रविवार का सदुपयोग – अंश : 166 वाँ

रविवार का सदुपयोग
 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश : 166 वाँ 
 
श्रीरामजन्मभूमि मंदिर के शिखर पर धर्मध्वज आरोहण: प्रत्येक रामभक्त की प्रार्थनाओं का साकार स्वरूप, सभ्यता के गौरवपूर्ण पुनरागमन का प्रतीक
 
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः।
 
इस मंगलाचरण के साथ हृदय में जिस दिव्यता का संचार होता है वह अयोध्या की पवित्र भूमि की उसी शाश्वत चेतना से जुड़ा है जिसने युगों युगों से मानवता को धर्म, मर्यादा और सत्य का मार्ग दिखाया है। भगवान श्रीराम का नाम लेते ही मन में जो भाव उमड़ता है वह किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि संपूर्ण समष्टि की उस अनुभूति का प्रतीक है जिसमें धर्म और मानवता एक दूसरे के पूरक माने जाते हैं। इसी भाव के साथ जब श्रीरामजन्मभूमि मंदिर के भव्य शिखर पर धर्मध्वज आरोहित किया गया तो ऐसा लगा जैसे सहस्राब्दियों से प्रतीक्षित वह क्षण अंततः मूर्त रूप में सामने आ गया है।
 
अंधकार का वक्ष चीरकर, फिर से सूरज निकला है।
भारतीय परिधान ओढ़कर, देखो जनमत निकला है।
बरस पांच सौ बाद धरा पर, फिर यह शुभ दिन आया है।
एक बार फिर अवधपुरी में, केसरिया लहराया है।
जय श्री राम 🚩
 
अयोध्या की पवित्र भूमि में जितनी शांति और पवित्रता निहित है उतनी ही गहनता में त्याग, तपस्या और समर्पण की अनादि परंपरा भी बसती है। त्रेतायुग में श्रीराम ने इसी धरती पर अवतार लेकर मानव समाज को न्याय, नीति, साहस, करुणा और मर्यादा का वह आदर्श प्रदान किया जिसे रामराज्य के नाम से जाना जाता है। समय के चक्र ने इस धरती पर अनेक परिवर्तन देखे, अनेक संघर्ष उत्पन्न हुए और अनेक युग बीते किन्तु श्रीराम के आदर्श आज भी उतनी ही दृढ़ता से मानवता का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। जब मंदिर के भव्य निर्माण की प्रक्रिया आरंभ हुई तो भारत के करोड़ों श्रद्धालुओं के हृदय में एक अद्भुत और अवर्णनीय भावना उमड़ पड़ी। यह भावना केवल किसी धार्मिक संरचना के निर्माण की नहीं थी बल्कि यह आत्मा के पुनर्जागरण और सभ्यता की गौरवपूर्ण वापसी का क्षण था।
 
मंदिर का निर्माण कोई साधारण कार्य नहीं था। जिस भूमि पर कभी प्रभु श्रीराम के चरण पड़े थे उस स्थान का पुनर्स्थापन सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए सम्मान, आस्था और आत्मगौरव का विषय था। जब वर्षों के संघर्ष, जनभावनाओं और आस्था के समर्पण के पश्चात यह निर्माण संभव हुआ तो प्रत्येक भारतीय के हृदय में एक दिव्य स्पंदन जागृत हुआ। भक्तों की अनगिनत प्रार्थनाएं, संतों की अनंत तपश्चर्या और समाज के प्रत्येक वर्ग का अथक योगदान इस पावन कार्य की नींव बना। जब प्रथम बार मंदिर का आकार स्पष्ट होने लगा और शिलाओं पर अद्भुत नक्काशी दिखाई देने लगी तो देश की आत्मा जैसे पुनर्जीवित हो उठी।
 
इस पूरे ऐतिहासिक कालखंड में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने राममंदिर निर्माण से जुड़ी प्रत्येक प्रक्रिया को केवल एक औपचारिकता के रूप में नहीं देखा बल्कि उसे अपने व्यक्तिगत भाव और राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना का विस्तार माना। भूमिपूजन से लेकर प्राण प्रतिष्ठा तथा अनेकों अवसरों पर प्रधानमंत्री जी की उपस्थिति ने इस संपूर्ण प्रक्रिया को एक विशिष्ट भक्ति भाव प्रदान किया। उनका यह आचरण जनमानस के बीच यह संदेश लेकर गया कि नेतृत्व वही है जो स्वयं को भी धर्म और संस्कृति के सामने नतमस्तक करता है। उनका यह समर्पण केवल एक प्रशासनिक भूमिका नहीं बल्कि एक भक्त की विनम्रता का प्रतीक था।
 
जब मंदिर की गर्भगृह में श्रीरामलला की दिव्य मूर्ति स्थापित हुई और प्राण प्रतिष्ठा का वह महाकाल आया तब संपूर्ण अयोध्या जैसे स्वर्ग के सौंदर्य में परिवर्तित हो गई। करोड़ों हिंदुओं की आंखों में एक साथ श्रद्धा, आनंद, संतोष और भावुकता की चमक दिखाई दी। यह दृश्य केवल धार्मिक आयोजन नहीं था बल्कि यह वह क्षण था जिसने एक साथ सदियों के दर्द, संघर्ष और प्रतीक्षा को शांत कर दिया। इसी भव्यता और आस्था के साथ, जब मंदिर का निर्माण अंतिम चरणों की ओर बढ़ा और शिखर पूर्णता प्राप्त करने लगा, तब धर्मध्वज के आरोहण का पावन समय आया।
 
धर्मध्वज का शिखर पर लहराना सनातन धर्म के गौरव का प्रतीक है। यह ध्वज केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं बल्कि धर्म की विजय, आदर्शों की स्थापना और सत्य की अजेयता का उद्घोष है। भारत की परंपरा में ध्वज वह शक्ति है जो दिशा दिखाती है, ऊर्जा प्रदान करती है और चरित्र को दृढ़ बनाती है। जब भगवान के मंदिर के शिखर पर यह ध्वज स्थापित होता है तो यह संदेश देते हुए स्थापित होता है कि यहां धर्म की सर्वोच्चता है और यहां से प्रकाश, शांति और सद्भावना का प्रसार सम्पूर्ण विश्व में होना है।
 
ध्वज के लहराने की गति में भी एक गूढ़ अर्थ निहित है। यह इस बात का संकेत है कि धर्म स्थिर नहीं बल्कि सदैव गतिमान है। उसका प्रवाह रुकता नहीं, उसका स्वरूप बदल सकता है पर उसके सिद्धांत अनादि और अटल बने रहते हैं। इस ध्वज में भगवा रंग का महत्व अत्यंत गंभीर है क्योंकि यह रंग त्याग, साहस, शौर्य और आध्यात्मिक तेज का प्रतिनिधित्व करता है। अयोध्या की हवा में जब यह रंग लहराता है तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे सम्पूर्ण वातावरण एक अदृश्य आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत हो उठा हो।
 
धर्मध्वज के आरोहण का वह दृश्य देखने वाले प्रत्येक भक्त के मन में एक ही भावना उठी कि यह क्षण केवल हमारे लिए नहीं बल्कि आने वाली अनगिनत पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन का स्तंभ बनेगा। यह न केवल आस्था का उत्सव था बल्कि भारतीयता की पुनर्प्रतिष्ठा का उत्सव भी था। यह पुष्टि थी कि भारत की सभ्यता समय की किसी भी चुनौती से पराजित नहीं हो सकती क्योंकि इसकी जड़ें धर्म, सत्य और मर्यादा में निहित हैं।
 
प्रधानमंत्री मोदी जी सहित अनेकों संतों, कारीगरों, संस्थाओं, स्वयंसेवकों और करोड़ों सामान्य नागरिकों की सहभागिता ने इस संपूर्ण यात्रा को एक असाधारण अध्याय बना दिया। इस निर्माण में जिन लोगों ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया वे सभी उसी आध्यात्मिक यज्ञ के सहभागी हैं जिसने भारत के सांस्कृतिक इतिहास को एक नई दिशा प्रदान की है। राममंदिर केवल संरचना नहीं बल्कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना का मंदिर बन गया है।
 
अयोध्या आज विश्व के आध्यात्मिक मानचित्र पर पुनः सुशोभित है। यहां आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक अजीब सी शांति और शक्ति का संचार होता है। यह अनुभव केवल किसी भक्त का अनुभव नहीं बल्कि एक सामान्य मानव भी यहां आकर स्वयं को सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण पाता है। यह वही स्थान है जहां से सत्य, शांति और करुणा का संदेश पूरे विश्व में प्रसारित होता है और धर्मध्वज का लहराना इस संदेश को और भी प्रभावशाली बना देता है।
 
अंततः जब शिखर पर धर्मध्वज स्थापित हुआ तो ऐसा लगा मानो स्वर्ग और पृथ्वी का मिलन हो गया हो। समस्त दिशाओं में उस समय जो पवित्र ध्वनि गूंजी वह इस बात का प्रमाण थी कि धर्म का प्रकाश किसी भी अंधकार को पराजित कर सकता है। यह केवल रामभक्तों का उत्सव नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा का क्षण था।
 
– क्या आप मानते हैं कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर का भव्य निर्माण भारतीय संस्कृति के अद्वितीय नवजागरण का प्रतीक है
 
– क्या आप मानते हैं कि धर्मध्वज का आरोहण आने वाली पीढ़ियों के लिए आध्यात्मिक प्रेरणा का अमर प्रतीक बनकर सदैव स्मरणीय रहेगा
 
हृदय की कलम से
 
आपका 
धनंजय सिंह खींवसर