रविवार का सदुपयोग – अंश : 157 वाँ

 
रविवार का सदुपयोग
 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश : 157 वाँ 
 
दशहरा : अहंकार की अग्नि और ‘मैं’ का दहन
 
दशहरे का पर्व हर वर्ष हमें एक ही संदेश दोहराकर सुनाता है—असली युद्ध बाहर नहीं, भीतर है। दादाजी अक्सर कहा करते थे, “रावण को किसने मारा? रावण को ‘मैं’ ने मारा। और ‘मैं’ मतलब अहंकार।” उस समय यह वाक्य केवल एक पहेली सा लगता था, लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि जीवन का सबसे बड़ा रावण वास्तव में यही ‘मैं’ है। राम ने तो बाहर के रावण को पराजित किया, पर भीतर के रावण को हर इंसान को स्वयं हराना है।
 
रावण के दस सिर केवल पौराणिक कल्पना नहीं हैं, वे मनुष्य के भीतर पलने वाले दस प्रकार के अहंकारों का प्रतीक हैं। ज्ञान, धन, शक्ति, रूप, वंश, पद, संबंध, भक्ति, उपलब्धि और सबसे अंत में ‘मैं ही सबकुछ हूँ’ का अहंकार। ये दस सिर हर समय हमारे भीतर उठ खड़े होते हैं और जीवन को असंतुलित करते रहते हैं। जब-जब हम कहते हैं—“मैंने किया, मेरे कारण संभव हुआ, मेरे बिना कुछ नहीं”—तब-तब भीतर का रावण मुस्कराता है।
 
यदि गौर से देखा जाए तो रिश्तों के टूटने का सबसे बड़ा कारण भी यही अहंकार है। कितने ही परिवार केवल इसलिए बिखर जाते हैं क्योंकि कोई झुकना नहीं चाहता। मित्रताएँ अहंकार की दीवार पर आकर रुक जाती हैं। दफ्तरों में काम का माहौल बिगड़ता है क्योंकि किसी को लगता है कि वही सबसे श्रेष्ठ है। जीवन की अनगिनत समस्याओं का मूल यही है कि हम भीतर छिपे रावण को पहचानते नहीं।
 
इतिहास इस बात का प्रमाण है कि अहंकार कभी स्थायी नहीं रहा। बड़े-बड़े सम्राट, जिन्होंने स्वयं को अजेय माना, अंततः मिट्टी में मिल गए। आधुनिक समाज में भी यही दृश्य है—चाहे राजनीति हो, व्यापार हो या कला—जैसे ही अहंकार हावी हुआ, पतन भी उतनी ही तेजी से सामने आया। अहंकार ऐसा ज्वालामुखी है जो बाहर से चमकता है लेकिन भीतर से सबकुछ जला देता है।
 
राम और रावण का युद्ध वास्तव में दो मनोभावों का युद्ध है। राम—मर्यादा, विनम्रता और संयम का प्रतीक। रावण—अहंकार, मद और दंभ का प्रतीक। राम की साधारण सेना, उनके सीमित साधन, और उनका संयम यह बताते हैं कि विजय शक्ति से नहीं, विनम्रता से मिलती है। वहीं रावण की अपार शक्ति और विद्या भी उसके अहंकार के बोझ तले हार गई।
 
आज दशहरे के अवसर पर हम बड़े-बड़े मैदानों में रावण का पुतला जलाते हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भीतर का रावण भी जला? पटाखों की गूंज और आतिशबाज़ी के शोर के बीच अक्सर यह आत्ममंथन खो जाता है। पुतला जलाना प्रतीक है, लेकिन यदि इसके साथ आत्मा की अग्नि में अहंकार भी न जले, तो यह पर्व केवल एक उत्सव भर बनकर रह जाता है।
 
अहंकार को जलाने के लिए केवल धार्मिक अनुष्ठान काफी नहीं, जीवन में व्यवहारिक परिवर्तन भी जरूरी हैं। कृतज्ञता से भरा हुआ हृदय अहंकार को पिघलाने लगता है। जब हम दूसरों की भूमिका स्वीकार करते हैं, तब ‘मैं’ की पकड़ ढीली पड़ती है। सेवा का भाव, चाहे वह छोटी ही क्यों न हो, अहंकार को गलाने का सबसे सहज साधन है। ध्यान और आत्मचिंतन हमें भीतर का आईना दिखाते हैं—कि किस स्थिति में हमने अहंकार का प्रदर्शन किया और कहाँ हम विनम्र हो सकते थे।
 
आज के समय में अहंकार का सबसे बड़ा मंच सोशल मीडिया बन गया है। हर दिन हम देखते हैं कि लोग अपनी उपलब्धियों, अपनी जीवनशैली और अपनी छवि को दिखाने में लगे हैं। इसमें बुराई नहीं है, लेकिन जब यह सब दूसरों को छोटा दिखाने या स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने के लिए किया जाता है, तब यह अहंकार की अग्नि को और प्रज्वलित कर देता है। दशहरा हमें याद दिलाता है कि हमें केवल दिखावे का रावण नहीं, बल्कि आत्ममुग्धता का रावण भी जलाना है।
 
दादाजी की बातें आज भी मन में गूंजती हैं—“बाहर का रावण तो हर साल जलता है, लेकिन भीतर का रावण तभी जलेगा जब तुम उसे पहचानने का साहस करोगे।” दशहरा तभी सार्थक है जब हम हर वर्ष अपने भीतर के किसी एक अहंकार को जलाने का संकल्प लें। धीरे-धीरे, एक-एक करके, भीतर के दसों सिर समाप्त होंगे और आत्मा का दर्पण निर्मल होगा। यही असली विजयादशमी है।
 
दशहरा हमें यह सिखाता है कि जीवन की सबसे बड़ी जीत दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि स्वयं को जीतने में है। जब ‘मैं’ की दीवार ढह जाती है, तब सच्चा ‘हम’ प्रकट होता है। अहंकार की अग्नि से मुक्त होकर ही हम उस शांति और संतुलन को पा सकते हैं जिसे राम का जीवन हमें दिखाता है। बाहर के पुतले जलाना आसान है, भीतर का पुतला जलाना कठिन। परंतु जो इस कठिनाई को पार कर लेता है, वही जीवन का असली विजेता कहलाता है।
 
– क्या आप मानते हैं कि दशहरा तभी सार्थक है जब हम केवल बाहर का नहीं, बल्कि भीतर का रावण भी जला पाएं?
 
– क्या आप मानते हैं कि अहंकार पर विजय ही जीवन की सबसे बड़ी विजय है?
 
हृदय की कलम से
 
आपका 
धनंजय सिंह खींवसर