रविवार का ब्लॉग – अंश : 148 वाँ


रविवार का ब्लॉग

 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | इस संवाद में मेरे मन के भाव
 
अंश : 148 वाँ 
 
संस्कार, सेवा और संगठन की नींव पर खड़ा है भारत का भविष्य
 
समन्वयं धर्मं अनुयाति सर्वः, एकं मनः सर्वजनस्य स्यात्।
एकं वचः सर्वजनस्य स्यात्, एकं हृदयं सर्वजनस्य स्यात्॥
(ऋग्वेद 10.191.4)
 
ऋग्वेद का यह श्लोक केवल आध्यात्मिक निर्देश नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की सामाजिक योजना का सूत्र है। जब जन-जन एकमन होकर, एक हृदय से, एक भाषा में आगे बढ़ेगा, तब ही राष्ट्र का सामूहिक लक्ष्य साकार हो सकेगा। भारत की आत्मा मूलतः सामूहिक चेतना से बनी है। यहाँ व्यक्ति नहीं, समुदाय चलता है। लेकिन इस समुदाय को दिशा और गहराई मिलती है संस्कारों से, गति मिलती है सेवा से और स्थायित्व मिलता है संगठन से।
 
भारत का इतिहास साक्षी है कि जब भी इन तीन शक्तियों – संस्कार, सेवा और संगठन ने साथ काम किया, तब राष्ट्र ने असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। प्राचीन समय से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक और वर्तमान भारत की सामाजिक जागरूकता से लेकर वैश्विक मंच पर बढ़ते प्रभाव तक, हर जगह यही त्रिकोणिक शक्ति काम करती दिखती है। हजारों वर्षों की सभ्यता यदि आज भी प्रासंगिक है तो केवल इसलिए कि उसने अपने मूल संस्कारों को कभी त्यागा नहीं, उन्हें समय के अनुरूप ढालना सीखा।
 
संस्कार केवल परंपराओं की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि यह एक आंतरिक अनुशासन है जो व्यक्ति को ‘व्यष्टि’ से ‘समष्टि’ की ओर ले जाता है। आज जब दुनिया व्यक्तिवाद की ओर झुक रही है, भारत अभी भी ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की बात करता है। यही दृष्टिकोण हमारे परिवारों में, विद्यालयों में, मंदिरों में और यहाँ तक कि हमारी दैनिक जीवनशैली में भी झलकता है। एक भारतीय बालक को माता-पिता, गुरु और अतिथि को वंदन करना सिखाया जाता है। यह केवल शिष्टाचार नहीं, एक जीवनदर्शन है। जब मनुष्य इस भाव से बड़ा होता है तो वह अपने कर्तव्यों को केवल निजस्वार्थ के लिए नहीं करता बल्कि अपने समाज के प्रति उत्तरदायित्व समझकर करता है।
 
यहीं से जन्म लेता है सेवा का बीज। सेवा भारतवर्ष की आत्मा में बसी है। यह केवल सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि आत्मानुशासन है। सेवा तब सच्ची होती है जब उसमें अपेक्षा नहीं होती। यही कारण है कि हमारे यहाँ सेवा को पुण्य कहा गया है, दान को महादान और सहयोग को धर्म का अंग। सेवा का दायरा विशाल है- कोई अपने समय से सेवा करता है, कोई धन से, कोई श्रम से, और कोई ज्ञान से। हर भारतीय जब अपने क्षेत्र में सेवा करता है, तो वह केवल एक कर्तव्य नहीं निभाता, वह राष्ट्र निर्माण की एक ईंट रखता है।
 
संगठन वह भाव है जो हर भारतीय को एक सूत्र में बाँधता है। संगठित समाज ही शक्तिशाली समाज होता है। यही कारण है कि भारत में सहकारिता की परंपरा, पंचायती व्यवस्था, ग्राम सभाएं और स्वयं सहायता समूह जैसे ढांचे सदियों से चलते आ रहे हैं। ये सब केवल तंत्र नहीं हैं, ये संस्कृति के विस्तार हैं।
 
आज का भारत एक नई यात्रा पर है। तकनीकी विकास, वैश्विक व्यापार और युवा ऊर्जा का संगम हो रहा है। पर यह ऊर्जा दिशाहीन हो सकती है यदि उसका मार्गदर्शन संस्कार, सेवा और संगठन न करें। राष्ट्र की गति केवल जीडीपी से नहीं मापी जाती, वह मापी जाती है उसके नागरिकों की चेतना से। यदि हर युवा केवल अपनी नौकरी या व्यवसाय में सीमित रह जाएगा तो समाज में विषमता बढ़ेगी। पर यदि वही युवा अपने समय का थोड़ा सा अंश सेवा में दे, अपने जीवन में भारतीय संस्कारों को स्थान दे तो भारत न केवल आर्थिक बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी विश्वगुरु बनेगा।
 
आज जब हम महानगरों से लेकर गाँवों तक जागरूकता की लहर देख रहे हैं, बच्चों को संस्कार देने की कार्यशालाएँ, पर्यावरण की रक्षा के लिए स्थानीय अभियान, रक्तदान शिविर, स्वच्छता अभियान, डिजिटल साक्षरता अभियान – यह सब केवल योजनाएँ नहीं हैं, यह सामाजिक चेतना के पुनर्जागरण का संकेत हैं। यह वह भारत है जो विकास की दौड़ में केवल भाग नहीं रहा, बल्कि नेतृत्व करना चाहता है। और यह नेतृत्व कोई सरकार या नेता नहीं दे सकता; यह नेतृत्व तब आता है जब जन-जन इस राष्ट्र को अपना परिवार समझकर कार्य करता है।
 
हमारे परिवारों में भी यह तीनों सूत्र काम करते हैं। एक संस्कारित परिवार समाज की सबसे मजबूत इकाई होता है। सेवा की भावना जब घर में बच्चों को दी जाती है, तो वही बच्चा बड़ा होकर समाज का सच्चा नागरिक बनता है। और यदि परिवारों में आपसी सहयोग और समर्पण की भावना हो तो वह समाज स्वयं एक संगठित इकाई बन जाता है। इस तरह समाज और राष्ट्र का संगठन किसी बड़े कानून या संविधान से नहीं, बल्कि जीवन के छोटे-छोटे नियमों और व्यवहारों से बनता है।
 
राजनीति, शिक्षा, व्यापार, मीडिया.. हर क्षेत्र में इन तीन स्तंभों की आवश्यकता है। यदि कोई राजनीतिक दल सेवा के बिना केवल सत्ता के लिए काम करे तो वह समाज को तोड़ सकता है। लेकिन वही दल यदि सेवा को अपना धर्म बना ले और संगठन को अपनी शैली तो वह समरसता ला सकता है। यदि शिक्षक संस्कारों को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित रखेगा तो शिक्षा यांत्रिक हो जाएगी। लेकिन यदि वह जीवन मूल्यों को शिक्षण का हिस्सा बना ले तो बच्चों में नेतृत्व की भावना स्वतः जन्म लेगी।
 
हमने देखा है कि जब भी भारत पर संकट आया, चाहे वह आपदा हो या महामारी, देशवासियों ने एकजुट होकर उसका सामना किया। यह एकता कहीं बाहर से नहीं आई, यह इन्हीं मूल्यों से निकली। कोरोना काल इसका सबसे जीवंत उदाहरण है।लाखों लोगों ने बिना किसी प्रचार के एक-दूसरे की मदद की। किसी ने ऑक्सीजन पहुँचाई, किसी ने भोजन बाँटा, किसी ने दवा का इंतज़ाम किया। यही है भारत की आत्मा.. निस्वार्थ सेवा, संगठित प्रयास और संस्कारित दृष्टिकोण।
 
भारत को वैश्विक मंच पर आगे बढ़ाने के लिए हमें केवल तकनीकी नवाचार की नहीं, बल्कि मूल्य-आधारित नागरिकों की आवश्यकता है। हमें ऐसे नेता, शिक्षक, व्यापारी, वैज्ञानिक और युवा चाहिए जो अपने कार्यक्षेत्र में उत्कृष्टता लाने के साथ-साथ समाज के प्रति जागरूक भी हों। यह जागरूकता संस्कारों से आती है। सेवा से वह कर्तव्य में बदलती है।
 
भारत की संस्कृति में पहले ‘कर्तव्य’ आता है और बाद में ‘अधिकार’। यही मूल्य हमें ‘स्व’ से ‘विश्व’ की ओर ले जाता है। अगर हम चाहते हैं कि भारत स्थायी रूप से समृद्ध हो, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर स्तर पर परिवार से लेकर राष्ट्र तक यह तीन सूत्र जीवन का हिस्सा बनें।
 
संस्कार, सेवा और संगठन… ये कोई आदर्शवादी बातें नहीं हैं। ये अत्यंत व्यावहारिक और भारत के सामाजिक ढाँचे में रचे-बसे जीवन के आवश्यक तत्व हैं। इन्हें अपनाकर ही हम एक ऐसा भारत बना सकते हैं जो सशक्त भी हो, सुसंस्कृत भी हो और संगठित भी हो।
 
– क्या आप मानते हैं कि भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए केवल तकनीकी विकास नहीं, बल्कि हर नागरिक में संस्कार, सेवा और संगठन का समन्वय आवश्यक है?
 
– क्या आप मानते हैं कि यदि हम हर दिन थोड़ा सा समय सेवा दें तो हम एक मजबूत और जागरूक भारत की दिशा में तेजी से बढ़ सकते हैं?
 
हृदय की कलम से
 
आपका 
धनंजय सिंह खींवसर