रासंगिक है, उतना शायद कभी नहीं था। हर बार जब हम किसी अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं, हर बार जब कोई बच्चा शिक्षा पाने का सपना देखता है, हर बार जब किसी नागरिक को न्याय मिलता है, तब-तब डॉ. आंबेडकर का संविधान हमारे साथ खड़ा दिखाई देता है।
 
-क्या आप मानते हैं कि भारत का संविधान आज भी उतना ही जीवंत और प्रभावशाली है जितना उसके निर्माण के समय था? 
 
-क्या आप मानते हैं कि आज के युवा नागरिक डॉ. आंबेडकर के संविधान दर्शन को उतनी गंभीरता और समझ के साथ अपनाते हैं जितनी आवश्यकता है?
 
हृदय की कलम से
 
आपका 
धनंजय सिंह खींवसर