
रविवार का सदुपयोग
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 156 वाँ
दादीसा, आपका आशीर्वाद हर पल हमारे साथ है, एक दिन हम ज़रूर फिर मिलेंगे…!
दादीसा, आज जब मैं यह लिख रहा हूँ तो हाथ कांप रहे हैं, भावनाएँ उमड़ रही हैं…आंखें अश्रुपूरित हैं…और मन भावुकता के अतिरेक से भर आया है। पहले माँ का जाना और अब आपका हमसे यूं दूर हो जाना…एक वज्राघात है। मैं जानता हूं कि यह बिछोह सिर्फ लौकिक है लेकिन आपके जाने से जीवन में जो खालीपन आया है, उसे कोई भी भर नहीं सकता। मंच पर खड़ा होकर मैंने लाखों लोगों की तालियाँ सुनी हैं, सभाओं में जयकारे सुने हैं, दुनिया ने मुझे एक सार्वजनिक व्यक्तित्व के रूप में पहचाना है लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मेरी सबसे बड़ी पहचान तो आपके आशीर्वाद में ही थी। आपकी छाया में जो आत्मविश्वास और संबल मिला, वह किसी किताब या ताली से कभी नहीं मिल सकता।
आपका व्यक्तित्व अद्वितीय था। विवाह पूर्व आप जम्मू-कश्मीर के पूंछ की राजकुमारी थीं। वह शाही गरिमा, वह संस्कार और वह मर्यादा आपके हर हाव-भाव में दिखाई देती थी। विवाह के बाद जब आप खींवसर परिवार में आईं तो भी आपने अपनी पृष्ठभूमि को केवल शान के रूप में नहीं रखा, बल्कि उसे सेवा, संस्कार और परंपरा के साथ जोड़ दिया। आपके वचनों में विनम्रता थी, चाल-ढाल में आत्मगौरव और व्यवहार में अपनापन। जब आप घर में प्रवेश करतीं तो एक आभा-सी फैल जाती। परिवार और रिश्तेदार ही नहीं, गाँव और समाज भी आपको उसी आदर से देखते थे।
आपके ज्ञान का विस्तार अद्भुत था। छह विभिन्न भाषाओं में आप धाराप्रवाह संवाद कर सकती थीं। यह केवल विद्वता का प्रमाण नहीं था, बल्कि यह आपके खुले दृष्टिकोण और संस्कार का दर्पण था। आपने हम सबको सिखाया कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृतियों को जोड़ने का सेतु है। जब आप संस्कृत के श्लोक सुनातीं तो लगता जैसे स्वयं परंपरा बोल रही है और जब आप अंग्रेज़ी में सहजता से बात करतीं तो लगता जैसे आधुनिकता आपकी सहेली है। आपने यह सिखाया कि विद्या का अर्थ केवल ज्ञान बटोरना नहीं, बल्कि जीवन को गढ़ना है।
धार्मिक अनुष्ठानों और संगीत के प्रति आपका प्रेम मुझे हमेशा प्रेरित करता रहा। हर व्रत, हर पूजा और हर अनुष्ठान में आपकी भागीदारी केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं होती थी, बल्कि उसमें आत्मा की गहराई होती थी। आप जब आरती गाती थीं तो लगता था कि पूरा वातावरण पवित्र हो गया है। आपके स्वर में भक्ति और संगीत का ऐसा संगम होता था जो किसी भी थके हुए मन को शांति दे सकता था। आपने मुझे सिखाया कि संगीत केवल स्वर नहीं, बल्कि आत्मा का सबसे सुंदर संवाद है।
दादीसा, आप केवल हमारी बुज़ुर्ग नहीं थीं, आप हमारे संस्कारों की जीती-जागती पाठशाला थीं। आप कहानियों के माध्यम से हमें जीवन के बड़े-बड़े सत्य सिखा देती थीं। कभी पंचतंत्र की कथाएँ, कभी लोककथाएँ, कभी अपने जीवन के अनुभव – हर कहानी में शिक्षा और अपनापन होता था। आपने हमें यह समझाया कि सफलता और लोकप्रियता तभी सार्थक हैं जब वे विनम्रता और चरित्र से जुड़ी हों। आपने कहा था, “भीड़ का शोर भले ही बड़ा लगे, लेकिन आत्मा की आवाज़ ही सच्चा मार्ग दिखाती है।” यह वाक्य आज भी मेरे जीवन की दिशा है।
जब मैं छोटा था और आपकी गोदी में सिर रखकर कहानियाँ सुनता था तो लगता था कि दुनिया में कोई डर नहीं है। आपकी गोद सबसे सुरक्षित स्थान थी। समय बीतता गया, मैं बड़ा हुआ, जिम्मेदारियाँ बढ़ीं, मंच और समाज में पहचान मिली, लेकिन हर बार जब चुनौती सामने आती, तो आपके चेहरे की मुस्कान और आशीर्वाद मेरी ढाल बन जाते। आप बहुत कम बोलती थीं, लेकिन आपके मौन में भी गहरी शिक्षा छुपी रहती थी।
आपने हमेशा संयम और धैर्य का महत्व बताया। कठिन परिस्थितियों में भी आपका चेहरा शांत और स्थिर रहता था। जब घर में कोई समस्या आती तो आप घबराती नहीं थीं, बल्कि सहज भाव से कहतीं – “समस्या कितनी भी बड़ी हो, धैर्य उससे बड़ी ताकत है।” शायद यही कारण है कि परिवार के सभी लोग आपके पास आकर सुकून महसूस करते थे। आपने हमें सिखाया कि जीवन का सबसे बड़ा धन धैर्य और विश्वास है।
आपके अंतिम दिनों की स्मृतियाँ आज भी मन को भिगो देती हैं। वह शांत चेहरा, वह आशीर्वचन जैसी मुस्कान, वह दृढ़ नज़रें, सब कुछ जैसे कह रही थीं कि आप जा नहीं रही हैं, बस एक अनंत यात्रा पर निकल रही हैं। जब आपने आखिरी बार मेरा हाथ पकड़ा था, तो लगा जैसे आप सब कुछ कह गईं…. आशीर्वाद भी, दुआ भी और हौसला भी। आपकी वह पकड़ आज भी मेरे हाथों पर महसूस होती है।
आपके जाने के बाद जीवन खाली-खाली सा लगता है, लेकिन जब भी कोई निर्णय लेता हूँ, जब भी कोई सफलता मिलती है, तो महसूस करता हूँ कि आप कहीं न कहीं पास ही हैं। हर पल, हर सांस में आपका आशीर्वाद साथ है। दादीसा, आपने हमें जो धरोहर दी है, वह केवल संपत्ति नहीं, बल्कि संस्कारों और मूल्यों की अनमोल पूंजी है।
आज जब मैं आपको याद करता हूँ तो लगता है कि आपने हमें दो सबसे बड़ी विरासतें दीं- विद्या और मर्यादा। विद्या ने हमें आत्मविश्वास दिया और मर्यादा ने हमें सही राह दिखाई। यही वह नींव है जिस पर खींवसर परिवार आज भी मजबूत खड़ा है। आप नहीं हैं, लेकिन आपका आशीर्वाद, आपके संस्कार और आपकी छवि हमारे हर निर्णय और हर कदम में विद्यमान है।
दादीसा, आपसे बिछड़ना केवल एक बुज़ुर्ग को खोना नहीं है, यह पूरे परिवार की आत्मा का एक हिस्सा खोना है। लेकिन मुझे विश्वास है कि यह बिछड़ना केवल अस्थायी है। हम एक दिन फिर मिलेंगे, एक ऐसे लोक में जहाँ न दूरी होगी न वियोग। तब तक आपके आशीर्वाद के साथ, आपकी स्मृतियों के सहारे, आपकी शिक्षाओं की रोशनी में हम अपनी राह चलते रहेंगे।
– क्या आप मानते हैं कि हमारे जीवन का असली आधार बुज़ुर्गों के आशीर्वाद और उनके दिए संस्कार ही होते हैं?
– क्या आप मानते हैं कि विद्या और मर्यादा का संगम ही किसी परिवार की सबसे बड़ी विरासत है?
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर