
रविवार का सदुपयोग
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 189वाँ
मां के बिना यह मदर्स डे बहुत भावुक करने वाला है…माँ…एक रिक्तता.. जिनकी अनुपस्थिति आज भी भीतर शोर करती है…!
“नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राणं, नास्ति मातृसमा प्रिया॥”
अर्थात… इस संसार में माँ के समान कोई छाया नहीं, कोई सहारा नहीं, कोई रक्षक नहीं और कोई प्रिय भी नहीं।
कुछ रिक्तताएँ जीवन में ऐसी होती हैं, जिन्हें समय भरने का प्रयास तो करता है, लेकिन भर कभी नहीं पाता। माँ का जाना भी शायद वैसी ही एक रिक्तता है। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है। घर वही रहता है, लोग वही रहते हैं, दिनचर्या भी वैसी ही चलती रहती है, लेकिन भीतर कहीं एक धीमा शोर लगातार गूंजता रहता है कि अब वह आवाज़ कभी सुनाई नहीं देगी, जो हर थकान के बाद पूछती थी, “खाना खाया क्या?”
इस बार का मदर्स डे मन को भीतर तक भिगो देने वाला है। पहली बार ऐसा लग रहा है कि इस दिन का अर्थ सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि स्मृतियों की एक लंबी नदी है, जिसमें उतरते ही हर पल माँ की याद बनकर सामने खड़ा हो जाता है। आज जब लोग अपनी माताओं के साथ तस्वीरें साझा कर रहे हैं, उनके लिए उपहार खरीद रहे हैं, तब मन बार बार उसी खालीपन के पास जाकर बैठ जाता है, जहाँ अब सिर्फ यादें हैं।
माँ का होना कभी सिर्फ एक व्यक्ति का होना नहीं होता। माँ घर की धड़कन होती हैं। उनके होने से दीवारों में भी अपनापन बसता है। सुबह की आरती की आवाज़, रसोई से आती खुशबू, बाहर जाते समय पीछे से दिया गया आशीर्वाद, देर रात तक जागकर इंतजार करना, ये सब छोटी छोटी बातें उस समय सामान्य लगती थीं। लेकिन जब माँ नहीं रहतीं, तब समझ आता है कि घर को घर बनाने वाली वही थीं।
बचपन की यादें भी कितनी अजीब होती हैं। समय बीत जाता है, उम्र आगे बढ़ जाती है, लेकिन माँ से जुड़े दृश्य मन में वैसे ही ताजे बने रहते हैं। स्कूल जाते समय हाथ पकड़कर सड़क पार कराना, बीमार पड़ने पर सारी रात सिरहाने बैठना, परीक्षा के दिनों में सुबह जल्दी उठाकर पढ़ाना, और फिर चुपके से पसंद का नाश्ता बना देना, यह सब याद आते ही मन अनायास भीग जाता है।
दुनिया में शायद माँ ही एक ऐसी इंसान होती हैं, जो हमारे दुख को हमारे बोलने से पहले पढ़ लेती हैं।
आज भी कभी थकान बहुत ज्यादा हो जाए, मन उलझनों से भर जाए, तो अनायास ऐसा लगता है कि बस माँ के पास बैठ जाऊँ। कुछ कहूँ भी नहीं, सिर्फ उनके पास बैठा रहूँ, और सब ठीक हो जाए। माँ के पास सच में कोई जादू होता है। उनका हाथ सिर पर पड़ते ही मन हल्का हो जाता था। अब वही थकान जब भीतर जमा होती है, तब समझ आता है कि माँ सिर्फ रिश्ता नहीं थीं, वह जीवन की सबसे बड़ी शांति थीं।
जीवन में कई लोग मिलते हैं, बहुत से संबंध बनते हैं, लेकिन माँ जैसा निस्वार्थ प्रेम कहीं नहीं मिलता। दुनिया अक्सर हमारी सफलता से प्रेम करती है, लेकिन माँ हमारी असफलताओं में भी हमारे साथ खड़ी रहती हैं। जब पूरी दुनिया सवाल करती है, तब माँ बिना कुछ पूछे हमारे लिए प्रार्थना करती हैं।
हम अक्सर यह मान लेते हैं कि माँ हमेशा हमारे साथ रहेंगी। इसी विश्वास में हम बहुत सारी बातें कल पर छोड़ देते हैं। लेकिन एक दिन अचानक वही कल कभी नहीं आता।अब एहसास होता है कि माँ सिर्फ भोजन नहीं बनाती थीं, वह उसमें अपना स्नेह परोसती थीं। उनकी बनाई साधारण सी चीज भी इसलिए विशेष लगती थी, क्योंकि उसमें अपनापन मिला होता था।
माँ के दिए हुए संस्कार जीवन में सबसे बड़ी पूंजी बन जाते हैं। सच बोलना, किसी का दिल न दुखाना, जरूरतमंद की मदद करना, रिश्तों को सम्मान देना, ये बातें किताबों से नहीं सीखी जातीं। यह सब माँ के व्यवहार से जीवन में उतरता है। आज महसूस होता है कि माँ कहीं गई नहीं हैं। वह हमारे भीतर ही जीवित हैं।
कभी कभी ऐसा लगता है कि माँ की अनुपस्थिति से ज्यादा उनकी उपस्थिति महसूस होती है। मंदिर में दीपक जलाते समय उनकी याद आती है। किसी कठिन निर्णय के समय उनका चेहरा सामने आ जाता है। बीमार पड़ने पर आज भी मन सबसे पहले माँ को ही खोजता है। यह रिश्ता शायद शरीर से नहीं, आत्मा से जुड़ा होता है। इसलिए माँ दूर होकर भी दूर नहीं होतीं।
चाहे उम्र कितनी भी हो जाए, माँ का होना भीतर एक विश्वास बनाए रखता है कि कोई है जो बिना शर्त प्रेम करता है। माँ के जाने के बाद वही विश्वास थोड़ा अधूरा हो जाता है। दुनिया वैसी ही रहती है, लेकिन मन का एक कोना हमेशा खाली रह जाता है।
फिर भी एक सुकून है। माँ भले दिखाई नहीं देतीं, लेकिन उनका होना आज भी हर जगह महसूस होता है। सुबह की प्रार्थना में, घर की परंपराओं में, बच्चों की मुस्कान में, अपनी आदतों में, हर जगह कहीं न कहीं माँ का अंश जीवित है। शायद यही मातृत्व की सबसे बड़ी शक्ति है। माँ शरीर से दूर होकर भी जीवन से कभी दूर नहीं होतीं।
माँ सच में कभी नहीं जातीं…
वे हमारी प्रार्थनाओं में बस जाती हैं…
हमारी आदतों में उतर जाती हैं…
हमारी आवाज़ में जीवित रहती हैं…
और फिर जीवन भर भीतर एक धीमी रोशनी की तरह साथ चलती रहती हैं…
-क्या आप मानते हैं कि माँ के जाने के बाद इंसान भीतर से कभी पूरी तरह पहले जैसा नहीं रह पाता?
-क्या आप मानते हैं कि जीवन में माँ का स्थान कोई दूसरा रिश्ता कभी नहीं ले सकता?
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर