
रविवार का सदुपयोग
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 197वाँ
राजनीति सिद्धांतों की होनी चाहिए, व्यक्तिगत वैमनस्य की नहीं
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
अर्थात श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, सामान्य लोग भी उसका अनुसरण करते हैं। इसलिए जो व्यक्ति नेतृत्व की भूमिका में हो, उसके जीवन में सिद्धांत, मर्यादा और आदर्श व्यवहार का होना अत्यंत आवश्यक है।
राजनीति केवल शासन चलाने का माध्यम नहीं है, बल्कि समाज को दिशा देने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है। राजनीति में बैठे लोग केवल निर्णय नहीं लेते, बल्कि अपने व्यवहार, अपने शब्दों और अपने आचरण से करोड़ों लोगों के लिए उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं। इसलिए राजनीति में सबसे अधिक आवश्यकता सिद्धांतों की होती है, न कि व्यक्तिगत वैमनस्य की। जहां राजनीति का केंद्र जनहित के स्थान पर व्यक्तिगत द्वेष, अहंकार और प्रतिशोध बन जाता है, वहां लोकतंत्र की आत्मा धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां विचारों का मतभेद स्वीकार किया जाता है। अलग-अलग विचारधाराएं लोकतंत्र को मजबूत बनाती हैं, लेकिन व्यक्तिगत शत्रुता उसे कमजोर कर देती है। किसी नीति का विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, किंतु किसी व्यक्ति के प्रति नफरत, अपमान और बदले की भावना रखना राजनीति का उद्देश्य नहीं हो सकता। जब राजनीतिक बहस विचारों से हटकर व्यक्तियों पर केंद्रित हो जाती है, तब समाज भी अनावश्यक विभाजन का शिकार होने लगता है।
राजनीति में सिद्धांत वह आधार हैं जो किसी भी नेता को परिस्थितियों के अनुसार बदलने नहीं देते। सत्ता आए या जाए, परिस्थितियां अनुकूल हों या प्रतिकूल, यदि व्यक्ति अपने मूल्यों और मर्यादाओं पर अडिग रहता है, तभी जनता उसके प्रति विश्वास बनाए रखती है। अवसर देखकर विचार बदल लेना, केवल लाभ के लिए पक्ष बदलना या निजी स्वार्थ के अनुसार निर्णय लेना राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी कमजोरी मानी जाती है।
आज के समय में राजनीति का एक चिंताजनक पक्ष यह भी दिखाई देता है कि कई बार सेवा से अधिक प्रचार को महत्व दिया जाने लगा है। अनेक बार ऐसा प्रतीत होता है कि कार्य कम और उसका प्रदर्शन अधिक किया जा रहा है। हर उपलब्धि के साथ स्वयं का नाम जोड़ने की होड़, हर मंच से अपने ही योगदान का उल्लेख और हर सफलता का श्रेय स्वयं को देना राजनीतिक परिपक्वता का परिचायक नहीं है। जनसेवा का उद्देश्य प्रशंसा प्राप्त करना नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना होना चाहिए।
राजनीतिक जीवन में “मैं” की भावना जितनी बढ़ती है, उतनी ही जनसेवा की भावना कमजोर होती जाती है। “मैंने यह किया”, “मेरे कारण यह हुआ”, “मेरे बिना कुछ संभव नहीं” जैसी सोच धीरे-धीरे अहंकार को जन्म देती है। जबकि राजनीति किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास का परिणाम होती है। किसी भी विकास कार्य के पीछे प्रशासन, कार्यकर्ता, विशेषज्ञ, समाज और जनता का समान योगदान होता है। ऐसे में केवल स्वयं को केंद्र में रखना नेतृत्व नहीं, बल्कि आत्मप्रशंसा है।
अहंकार किसी भी व्यक्ति के विवेक को प्रभावित कर देता है। जब नेता स्वयं को अचूक मानने लगता है, तब वह दूसरों की बात सुनना बंद कर देता है। आलोचना उसे शत्रुता लगने लगती है और सुझाव उसे विरोध प्रतीत होने लगते हैं। यही स्थिति धीरे-धीरे राजनीतिक पतन की शुरुआत बन जाती है। जो नेता स्वयं को निरंतर सीखने वाला मानता है, वही समय के साथ और अधिक परिपक्व बनता है।
राजनीति का वास्तविक आधार कर्म होना चाहिए। जनता भाषणों से कुछ समय के लिए प्रभावित हो सकती है, लेकिन लंबे समय तक वही नेता सम्मान पाता है जिसके कार्य लोगों के जीवन में परिवर्तन लाते हैं। सेवा का मूल्य प्रचार से कहीं अधिक होता है। जो व्यक्ति बिना शोर किए समाज के लिए कार्य करता है, उसके कार्य ही उसकी पहचान बन जाते हैं।
मीडिया लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ है। उसका कार्य जनता तक तथ्य पहुंचाना और व्यवस्था को उत्तरदायी बनाए रखना है। लेकिन यदि राजनीति केवल मीडिया की सुर्खियां बनने, कृत्रिम लोकप्रियता अर्जित करने और विरोधियों को नीचा दिखाने तक सीमित हो जाए, तो उसका मूल उद्देश्य समाप्त होने लगता है। प्रचार से लोकप्रियता मिल सकती है, किंतु विश्वास केवल चरित्र और कार्यों से अर्जित होता है।
लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों की समान भूमिका होती है। यदि विपक्ष केवल विरोध के लिए विरोध करे और सत्ता केवल आलोचना को दबाने का प्रयास करे, तो लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ जाता है। स्वस्थ राजनीति का अर्थ है कि नीतियों पर कठोर बहस हो, लेकिन व्यक्तिगत संबंधों में मर्यादा बनी रहे। विचारों का संघर्ष लोकतंत्र को मजबूत करता है, जबकि व्यक्तियों का संघर्ष उसे कमजोर करता है।
राजनीति में भाषा का विशेष महत्व है। शब्द केवल भाषण का हिस्सा नहीं होते, वे समाज की मानसिकता को भी प्रभावित करते हैं। यदि राजनीतिक संवाद कटु, अपमानजनक और उग्र हो जाएगा, तो उसका प्रभाव समाज पर भी पड़ेगा। इसलिए मतभेद कितने भी गहरे क्यों न हों, भाषा की गरिमा और मर्यादा कभी समाप्त नहीं होनी चाहिए।
व्यक्तिगत स्वार्थ राजनीति को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। जब कोई निर्णय समाज के हित के बजाय किसी व्यक्ति, परिवार, समूह या निजी लाभ को ध्यान में रखकर लिया जाता है, तब लोकतंत्र की भावना कमजोर होने लगती है। राजनीति का पहला धर्म जनहित होना चाहिए। यदि जनहित पीछे और निजी हित आगे आ जाए, तो राजनीति केवल सत्ता का खेल बनकर रह जाती है।
व्यक्तिगत अपमान और प्रतिशोध की राजनीति कभी भी समाज को सकारात्मक दिशा नहीं दे सकती। किसी को नीचा दिखाकर स्वयं ऊंचा बनने का प्रयास क्षणिक लाभ तो दे सकता है, लेकिन स्थायी सम्मान नहीं दिला सकता। सम्मान सदैव अपने आचरण, विनम्रता और सेवा से प्राप्त होता है।
सच्चा नेता वही होता है जो विरोधियों की बात भी धैर्यपूर्वक सुन सके। आलोचना लोकतंत्र का अभिन्न अंग है। यदि हर आलोचना को व्यक्तिगत हमला मान लिया जाए, तो सुधार की संभावना समाप्त हो जाती है। परिपक्व नेतृत्व वही है जो आलोचना से सीखने का साहस रखे और उचित सुझावों को स्वीकार करने में संकोच न करे।
इतिहास सदैव उन नेताओं को याद रखता है जिन्होंने सिद्धांतों के लिए संघर्ष किया, न कि उन लोगों को जिन्होंने केवल अपने विरोधियों से संघर्ष किया। पद, प्रतिष्ठा और सत्ता समय के साथ बदल जाते हैं, लेकिन चरित्र और सिद्धांत स्थायी विरासत बन जाते हैं। यही कारण है कि सिद्धांतों पर चलने वाले व्यक्तित्व पीढ़ियों तक सम्मान के साथ स्मरण किए जाते हैं।
राजनीति में विनम्रता सबसे बड़ा गुण है। जितनी बड़ी जिम्मेदारी, उतनी ही अधिक विनम्रता अपेक्षित होती है। जो व्यक्ति स्वयं को सबसे बड़ा मानने लगता है, उसका विकास रुक जाता है। लेकिन जो स्वयं को समाज का सेवक मानता है, वह निरंतर आगे बढ़ता रहता है। नेतृत्व का अर्थ आदेश देना नहीं, बल्कि प्रेरणा देना होता है।
राजनीति का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं होना चाहिए। यदि चुनाव जीतकर भी समाज में कटुता, अविश्वास और विभाजन बढ़ जाए, तो ऐसी सफलता अधूरी है। वास्तविक सफलता तब है जब समाज में विश्वास बढ़े, विकास हो, न्याय मिले और प्रत्येक नागरिक स्वयं को सुरक्षित एवं सम्मानित महसूस करे।
राजनीति में पारदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक है जितनी ईमानदारी। जनता को यह विश्वास होना चाहिए कि निर्णय निष्पक्षता से लिए जा रहे हैं और उनका उद्देश्य केवल जनकल्याण है। जब पारदर्शिता बनी रहती है, तब अफवाहों और संदेहों की गुंजाइश भी कम हो जाती है।
मर्यादा राजनीति की सबसे बड़ी शक्ति है। विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन विरोध के नाम पर अपमान करना लोकतांत्रिक संस्कृति नहीं है। यदि राजनीतिक जीवन में शालीनता बनी रहे, तो मतभेद भी समाज को नई दिशा देते हैं। लेकिन यदि मर्यादा समाप्त हो जाए, तो संवाद की जगह संघर्ष और सहयोग की जगह टकराव जन्म लेने लगता है।
राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है जब व्यक्ति के सामने निजी लाभ और सार्वजनिक हित में से किसी एक को चुनना हो। जो नेता हर बार जनहित को प्राथमिकता देता है, वही वास्तव में जनप्रतिनिधि कहलाने का अधिकारी होता है। सिद्धांतों की रक्षा आसान परिस्थितियों में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में होती है।
समाज उन नेताओं पर अधिक विश्वास करता है जिनके शब्द और कर्म में समानता होती है। यदि भाषणों में आदर्शों की बात हो और व्यवहार में उसका अभाव दिखाई दे, तो जनता देर-सबेर इस अंतर को पहचान ही लेती है। इसलिए राजनीति में विश्वसनीयता का निर्माण केवल वादों से नहीं, बल्कि निरंतर आचरण से होता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति में व्यक्तिगत कटुता के स्थान पर संवाद की संस्कृति विकसित हो। विरोधी दलों को शत्रु नहीं, बल्कि लोकतंत्र के आवश्यक सहभागी के रूप में देखा जाए। विचारों का मतभेद बना रह सकता है, लेकिन राष्ट्रहित और जनहित के प्रश्नों पर सभी का उद्देश्य एक होना चाहिए।
क्या आप मानते हैं कि राजनीति में विचारों का संघर्ष होना चाहिए, लेकिन व्यक्तिगत वैमनस्य का कोई स्थान नहीं होना चाहिए?
क्या आप मानते हैं कि सिद्धांत, मर्यादा और जनसेवा पर आधारित राजनीति ही लोकतंत्र को मजबूत और सार्थक बना सकती है?
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर