रविवार का सदुपयोग – अंश : 147 वाँ



रविवार का सदुपयोग
 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश : 147 वाँ 
 
जीवन की अंतिम सच्चाई…..
सब कुछ यही रह जाएगा जो प्रेम बांटोगे वही साथ जाएगा….!
 
“धनानि भूमौ, पशवश्च गोष्ठे,
नारी गृहद्वारि, सखा स्मशाने।
देहश्चितायां, परमं हि धर्मः,
अनुगच्छति केवलं कर्म धर्मः॥”
(धन ज़मीन पर छूट जाता है, पशु बाड़े में रह जाते हैं, स्त्री घर के दरवाज़े तक साथ आती है, मित्र श्मशान तक। शरीर चिता में जल जाता है, अंत में केवल धर्म और कर्म ही साथ जाते हैं।)
 
कभी-कभी जीवन की आपाधापी में हम यह भूल जाते हैं कि हम सबका अंत तय है। कोई भी इस संसार में सदा के लिए नहीं आया। हम जिस शरीर को सबसे अधिक सजा-संवार कर रखते हैं, वही मृत्यु के बाद कुछ ही घंटों में पराया हो जाता है। हमारे अपने ही, जिन्हें हमने सबसे अधिक अपना माना, हमें कंधे पर उठाकर अग्नि के हवाले कर आते हैं और फिर, जैसे कुछ हुआ ही नहीं—दुनिया चलती रहती है।
 
एक दिन हमारी सांसें थम जाएंगी। जिस शरीर को हम आज इतने जतन से संवारते हैं, वह एक निष्क्रिय देह बन जाएगा। हमारे अपने ही हमें अंतिम बार नहलाएंगे, सजाएंगे, और एक सफेद कपड़े में लपेटकर विदा कर देंगे। उस समय न कोई नाम काम आएगा, न कोई पद, न कोई डिग्री, न कोई रिश्ते। हमारा अंतिम पता किसी श्मशान की राख या मिट्टी की कब्र बन जाएगा। जिन लोगों के लिए हमने दिन-रात एक किया, वे कुछ देर हमारे लिए रोएंगे, हो सकता है दो-चार दिन मन भारी भी रखें, लेकिन फिर ज़िन्दगी अपने रफ्तार में लौट आएगी।
 
हमारे ऑफिस में कोई और हमारी कुर्सी पर बैठ जाएगा। हमारी अलमारी में रखे कपड़े किसी और के हिस्से में आएंगे या शायद किसी दान में चले जाएंगे। हमारे पासवर्ड, हमारी चाबियाँ, हमारी किताबें जो कभी हमारे जीवन का हिस्सा थीं, धीरे-धीरे अनुपस्थित हो जाएंगी। हमारा पालतू जानवर भी धीरे-धीरे नए मालिक के साथ जुड़ जाएगा। घर की दीवारों पर लगी हमारी तस्वीरें कुछ दिन तक देखी जाएंगी, फिर एक दिन ड्रॉअर में बंद हो जाएंगी और वहां से भी मिट्टी में मिल जाएंगी।
 
हमारी अनुपस्थिति से कोई ग्रहण नहीं लगेगा संसार को। स्कूल चलेंगे, बाजार खुलेंगे, नए चुनाव होंगे, बच्चे पैदा होंगे और दुनिया वैसे ही चलती रहेगी जैसे पहले चलती थी। जीवन में हमारी उपस्थिति बस उतनी ही थी जितनी एक बूँद समुद्र में होती है जिसका लहर के थमते ही नामोनिशान नहीं बचता। लेकिन फिर भी, जीवन की यही सच्चाई हमें वह सबसे ज़रूरी सीख देती है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज़ करते हैं कि जीवन में हमारे पास जो भी है, वह क्षणिक है। और जो साथ जाएगा, वह सब कुछ हमारे कर्म, हमारा भाव, और हमारा प्रेम है। हम इस दुनिया में कुछ लेकर नहीं आए, और कुछ लेकर नहीं जाएंगे।
 
सच पूछिए तो जीवन की गहराई इसी बात में है कि जो दिया, वही सच्चा है। जिस प्रेम को हमने बांटा, वही हमारे अस्तित्व का स्थायी प्रमाण है। जिस किसी भूखे को हमने खाना दिया, किसी दुखी को ढांढस बंधाया, किसी अकेले को समय दिया या किसी ग़लती को माफ़ किया, यही वो संचित ऊर्जा है जो हमारी आत्मा के साथ मृत्यु के पार जाती है। बाकी सब, चाहे वह महलों जैसा घर हो या किसी कंपनी में ऊँचा पद, सब यहीं रह जाते हैं।
 
हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इतने उलझ जाते हैं कि हमें इस मौलिक सच्चाई का भान तक नहीं होता। हमें लगता है कि हम जितना अधिक जोड़ेंगे, उतना सुरक्षित महसूस करेंगे। परंतु मृत्यु सबकुछ तुच्छ कर देती है। उस पल न कोई पैसा बोलता है, न प्रतिष्ठा, न प्रसिद्धि। बस हमारे किए हुए कर्म, हमारी नीयत, हमारा आत्मिक विकास ही बोलता है और तब यह बात उजागर होती है कि जो प्रेम हमने दिया, वही हमारी असली संपत्ति थी।
 
दुनिया की तेज़ रफ्तार में प्रेम सबसे पीछे छूट गया है। हम एक-दूसरे के पास होकर भी एक-दूसरे के लिए समय नहीं निकालते। हम रिश्तों को निभाने की जगह उनसे अपेक्षाएँ पालने लगे हैं। लेकिन अगर आज ही हमें पता चल जाए कि हमारे पास केवल कुछ दिन शेष हैं तो क्या हम वही करेंगे जो आज कर रहे हैं? क्या हम अपने फोन में डूबे रहेंगे, क्या हम किसी से बदले की भावना रखेंगे या क्या हम अधिक से अधिक चीज़ें बटोरने की चिंता करेंगे? शायद नहीं।
 
मृत्यु हमें वह दृष्टि देती है जिसे जीवन अक्सर छीन लेता है। वह हमें याद दिलाती है कि जीवन का उद्देश्य केवल जीना नहीं बल्कि सार्थक जीना है। किसी को हँसाने के लिए जीना, किसी का हाथ थामने के लिए जीना, किसी टूटे हुए को जोड़ने के लिए जीना। यदि हर दिन हम एक अच्छे कर्म का संकल्प लें बिना किसी दिखावे के तो यह पृथ्वी हमारे कारण थोड़ी बेहतर जगह बन सकती है।
 
जिस आत्मा को हम अपने भीतर अनुभव करते हैं, वही हमारी सबसे सच्ची पहचान है। शरीर तो नश्वर है, पर आत्मा का अस्तित्व समय और मृत्यु की सीमाओं से परे है। वही आत्मा उस कर्मफल को लेकर आगे बढ़ती है, जिसे हमने इस जीवन में अर्जित किया है। यह संसार एक अस्थायी ठहराव है, एक परीक्षा-स्थल जहाँ हर दिन हमें अवसर मिलता है कि हम प्रेम के रास्ते पर चलें या स्वार्थ के। विकल्प हमारे पास है पर परिणाम अपरिहार्य हैं।
 
कभी-कभी किसी अंतिम संस्कार में भाग लेने के बाद हम थोड़े समय के लिए गहरे विचारों में चले जाते हैं। हमें लगता है कि यह सब कितना क्षणिक है। पर जैसे-जैसे दिन बीतते हैं, हम फिर उसी जीवन में लौट जाते हैं जो केवल अर्जन और प्रदर्शन के इर्द-गिर्द घूमता है। यदि मृत्यु की सच्चाई को हम केवल दुःख या डर का कारण न बनाकर आत्म-चिंतन का अवसर बना लें तो हमारे भीतर का संसार बदल सकता है।
 
यह विचार कि “मैं क्या ले जा सकता हूँ?” अपने आप में गलत दिशा है। असली प्रश्न यह है: “मैं क्या छोड़ कर जा रहा हूँ?” अगर हम अपने पीछे स्नेह, करुणा और इंसानियत की विरासत छोड़ते हैं तो हमारा अस्तित्व भले ही भौतिक रूप से समाप्त हो जाए पर हमारी उपस्थिति भावों में जीवित रहती है।
 
हमने अक्सर सुना है कि अच्छे लोग कभी मरते नहीं। इसका अर्थ यही है कि उनका प्रेम, उनकी भलमनसाहत और उनकी निश्छल सेवा उन्हें अमर बना देती है और इसके विपरीत, जिनका जीवन केवल अपने लिए रहा, वे मरने के बाद भी याद नहीं किए जाते।
 
इसलिए, जब भी हम किसी को प्रेम दें तो यह सोचकर दें कि यही वह चीज़ है जो हमारे साथ जाएगी। जब भी हम किसी की मदद करें तो यह जानकर करें कि यही हमारी आत्मा की रोशनी बनकर साथ चलेगी। जब भी हम किसी को माफ करें तो यह समझकर करें कि हम अपने भीतर के भार को हल्का कर रहे हैं।
 
जीवन की अंतिम सच्चाई यह नहीं है कि हम एक दिन मर जाएंगे बल्कि यह है कि हम हर दिन थोड़ा-थोड़ा करके जीवन से दूर जा रहे हैं और इस यात्रा को सार्थक बनाना हमारे ही हाथ में है। मृत्यु तो सुनिश्चित है लेकिन कैसे जिएं, यह हमारा चुनाव है। और जब हम प्रेम, सेवा और करुणा को चुनते हैं तो हम मृत्यु के परे भी जीवित रहते हैं।
 
– क्या आप मानते हैं कि मृत्यु के बाद हमारे साथ केवल प्रेम, सेवा और भलाई के कर्म ही जाते हैं?
 
– क्या आप आज से अपने जीवन की असली कमाई पर ध्यान देना शुरू करेंगे?
 
हृदय की कलम से
 
आपका 
धनंजय सिंह खींवसर