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साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 163 वाँ
रफ्तार की रेस में पीछे छूट रही जिंदगी: सड़क सुरक्षा हम सबकी जिम्मेदारी
आज का दौर रफ्तार का है। हर कोई जल्दी में है, हर कोई किसी गंतव्य तक सबसे पहले पहुंचना चाहता है। शहरों की सड़कों से लेकर हाइवे तक, हर जगह गाड़ियों का शोर, हॉर्न की गूंज और तेज़ी से भागती ज़िंदगियाँ दिखाई देती हैं। लेकिन इसी रफ्तार की अंधी दौड़ में हम भूल रहे हैं कि सड़क पर सिर्फ गाड़ियाँ नहीं चलतीं, ज़िंदगियाँ चलती हैं। हर वाहन के साथ एक परिवार की उम्मीदें जुड़ी हैं, एक बच्चे का भविष्य जुड़ा है, एक माँ की प्रार्थना जुड़ी है।
पिछले कुछ समय में राजस्थान सहित देश के कई हिस्सों में जो भयावह सड़क हादसे हुए हैं, उन्होंने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। जयपुर में डम्पर हादसा, जैसलमेर के हाईवे पर बस दुर्घटना या फिर अन्य स्थानों पर हुई त्रासदियाँ…इन सबने यही दिखाया है कि सड़कें अब सिर्फ यात्रा का साधन नहीं रहीं, वे चेतावनी का आईना बन चुकी हैं।
समस्या सिर्फ सड़कों या सरकार की नहीं है। सरकार अपनी भूमिका निभा रही है, सड़कें चौड़ी हो रही हैं, नियम कड़े बनाए जा रहे हैं, हेलमेट और सीट बेल्ट की अनिवार्यता पर ज़ोर दिया जा रहा है। लेकिन इन सबके बावजूद अगर दुर्घटनाएँ नहीं रुक रहीं, तो हमें खुद से पूछना होगा कि गलती कहाँ है। जवाब सीधा है-हमारे भीतर सिविक सेंस की कमी है।
सड़क सुरक्षा का सबसे पहला नियम है- संयम। लेकिन यही गुण आज सबसे ज़्यादा लुप्त हो गया है। सिग्नल पर गाड़ी रोकना हमें बंधन लगता है, हेलमेट पहनना झंझट लगता है, और शराब पीकर गाड़ी चलाना कई लोगों को मज़े की बात लगती है। यही मानसिकता हर साल हजारों घरों को उजाड़ देती है।
सड़कें अगर सरकार बनाती है तो उन पर चलने का तरीका नागरिक तय करते हैं। कोई भी कानून तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक समाज उसका पालन करने की मानसिकता न विकसित करे। राजस्थान जैसे विशाल राज्य में सड़क नेटवर्क लगातार बढ़ रहा है, लेकिन उससे भी तेज़ बढ़ रही है लोगों की लापरवाही।
एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में हर साल लगभग दस हज़ार से अधिक सड़क हादसे दर्ज होते हैं। इनमें से अधिकांश मामलों में कारण है-तेज़ रफ्तार, ओवरटेकिंग, शराब या नशे की हालत में वाहन चलाना और ट्रैफिक नियमों की अनदेखी। ये आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं हैं, ये उन परिवारों की अधूरी कहानियाँ हैं जिनके प्रियजन कभी वापस नहीं लौटे।
हम अक्सर सोचते हैं कि तेज़ चलना समय बचाता है, लेकिन सच यह है कि तेज़ चलकर हम जीवन खो देते हैं। एक मिनट की जल्दबाज़ी किसी का पूरा जीवन छीन सकती है। सड़क सुरक्षा का अर्थ केवल चालान या पुलिस की कार्यवाही से नहीं है, बल्कि यह हमारे नैतिक और सामाजिक संस्कार का हिस्सा होना चाहिए।
बच्चों को बचपन से ही सिखाना चाहिए कि सड़क पर अनुशासन सबसे बड़ा शिष्टाचार है। जैसे हम घर में बड़ों का सम्मान करते हैं, वैसे ही सड़क पर नियमों का सम्मान करना भी एक सभ्य नागरिक का कर्तव्य है।
आज सड़क सुरक्षा की असली चुनौती है लोगों का व्यवहार। सिविक सेंस का अर्थ सिर्फ ट्रैफिक समझना नहीं है, बल्कि दूसरों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील होना है।
जब हम सड़क पर गाड़ी चलाते हैं, तो यह याद रखना चाहिए कि सामने वाले को भी घर लौटना है। कोई जल्दी में हो सकता है, कोई बुजुर्ग चल रहा हो सकता है, कोई बच्चा सड़क पार कर रहा हो सकता है। सड़क पर हमारी एक छोटी सी गलती किसी के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन सकती है।
आज कई हादसों की जड़ नशा है। शराब या ड्रग्स के नशे में वाहन चलाना न केवल अपराध है, बल्कि यह समाज के प्रति घोर असंवेदनशीलता भी है। नशे की हालत में निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है, रिएक्शन टाइम बढ़ जाता है और यह चंद सेकंड की चूक किसी निर्दोष की जान ले सकती है। कई पुलिस रिपोर्टों में यह सामने आया है कि सड़क पर हुई बड़ी दुर्घटनाओं के पीछे शराब पीकर गाड़ी चलाने की प्रवृत्ति सबसे बड़ी वजह रही है।
हमें समझना होगा कि नशा सिर्फ चालक के लिए नहीं, बल्कि उसके आस-पास चलने वाले सभी लोगों के लिए खतरा है। अगर समाज में हर व्यक्ति यह ठान ले कि नशे में गाड़ी नहीं चलाएगा, तो सड़क दुर्घटनाओं की संख्या आधी रह जाएगी।
भारतमाला जैसी परियोजनाओं से राजस्थान में सड़कें आधुनिक हो गई हैं, लेकिन अनुशासन नदारद है। कई लोग हाईवे को रेस ट्रैक समझ लेते हैं। ट्रक या डम्पर सड़कों पर मनमाने ढंग से खड़े कर दिए जाते हैं, जिससे पीछे से आने वाली गाड़ियों को टक्कर लग जाती है। इन घटनाओं को सिर्फ सरकारी गलती मान लेना उचित नहीं। नियमों के विरुद्ध सड़क किनारे वाहन खड़ा करना, ओवरलोडिंग करना या रिफ्लेक्टर लाइट न लगाना, ये सब नागरिक स्तर की लापरवाहियाँ हैं जिनके परिणाम घातक होते हैं।
सरकार अपनी शक्ति के अनुसार सुधार और नियम लागू करती है, लेकिन असली सुधार तभी संभव है जब समाज उस शक्ति का साथ दे। सरकार दंड दे सकती है, पर आत्मानुशासन सिखा नहीं सकती। वह जिम्मेदारी हमें खुद उठानी होगी।
हम क्या कर सकते हैं?
सड़क सुरक्षा कोई बड़ा अभियान नहीं, बल्कि रोजमर्रा का व्यवहार है। अगर हम चाहें तो हर दिन कुछ छोटे कदम उठाकर दुर्घटनाओं को घटा सकते हैं-
हमेशा निर्धारित गति सीमा में वाहन चलाएँ।
ट्रैफिक सिग्नल का पालन करें, चाहे सड़क खाली क्यों न हो।
हेलमेट और सीट बेल्ट का प्रयोग आदत बना लें।
नशे की हालत में कभी वाहन न चलाएँ।
थके हुए या नींद में वाहन चलाने से बचें।
सड़क पर खड़े वाहन को सही संकेतों से चिन्हित करें।
बच्चों और युवाओं को सड़क सुरक्षा का महत्व सिखाएँ।
अगर किसी समाज को समझदार बनाना है तो सिविक सेंस उसका पहला कदम है। सड़क पर हम जैसे व्यवहार करते हैं, वही हमारे अंदर के अनुशासन को दर्शाता है। हमें यह समझना होगा कि सड़कें किसी की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं हैं, यह सबकी साझा ज़िम्मेदारी हैं।
जब हर नागरिक यह महसूस करेगा कि सड़क सुरक्षा उसके अपने जीवन की सुरक्षा है, तब जाकर सच्चे अर्थों में बदलाव आएगा। यह जिम्मेदारी किसी एक विभाग या व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है।
आज ज़रूरत है एक ऐसे सामाजिक अभियान की जो रफ्तार की रेस से पहले जीवन की महत्ता सिखाए। हर घर, हर स्कूल और हर संस्थान में सड़क सुरक्षा पर बात होनी चाहिए। मीडिया में हादसों की संख्या नहीं, बल्कि सिविक सेंस के उदाहरण दिखाए जाने चाहिए।
सड़क सुरक्षा कानूनों से ही नहीं, संस्कारों से भी आती है। जब हम सड़क पर संयम रखेंगे, ट्रैफिक नियमों का पालन करेंगे और दूसरों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील होंगे, तभी सड़कें सुरक्षित बनेंगी और जीवन भी।
– क्या आप मानते हैं कि सड़क सुरक्षा केवल सरकार नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है?
– क्या आप मानते हैं कि सिविक सेंस ही वह शक्ति है जो रफ्तार को जीवन की रक्षा में बदल सकती है?
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर