
रविवार का सदुपयोग
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 149 वाँ
सफलता का रहस्य, निरंतर प्रयास और कभी हार न मानने में है।
“खम ठोक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़!
मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।”
-राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’
ये पंक्तियाँ महज़ कविता नहीं हैं, यह संघर्ष और संकल्प का सिंहनाद हैं। दिनकर जी की लेखनी में जो आग है, वह केवल भाषाई सौंदर्य नहीं बल्कि आत्मबल की पुकार है। जब भी जीवन में चुनौतियाँ सिर उठाएँ, यह पंक्तियाँ हमें याद दिलाती हैं कि मनुष्य में पर्वतों को हिलाने की क्षमता है बशर्ते वह थके नहीं, झुके नहीं और कभी हार न माने।
सफलता, जितनी आकर्षक बाहर से दिखती है, उतनी ही कठिन और गहरी होती है उसकी यात्रा। यह कोई एक घटना नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है जिसमें बार-बार गिरना, फिर उठना और फिर दोबारा प्रयास करना शामिल होता है। सफलता उस व्यक्ति को मिलती है जो ठान लेता है कि हार को अंतिम नहीं बनने देगा। जीवन में बार-बार ऐसे क्षण आते हैं जब सब कुछ व्यर्थ लगने लगता है, रास्ता धुंधला हो जाता है, मन थकने लगता है और लगता है कि अब और नहीं हो पाएगा लेकिन इसी पड़ाव पर जो व्यक्ति एक और क़दम उठाता है, वही जीवन की दिशा बदल देता है।
इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जहाँ मनुष्य की जिद, निरंतर प्रयास और धैर्य ने असंभव को संभव में बदला है। थॉमस एडिसन ने लगभग 10,000 बार प्रयोग किए तब जाकर बल्ब की खोज की। जब उनसे पूछा गया कि क्या वे 10,000 बार असफल हुए तो उन्होंने जवाब दिया — “I have not failed. I’ve just found 10,000 ways that won’t work.” यही सोच उन्हें महान बनाती है।
भारत में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जिन्होंने एक बेहद साधारण परिवार से निकलकर विज्ञान, रक्षा और राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया, उन्होंने कभी अपनी परिस्थितियों को आड़े नहीं आने दिया। एक मछुआरे का बेटा जो समाचार पत्र बाँटता था, उसने बाद में मिसाइल टेक्नोलॉजी से लेकर राष्ट्रपति बनने तक की यात्रा केवल अपने अनवरत प्रयासों, धैर्य और विज़न के बल पर तय की। उन्होंने कहा था — “Man needs difficulties in life because they are necessary to enjoy the success.”
हमें सफलता को केवल अंत के रूप में नहीं बल्कि उस पूरी यात्रा के रूप में देखना चाहिए जो हम हर दिन तय करते हैं। यह यात्रा कभी आसान नहीं होती। अक्सर लोग यह सोचते हैं कि सफल लोग विशेष होते हैं या उन्हें किसी विशेष वरदान की प्राप्ति होती है। लेकिन सच्चाई यह है कि हर सफल व्यक्ति के जीवन में ऐसा मोड़ आता है जहाँ वह चाहता है कि सब छोड़ दे लेकिन वहीं पर वह नहीं रुकता, वह चलता रहता है। यही फर्क बनाता है.. हार मानने वालों और इतिहास लिखने वालों में।
कभी-कभी हम अपने प्रयासों से थक जाते हैं, विशेषकर जब परिणाम सामने नहीं आता। लेकिन यही वह समय होता है जब हमारे संकल्प की अग्निपरीक्षा होती है। जो उस अग्नि में जलता है, वही निखरकर बाहर आता है। बाँस के पेड़ का उदाहरण याद कीजिए… पाँच साल तक वह ज़मीन के नीचे ही अपनी जड़ों को फैलाता रहता है, बिना किसी बाहरी वृद्धि के। पाँच साल बाद वह अचानक इतनी तेज़ी से बढ़ता है कि हफ्तों में ही 90 फीट तक पहुँच जाता है। यही होता है हमारे प्रयासों का भी परिणाम.. वे धीरे-धीरे पकते हैं और फिर एक दिन सफलता के रूप में फूटते हैं।
सफलता के पीछे सबसे ज़रूरी है-निरंतरता। एक दिन नहीं, एक हफ्ता नहीं, बल्कि तब तक जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।
जीवन में कई बार हम अपने आस-पास के लोगों से प्रभावित होकर यह सोचते हैं कि शायद उनके पास कुछ विशेष है, लेकिन सच्चाई यह है कि हम सभी के पास प्रयास करने की समान क्षमता होती है। फर्क होता है सोच में, जज़्बे में और उस आग में जो हमें हर बार उठने को कहती है।
सोहनलाल द्विवेदी जी ने लिखा है –
“लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।”
हमारे अंदर वह शक्ति है जो आकाश को छू सकती है। लेकिन अक्सर हम उस शक्ति को पहचानते ही नहीं क्योंकि हम बाहरी दुनिया की तुलना में खो जाते हैं। जीवन में सबसे पहले हमें खुद पर विश्वास करना होता है। जब आत्म-विश्वास जागता है, तभी हम प्रयास करना शुरू करते हैं। जब प्रयास लगातार होता है, तब सफलता धीरे-धीरे हमारे क़दम चूमने लगती है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि असफलता भी उतनी ही मूल्यवान होती है जितनी सफलता। कई बार हमें वही सिखाती है जो सफलता कभी नहीं सिखा सकती। वह सुधार की जगह दिखाती है, हमारी रणनीति को नया दृष्टिकोण देती है। यही कारण है कि कई बार असफलता के बाद की सफलता कहीं अधिक प्रभावशाली होती है। वह केवल उपलब्धि नहीं होती, वह व्यक्तित्व का पुनर्जन्म होती है।
सफलता की इस यात्रा में प्रेरणा एक आवश्यक ईंधन है। प्रेरणा केवल बाहर से नहीं, भीतर से भी आनी चाहिए। जब भी हम डगमगाते हैं तो हमें अपने लक्ष्यों की याद आनी चाहिए। हमें उन संघर्षों को याद करना चाहिए जो हमने अब तक पार किए हैं। हमें खुद से यह कहना चाहिए- “मैं यहाँ तक पहुँचा हूँ तो अब क्यों रुकूँ?” यही आत्म-संवाद हमें फिर से चलने की शक्ति देता है।
1. क्या आप मानते हैं कि हर असफलता हमें सफलता के और करीब ले जाती है बशर्ते हम प्रयास न छोड़ें?
2. क्या आपने अपने जीवन में कोई ऐसा क्षण जिया है जब निरंतर प्रयास और न हार मानने के कारण आपकी किस्मत ने करवट ली?
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर