
रविवार का सदुपयोग
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 151 वाँ
संयम : हमारे जीवन का सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र है।
श्लोक:
“संयमे सर्वभूतेषु यो ददाति स्थिरामतिम्।
स एव विजयी लोके, न च तं विजयं जयेत्॥”
संयम एक ऐसा गुण है जो सुनने में अत्यंत साधारण लगता है पर जब इसे जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं तब यह तपस्या के समान कठिन जान पड़ता है। संयम कोई बाहरी अभ्यास नहीं है, यह तो भीतर का बल है, जो मनुष्य को किसी भी परिस्थिति में टिके रहने की शक्ति देता है। यह वो ऊर्जा है जो बिना शोर के भी बहुत कुछ कह जाती है और बिना प्रतिक्रिया दिए भी इतिहास रच देती है। संसार में जब-जब मनुष्य ने संयम को अपना जीवन-सहचर बनाया है, तब-तब उसने स्वयं को भी पाया है और समाज को भी दिशा दी है। संयम को आत्मा की वह तलवार कहा जा सकता है जो अहंकार, मोह, क्रोध और अविवेक को काटकर विवेक और संतुलन की राह दिखाती है।
हमारे जीवन में अनेक अवसर ऐसे आते हैं जब मन करता है कि तुरंत प्रतिक्रिया दी जाए, तुरंत बोल दिया जाए, कुछ कर गुजरें। परंतु जो व्यक्ति जानता है कि क्या, कब और कितना करना है, वही संयमी कहलाता है। संयम का अर्थ यह नहीं कि आप डरकर चुप हैं, बल्कि यह है कि आप समय का सम्मान कर रहे हैं। वह व्यक्ति जो परिस्थितियों से टकरा नहीं रहा, बल्कि उन्हें पार करने का धैर्य रखता है—वही संयमी होता है। संयम केवल चुप रहना नहीं, बल्कि भीतर से जागरूक रहना है कि कब बोलना है, कब नहीं बोलना है, कब रुकना है, कब चलना है।
हम यह भी देखते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी गलतियां तब होती हैं जब हम असंयमित हो जाते हैं—चाहे वह वाणी हो, विचार हो, भोजन हो, व्यवहार हो या निर्णय। एक छोटा सा उकसावा भी यदि हम पर हावी हो जाए, तो वह जीवन को चौराहे पर ले जाकर खड़ा कर सकता है। और यही कारण है कि संयम को ब्रह्मास्त्र की उपाधि दी गई है। यह वह शक्ति है जो मनुष्य को क्षणिक भावनाओं से निकालकर दूरदर्शी बनाती है। यह हमें आवेगों के बवंडर से निकालकर विवेक के किनारे पर ला खड़ा करती है।
हर व्यक्ति के जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जो निर्णायक होते हैं। ऐसे क्षणों में ही व्यक्ति की पहचान बनती है। किसी ने कुछ कह दिया, किसी ने बदनाम कर दिया, किसी ने अपमानित किया, किसी ने आपकी कोशिशों का मज़ाक उड़ा दिया—इन सभी स्थितियों में यदि आप संयम रख पाए, तो मान लीजिए आपने खुद पर विजय पा ली। खुद पर विजय ही असली विजय है, क्योंकि जब मन पर नियंत्रण होता है, तभी बाहरी परिस्थितियां नियंत्रण में आ सकती हैं। व्यक्ति बाहरी दुनिया से तभी जीत सकता है जब वह अपने भीतर की दुनिया से न हारा हो।
कभी-कभी लोग समझते हैं कि संयम तो बुजदिली का दूसरा नाम है, लेकिन वास्तव में संयम ही सबसे बड़ा साहस है। किसी को जवाब देना आसान है, लेकिन चुप रहकर इंतजार करना मुश्किल है। किसी को नीचा दिखाना सरल है, लेकिन समय को न्याय करने देना कठिन है। संयम उसी व्यक्ति में होता है जिसने अपने अहंकार को परे रख दिया हो और जीवन की गहराई को समझ लिया हो। जिसने यह जान लिया हो कि क्षणिक प्रतिक्रिया से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक दृष्टि से जीवन का मार्ग तय होता है।
वास्तविक सफलता उन्हीं लोगों को मिलती है जो संयम के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। कभी-कभी कोई सपना दिखता है, लेकिन उसके पूरे होने में समय लगता है। उस समय के अंतराल में मन अक्सर बेचैन होता है, संदेह करता है, लेकिन संयमी व्यक्ति उसी समय को अपनी परीक्षा की घड़ी मानकर स्थिर बना रहता है। वह जानता है कि हर बीज को वृक्ष बनने में समय लगता है। वह जानता है कि फल आने से पहले धूप-बारिश झेलनी पड़ती है। वह जानता है कि तपस्या बिना फल नहीं देती, और इसलिए वह ठहरता है, मगर रुकता नहीं।
हमारे अपने जीवन में भी हमने यह अनुभव किया कि जब हमने खींवसर में यह ठाना कि वहां कमल खिलाना है, तो उसके लिए केवल योजना या प्रयास नहीं किए, बल्कि संयम का मार्ग भी चुना। हमारे ऊपर सवाल उठे, भ्रम फैलाए गए, तरह-तरह की बातें की गईं। परंतु हमने कोई आक्रोश नहीं दिखाया, कोई उत्तेजना नहीं प्रकट की। न प्रतिकार किया, न प्रतिक्रिया दी। हमने केवल एक संकल्प किया और फिर उसे समय के सुपुर्द कर दिया। हमने ठान लिया कि हम वाणी से नहीं, कार्य से उत्तर देंगे। हम जानते थे कि सत्य को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, समय ही उसका सबसे बड़ा साक्षी होता है। और वही हुआ..खींवसर में कमल पूरी शान से खिला है। यह उस संयम की जीत है जो वर्षों से भीतर संजोकर रखा गया था। यह कोई साधारण सफलता नहीं, यह एक प्रतीक है उस मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति का, जिसे संयम कहते हैं।
यह उदाहरण केवल एक स्थान की कहानी नहीं है, यह उन हजारों जीवनों की कहानी है जो अंदर से मजबूत हैं, लेकिन बाहर से शांत। जो बोलते नहीं, पर समय आने पर इतिहास रचते हैं। संयम वह वृक्ष है जिसकी जड़ें भीतर गहरी होती हैं और फल बाहर मीठे होते हैं। यह हमें न केवल परिस्थितियों से पार ले जाता है, बल्कि हमें खुद को समझने और स्वीकार करने का अवसर भी देता है।
वर्तमान समय में, जब सोशल मीडिया, त्वरित संवाद और ऊपरी प्रतिक्रिया का युग चल रहा है, संयम और भी अधिक मूल्यवान हो गया है। आज हर कोई तुरंत जवाब देना चाहता है, तुरंत टिप्पणी करना चाहता है, तुरंत निर्णय लेना चाहता है। ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति ठहर सकता है, सोच सकता है, और सही समय की प्रतीक्षा कर सकता है, तो वही सच्चा साधक है, वही विजेता है। संयम केवल आत्म-नियंत्रण नहीं है, यह आत्म-ज्ञान का प्रवेश द्वार है। जब तक हम स्वयं को नहीं जान लेते, हम किसी और को नहीं समझ सकते। और स्वयं को जानने का मार्ग तभी खुलता है जब हम खुद को नियंत्रित करना सीखते हैं।
संयम का फल हमेशा मीठा होता है। भले ही शुरुआत में वह कड़वा लगे, लेकिन अंततः वह हमारी आत्मा को तृप्त करता है। यह केवल एक नैतिक गुण नहीं, यह जीवन जीने की कला है। यह हमें सिखाता है कि कब लड़ना है, कब शांत रहना है, कब कहना है, कब चुप रहना है, कब प्रयास करना है, और कब उस प्रयास के परिणाम की प्रतीक्षा करनी है। यदि व्यक्ति यह सब सीख जाए, तो समझिए उसने जीवन को जीत लिया।
हर धर्म, हर दर्शन, हर महापुरुष ने संयम की महिमा गाई है। क्योंकि यह एक सार्वभौमिक सत्य है—संयम से बड़ा कोई धर्म नहीं, संयम से बड़ी कोई साधना नहीं, संयम से बड़ी कोई विजय नहीं। यह ब्रह्मास्त्र है, परंतु इसका प्रयोग बाहरी युद्ध में नहीं, आंतरिक युद्ध में होता है। यही वह अस्त्र है जो मनुष्य को न केवल समाज में श्रेष्ठ बनाता है, बल्कि आत्मा के स्तर पर भी उच्च बनाता है।
क्या आप मानते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी लड़ाइयाँ हमारे भीतर ही लड़ी जाती हैं, और उन्हें जीतने के लिए संयम सबसे प्रभावशाली शस्त्र है?
क्या आप मानते हैं कि यदि हम वाणी, विचार, व्यवहार और निर्णयों में संयम रख सकें, तो हमारा भविष्य अधिक सशक्त, शांत और सार्थक बन सकता है?
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर