
रविवार का सदुपयोग
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 171 वाँ
माँ :अनुभूतियों से भरा हृदय और अव्यक्त रिक्तता का जन्मदिन : जन्मदिवस पर भावपूर्ण पुण्यस्मरण…..”माँ”
मां, भावों को शब्दों में बाँध पाना अत्यन्त कठिन है। आपके स्थान को न कोई संबंध भर सकता है, न कोई कालखंड। वह रिक्तता स्थायी है, क्योंकि आप अद्वितीय थीं। मां, आज भी आपकी स्मृतियाँ मन के आकाश में दीप-प्रभा की भाँति स्थिर जल रही हैं। आपका स्नेहिल स्पर्श, ममतामयी छांव और हर परिस्थिति में ढाल बनता आपका दिव्य स्वरूप, यह सब आज भी जीवन की गति को संबल प्रदान करता है।
आज इस दिन केवल एक ही भाव शेष है,जहाँ भी हों, शांत और प्रसन्न रहिए और मां, जीवन की हर राह पर अपना शुभाशीष हम पर बनाए रखिए….
आज 4 जनवरी की वह तारीख है जो वर्षों तक मेरे जीवन का सबसे पावन और उल्लासमय पर्व रही। आज सुबह जब आँख खुली तो मन अनजाने में ही उस दिशा की ओर बढ़ा जहाँ आपकी उपस्थिति घर के वातावरण को सुगंधित कर देती थी। माँ, आज आपका जन्मदिन है। पिछले वर्ष इसी दिन हम सब आपकी हंसी और आपके सान्निध्य में स्वयं को धन्य महसूस कर रहे थे। एक साल का समय बीत गया, पर हृदय की गहराइयों में जो सन्नाटा पसर गया है, वह आज इस तारीख के आते ही और अधिक मुखर हो गया है।
एक परिपक्व पुरुष होने के नाते दुनिया मुझसे यह अपेक्षा करती है कि मैं भावनाओं के इस ज्वार को नियंत्रित रखूँ, पर आज इस प्रौढ़ता का आवरण तार-तार हो रहा है। आज मैं केवल एक पुत्र हूँ जिसकी आत्मा अपनी माँ को पुकार रही है।
बचपन की गलियों से लेकर आज तक के सफर में, मैंने हमेशा स्वयं को आपकी दुआओं के साए में पाया है। मुझे याद है वह समय जब मेरी छोटी सी बीमारी पर आप पूरी रात सिरहाने बैठी रहती थीं। आपके हाथों का वह शीतल स्पर्श किसी भी मरहम से बड़ा था। आपने मुझे केवल संघर्ष करना नहीं सिखाया, बल्कि हारकर फिर से मुस्कुराने का हुनर भी दिया। आपने जिस तरह से पूरे परिवार को प्रेम और त्याग के धागे में पिरोकर रखा, वह आज के समय में किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। पिता जी की व्यस्तताओं और जीवन की आपाधापी के बीच आपने अपनी थकान को कभी हम तक पहुँचने नहीं दिया। आपकी वह निस्वार्थ ममता ही थी जिसने मुझे दुनिया की हर चुनौती से लड़ने का साहस दिया।
आज आपके बिना घर की देहरी पर वह रौनक नहीं है जो आपकी एक मुस्कान से खिल उठती थी। वह रसोईघर जहाँ से आपके स्नेह की महक आती थी, अब एक असह्य मौन में डूबा रहता है। माँ, आपके जाने के बाद से यह घर महज़ ईंट और पत्थरों का एक ढांचा बनकर रह गया है। परिवार के बीच बैठकर भी जो एक अकेलापन मन को सालता है, उसे शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। आज आपके जन्मदिन पर वह उत्सव नहीं है, बल्कि एक गहरी रिक्तता है जो हम सबके चेहरों पर साफ दिखाई देती है। उत्सव अब केवल कैलेंडर की एक तारीख बनकर रह गए हैं। वह खाली कुर्सी अब मुझे हर पल यह एहसास दिलाती है कि जीवन की सबसे बड़ी पूंजी मैंने खो दी है।
जब भी जीवन में कोई बड़ी खुशी आती है या मैं कोई सफलता हासिल करता हूँ, तो हाथ अपने आप फोन की ओर बढ़ जाते हैं कि आपको बताऊँ। फिर अचानक हृदय इस कड़वी सच्चाई से टकराता है कि अब आपकी वह शाबासी वाली आवाज़ कभी सुनाई नहीं देगी। वह रिक्तता जो आपके जाने से मेरे जीवन में आई है, उसे संसार का कोई भी वैभव नहीं भर सकता। परिवार का हर सदस्य आज एक दूसरे को दिलासा तो देता है, पर हम सबकी आँखों में आपकी तलाश कभी खत्म नहीं होती। रिश्तों में वह गर्माहट अब जैसे कहीं ओझल हो गई है जो आपकी उपस्थिति मात्र से बनी रहती थी।
यद्यपि आप भौतिक रूप से हमारे बीच मौजूद नहीं हैं, लेकिन मेरा अडिग विश्वास है कि आप कहीं गई भी नहीं हैं। मेरी सोच में, मेरे व्यवहार में और मेरे द्वारा लिए गए हर सही निर्णय में आपकी ही प्रेरणा झलकती है। जब मैं अपनी संतान की आँखों में देखता हूँ, तो मुझे आपकी ममता के वही बीज अंकुरित होते दिखाई देते हैं।
आप उस ठंडी हवा के झोंके में हैं जो थके होने पर मुझे सहला जाती है। आप मेरी उस अंतरात्मा की आवाज़ में हैं जो मुझे कभी गलत रास्ते पर भटकने नहीं देती। माँ, आपका व्यक्तित्व देह की सीमाओं को लांघकर अब मेरे रोम-रोम में समा गया है।
4 जनवरी की यह पावन तिथि अब हमारे लिए केवल एक तारीख नहीं, बल्कि आपके प्रति अनंत कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है। आपने जो अथाह प्रेम हम पर उड़ेला और जो संस्कार हमें विरासत में दिए, वह इस जन्म में तो क्या, किसी भी जन्म में लौटाया नहीं जा सकता। आपकी स्मृतियों की वह मशाल आज भी हमारे जीवन के अंधियारे को दूर कर रही है।
आज आपके इस जन्मदिन पर उपहार देने के लिए मेरे पास शब्द तो बहुत हैं, पर उन्हें सुनने वाली वह ममतामयी मूरत नहीं है। मैं बस अपनी इन भीगी हुई आँखों और भारी हृदय से आपका पुण्यस्मरण करता हूँ। आप जहाँ भी हैं, आपकी आशीष की छाया हम पर सदा बनी रहे।
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर