रविवार का सदुपयोग – अंश : 160 वाँ

रविवार का सदुपयोग
 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश : 160 वाँ 
 
दीपोत्सव की रोशनी: मां और दादी सा की उज्ज्वल स्मृतियों के नाम
 
दीपज्योतिर्ब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं सन्ध्या दीप नमोऽस्तुते॥
 
इस वर्ष दीपावली मेरे लिए केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि स्मृतियों का एक दीप बन गई है। मैंने इस वर्ष अपने जीवन के दो सबसे प्रियजनों-अपनी माँ और दादी सा को खोया है। उनके जाने के बाद हर उत्सव, हर रोशनी, हर दीया जैसे अपने अर्थ खो बैठा है। जो दीपक पहले उनके आँगन में जगमगाते थे, अब मेरे हृदय में टिमटिमाते हैं। यह बिछोह ऐसा है कि हर रौशनी के बीच भी एक अनकहा अँधेरा पसरा हुआ है, फिर भी मैं दीपावली को केवल शोक का नहीं, बल्कि स्वीकार का पर्व मानता हूँ, अंधकार को पहचानकर भी प्रकाश को चुनने का साहस रखने वाला पर्व।
 
कहते हैं, दीपावली केवल बाहर की रोशनी का पर्व नहीं, यह भीतर के तमस को हराने की साधना है। माँ और दादी सा की स्मृतियाँ अब मेरे जीवन के दीप बन गई है…वे अब पास नहीं हैं, पर उनके संस्कार, उनकी बातें, उनका स्नेह मेरे भीतर जलते हुए दीपों की तरह मेरा मार्ग आलोकित करते हैं। उन्होंने सिखाया था कि जब मन दुखी हो, तब भी दीप अवश्य जलाना चाहिए क्योंकि अंधकार से भागने वाला नहीं, उसे दीप से जीतने वाला ही सच्चा साधक होता है।
 
जब मैं बचपन में दीयों में तेल भरता था, दादी कहती थीं-“हर दीपक में केवल तेल नहीं, आस्था डालना बेटा।” आज उनके शब्दों का अर्थ और गहराई से समझ पा रहा हूँ। दीप जलाना अब मेरे लिए एक रीति ही नहीं, बल्कि एक स्मरण बन गया है-उनकी मुस्कान का, उनके अपनत्व का, उस माँ के स्पर्श का जो मेरे बालों को सहलाते हुए कहती थी, “दीपावली का मतलब है अपने भीतर भी सफाई करना।” शायद यही कारण है कि आज जब मैं घर के कोने-कोने में दीप सजाता हूँ, तो हर लौ में उनकी उपस्थिति महसूस होती है, हर झिलमिल में उनका आशीर्वाद।
 
हमारे सनातन धर्म में दीप केवल एक प्रतीक नहीं है-यह ज्ञान, आशा, विजय और आत्मबोध का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि जैसे दीया स्वयं जलकर दूसरों को उजाला देता है, वैसे ही जीवन का सार भी देने में है, लेने में नहीं। माँ कहती थीं-“दीया जलाने से पहले मन में एक संकल्प लो कि किसी के जीवन में थोड़ा उजाला ज़रूर बनूंगा।” अब समझ आता है, शायद इसीलिए दीपावली केवल घर की नहीं, मन की सफाई का पर्व कहा गया है।
 
आज जब वे मेरे पास नहीं हैं, तब भी मैं उसी श्रद्धा से दीप जलाता हूँ, ताकि यह रोशनी केवल घर को नहीं, मेरे अंदर के रिक्त को भी भर सके।
 
दीपावली का अर्थ केवल पटाखों की चमक या मिठाइयों की मिठास नहीं है। यह भगवान राम के स्वागत का उद्घोष है, केवल अयोध्या नहीं, हमारे भीतर भी जब राम लौटते हैं, जब मर्यादा, सच्चाई और करुणा का पुनर्जागरण होता है, तभी असली दीपावली होती है। इसीलिए यह पर्व केवल धर्म का नहीं, अंतरात्मा के जागरण का पर्व है।
 
जब हम अपने प्रियजनों को खो देते हैं, तब उत्सवों का अर्थ बदल जाता है। पहले जो दीप हम उनके साथ जलाते थे, अब उनके लिए जलाते हैं। पहले जो मिठाई उनके हाथ से खाते थे, अब उनकी उससे जुड़ जाती है। पर शायद यही जीवन का चक्र है-हर अंत एक नए आरंभ की तरह हमें भीतर झाँकने का अवसर देता है।
 
इस वर्ष मेरे लिए दीपावली आत्मसंवाद की रात बन गई है। मैं जानता हूँ कि माँ और दादी सा इस समय कहीं न कहीं मुझे देख रही होंगी, मुस्कुरा रही होंगी और कह रही होंगी- “अंधकार कितना भी गहरा हो, पर दीप कभी बुझाना मत।”
 
दीपक की लौ सिखाती है-प्रकाश हमेशा ऊपर उठता है। यही उसका धर्म है, यही उसका स्वरूप। शायद इसलिए जब मन भारी हो, जब दिल के भीतर अंधेरा भरा हो, तब भी दीपक जलाने से भीतर एक सूक्ष्म-सी शांति उतर आती है। वह लौ मानो कहती है-“जो गया, वह प्रकाश बनकर शोभित है।”
 
मैंने संकल्प लिया है कि मैं हर उस व्यक्ति के जीवन में एक दीप बनूँ जो अंधकार से जूझ रहा है। माँ और दादी सा ने मेरे भीतर जो उजाला छोड़ा है, उसे बाँटना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
 
सनातन धर्म में दीपावली केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक तत्वज्ञान है। यह हमें सिखाती है कि हर आत्मा स्वयं में ज्योतिर्मय है, बस हमें उस ज्योति को पहचानने की आवश्यकता है। इसलिए चाहे जीवन में कितनी भी हानि हो, कितनी भी रात गहरी हो, दीप जलाना ही जीवन का उत्तर है।
 
 
 मेरे घर में दो दीप हैं – एक माँ की ममता का और दूसरा दादी सा के आशीर्वाद का। वे दोनों अब ईश्वर के आँगन में हैं, पर उनके प्रकाश से ही मेरा घर अब भी उजाला पा रहा है।
 
दीपावली का पर्व केवल “खुश रहने” का नहीं, “कृतज्ञ रहने” का पर्व है। जिनका साथ हमने पाया, उनका स्मरण करना भी एक साधना है। इसीलिए इस बार मैं केवल दीप नहीं जलाऊँगा, हर दीए में एक प्रार्थना रखूँगा कि यह रोशनी हर उस हृदय तक पहुँचे जो किसी प्रियजन को खोकर अकेला महसूस कर रहा है।
 
क्योंकि दीपावली का सच्चा अर्थ यही है, जहाँ अंधकार है, वहाँ थोड़ा-सा प्रकाश पहुँचा देना।
 
शुभ दीपावली
 
– क्या आप मानते हैं कि दीपावली केवल घरों में ही नहीं, हमारे विचारों में भी रोशनी भरने का अवसर है?
 
– क्या आप मानते हैं कि जिन प्रियजनों को हम खो देते हैं, वे हमारे जीवन की स्थायी रोशनी बन जाते हैं?
 
आपका 
धनंजय सिंह खींवसर