
रविवार का सदुपयोग
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 152 वाँ
खास बनाम आम: राजनीति ने खड़ी की दीवारें, इंसानियत है सर्वोपरि
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
मनुष्य के जीवन की सबसे सुंदर सच्चाई यह है कि वह मूल रूप से स्वतंत्र और समान पैदा होता है। किसी के माथे पर “खास” या “आम” का लेबल जन्म से नहीं लिखा होता। यह भेद समाज की रचना है, जिसे समय के साथ राजनीति ने और गहरा किया। कभी संपन्नता के आधार पर, कभी पद और प्रभाव के आधार पर, कभी बाहरी आडंबर के नाम पर बार-बार लोगों के बीच दीवारें खड़ी की गईं। यह दीवारें पत्थर की नहीं, मानसिकता की थीं और सबसे कठिन इन्हें तोड़ना होता है।
समाज में हमेशा कुछ लोग अधिक संसाधनों, पदों या अवसरों के साथ रहे हैं और कुछ कम साधनों में जीवन बिताते हैं। समय के साथ इसने एक मानसिक दूरी पैदा कर दी। जिसने भी अधिक सामर्थ्य पाई, उसके चारों ओर एक अदृश्य ऊँचाई का घेरा बन गया। जिनके पास यह साधन नहीं थे, उन्हें यह महसूस कराया गया कि वे उस घेरे से बाहर हैं और वहीं रहना उनका “स्थान” है।
राजनीति ने इस भेद को अपने हित में इस्तेमाल किया। एकजुट जनता जागरूक और सवाल पूछने वाली होती है, लेकिन बँटी हुई जनता को दिशाहीन करना आसान होता है। इसलिए, खास बनाम आम की मानसिकता को पाला-पोसा गया। कभी किसी को “उच्च वर्ग” कहा गया, कभी किसी को “प्रतिष्ठित”, तो कभी किसी को “प्रभावशाली” बताकर अलग पहचान दी गई। धीरे-धीरे यह धारणा बनने लगी कि सब इंसान बराबर नहीं हैं।
संपन्नता और पद के आधार पर विभाजन की यह आदत इतनी गहरी बैठ गई कि आज भी हमारे व्यवहार में दिखती है। जिनके पास अधिक साधन हैं, उनके सामने हमारी भाषा बदल जाती है, आवाज़ धीमी हो जाती है, और कई बार आत्मविश्वास खो जाता है। यह सब इस सोच का नतीजा है कि उनके पास हमारे मुकाबले ज़्यादा मूल्य है। लेकिन सच यही है कि संसाधनों की उम्र बहुत छोटी होती है। आज किसी के पास बहुत कुछ है, कल वह परिस्थितियों से खाली हाथ भी हो सकता है। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है जहाँ बड़े-बड़े नाम समय के साथ धुंधले हो गए, और साधारण माने जाने वाले लोग अपने कर्मों से अमर हो गए।
हम अक्सर भूल जाते हैं कि बाहरी पहचानें.. जैसे कपड़े, घर, वाहन, उपाधियाँ.. अस्थायी हैं। इनका असर सिर्फ आँखों को भाता है, आत्मा को नहीं। किसी व्यक्ति के आँसू किसी और से अलग नहीं होते, किसी का दर्द किसी और से हल्का नहीं होता। दिल टूटने की आवाज़ हर दिल में एक सी होती है, चाहे वह किसी आलीशान जगह में गूँजे या किसी साधारण कमरे में।
इंसानियत की असली परिभाषा इस बराबरी में है। जब हम बिना किसी पद, साधन, या प्रभाव को देखे किसी को अपनाते हैं, तब इंसानियत जीवित रहती है। हर व्यक्ति के भीतर वही लाल रक्त बहता है, सबकी आँखों में सपनों की चमक होती है, सबकी आत्मा खुशियों और दुखों के रंगों को एक समान महसूस करती है।
राजनीति और सामाजिक सोच ने इन समानताओं को छुपाने का बड़ा काम किया। लोगों को यह विश्वास दिलाया गया कि किसी विशेष पहचान के साथ जन्म लेना अपने आप में एक उपलब्धि है, और उसके बिना होना एक कमी। यह सोच न केवल गलत है, बल्कि इंसानियत के विरुद्ध है।
सच्चाई यह है कि मनुष्य का मूल्य उसके कर्मों से तय होता है, न कि उसके जन्म से। अगर कोई अधिक साधन पाकर भी स्वार्थी और कठोर है, तो उसका चरित्र छोटा है। वहीं, अगर कोई सीमित साधनों के साथ भी ईमानदारी, दया और सेवा के मार्ग पर चलता है, तो वह सबसे ऊँचा है।
हमारे समान होने का सबसे बड़ा प्रमाण मृत्यु है। न कोई अपने साथ पद लेकर जाता है, न धन-संपत्ति। अंत में सबकी राख एक जैसी होती है और सब धरती में मिल जाते हैं। जब अंत इतना समान है तो बीच का सफर अलग कैसे हो सकता है?
अगर हम सच में एक बेहतर समाज बनाना चाहते हैं, तो सबसे पहले यह मानसिक दीवारें तोड़नी होंगी। हमें यह समझना होगा कि पैसा, पद, पहचान… ये सब साधन हैं, लक्ष्य नहीं। लक्ष्य है, सबके साथ न्याय और करुणा से व्यवहार करना। जिस दिन हम खास और आम के भेद से ऊपर उठकर हर इंसान को सिर्फ इंसान मानेंगे, उसी दिन असली समानता और स्वतंत्रता का सूरज उगेगा।
आज हमें खुद से यह सवाल पूछना होगा… क्या हम किसी को सिर्फ उसके कपड़े, साधन या उपाधि के आधार पर ज़्यादा सम्मान देते हैं? क्या हम खुद को “छोटा” मान लेते हैं सिर्फ इसलिए कि हमारे पास वैसी भौतिक सुविधाएँ नहीं हैं? अगर जवाब हाँ है, तो हमें अपनी सोच बदलने की जरूरत है। हमें याद रखना चाहिए कि जो हाथ किसी सम्पन्न व्यक्ति के लिए नमस्ते करते हैं, वही हाथ किसी ज़रूरतमंद के आँसू पोंछ सकते हैं। और यही मानवता है।
हर व्यक्ति में वही जीवन-ऊर्जा है जो हमारे भीतर है। उसकी खुशी भी हमारी खुशी जैसी है, उसका दर्द भी उतना ही गहरा है जितना हमारा। खास और आम का यह भेद केवल एक भ्रम है, और इस भ्रम को जितनी जल्दी तोड़ेंगे, उतनी जल्दी हम एक सच्चे, बराबरी वाले समाज की ओर बढ़ेंगे।
-क्या आप मानते हैं कि समाज में खास और आम का भेद सिर्फ एक मानसिक भ्रम है जिसे राजनीति ने जीवित रखा है?
-क्या आप मानते हैं कि इंसानियत की असली पहचान पद, पैसा और साधनों से ऊपर है?
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर