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साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 144 वाँ
धर्म, न्याय और त्याग की मूरत: अहिल्या बाई की त्रिशताब्दी
समय के पन्नों पर दर्ज कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल इतिहास का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि युगों तक प्रेरणा बनकर जीवित रहते हैं। अहिल्याबाई होलकर ऐसा ही एक नाम है जिन्होंने 18वीं सदी के पुरुषप्रधान समाज में नारी नेतृत्व की अनूठी मिसाल कायम की। जब भारत की धरती पर युद्ध, आक्रमण और राजनीतिक अस्थिरता की लहरें उठ रही थीं, तब मालवा की एक विधवा स्त्री अपनी नीतियों, करुणा और निर्माण कार्यों से सामाजिक चेतना को आलोकित कर रही थी।
अहिल्याबाई का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के चौंडी गाँव में हुआ था। वह न तो किसी राजपरिवार में जन्मी थीं और न ही उनके जीवन में कोई राजसी आभा बचपन से जुड़ी थी। उनके पिता मानकोजी शिंदे एक मामूली पाटिल (ग्राम प्रमुख) थे लेकिन उन्होंने बालिका अहिल्या को शिक्षित करने में विशेष रुचि ली। यह वह युग था जब स्त्रियों की शिक्षा पर समाज वर्जनाओं की मोटी दीवारें खड़ी कर चुका था। परंतु मानकोजी ने अपनी बेटी की तीव्र बुद्धिमत्ता को पहचाना और उसे पढ़ने-लिखने का अवसर दिया।
कहा जाता है कि एक बार होलकर वंश के प्रमुख मल्हारराव होलकर की नजर इस बालिका पर पड़ी जब वह मंदिर में पूजा कर रही थी। उसकी गंभीरता और शालीनता से प्रभावित होकर मल्हारराव ने अहिल्या को अपने पुत्र खांडेराव होलकर के लिए वधू के रूप में चुन लिया। विवाह के बाद अहिल्याबाई ने होलकर साम्राज्य की संस्कृति, प्रशासन और मराठा राजनीति को निकट से देखा और समझा। यह शिक्षा उनके भावी नेतृत्व की नींव बनी।
अहिल्याबाई के जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा तब आई जब उनके पति खांडेराव होलकर एक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। युवा अहिल्या विधवा हो गईं और समाज ने उनकी जीवनगाथा को वहीं समाप्त मान लिया। परंतु मल्हारराव होलकर ने इस शोक में डूबी बहू में शासन क्षमता और दूरदृष्टि देखी। उन्होंने अहिल्याबाई को राजनीतिक कार्यों में भाग लेने की अनुमति दी और धीरे-धीरे उन्हें प्रशासनिक अनुभव देना प्रारंभ किया।
1766 में मल्हारराव होलकर के निधन के बाद, अहिल्याबाई ने होलकर राज्य की बागडोर अपने हाथों में ली। एक स्त्री का विधवा होकर शासन संभालना उस युग में एक क्रांतिकारी घटना थी। उन्होंने न केवल मराठा राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखा बल्कि आंतरिक प्रशासन में भी अनुशासन, न्याय और करुणा का अद्वितीय मेल प्रस्तुत किया। उनका शासन अत्यंत सशक्त, व्यवस्थित और जनता के हित में था।
अहिल्याबाई होलकर की प्रशासनिक नीति न्यायप्रियता और लोकसेवा पर आधारित थी। उन्होंने सभी जातियों और वर्गों के प्रति समान दृष्टिकोण रखा। निर्धनों को सहायता मिलती, किसानों को उचित मूल्य मिलता, और महिलाओं को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता। वह प्रजा के कष्टों को व्यक्तिगत पीड़ा के रूप में महसूस करती थीं। कहा जाता है कि वे स्वयं वेश बदलकर नगर और गाँवों का भ्रमण करती थीं ताकि वास्तविक स्थिति को जान सकें।
अहिल्याबाई केवल एक कुशल प्रशासिका नहीं थीं, बल्कि धर्म और संस्कृति की संरक्षिका भी थीं। उन्होंने देशभर में मंदिरों, घाटों, धर्मशालाओं और कुओं का निर्माण करवाया। काशी विश्वनाथ मंदिर से लेकर द्वारका, सोमनाथ, प्रयाग, रामेश्वरम तक, उनके निर्माण कार्यों की छाप आज भी देश भर में देखी जा सकती है। उनकी यह दृष्टि केवल धार्मिक नहीं थी, अपितु एक सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में थी।
उनकी योजनाएं अल्पकालिक नहीं थीं, वे दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन को ध्यान में रखकर कार्य करती थीं। उन्होंने महिला शिक्षा को प्रोत्साहन दिया, विधवाओं के पुनर्विवाह की वकालत की और अनेक ऐसी सामाजिक कुरीतियों को चुनौती दी जो उस समय अडिग सत्य मानी जाती थीं। वे गहनों और आडंबर से दूर रहती थीं, लेकिन अपने आचरण, विवेक और सेवा भावना से राज्य को समृद्ध बनाती रहीं।
इतिहास गवाह है कि उनके शासनकाल में मालवा राज्य में कोई भी भूखा नहीं सोया। अकाल के समय उन्होंने अपने खजाने खोल दिए। व्यापारियों को कर में छूट दी गई, ताकि बाजारों में वस्तुओं की आपूर्ति बनी रहे। अहिल्याबाई न केवल एक रानी थीं, वे एक माँ के समान थीं—जिसे अपनी प्रजा के दुख-दर्द से गहरा जुड़ाव था।
राजनीतिक दृष्टि से भी अहिल्याबाई की दूरदर्शिता असाधारण थी। उन्होंने युद्ध से अधिक कूटनीति में विश्वास रखा। उनका मानना था कि साम्राज्य को बल से नहीं, सेवा से जीता जाता है। वे बाहरी आक्रमणकारियों से दृढ़ता से निपटीं, लेकिन जहां संवाद और समन्वय की संभावना दिखती, वहाँ हथियारों की बजाय बुद्धि का प्रयोग करतीं।
उनके जीवन में अनेक व्यक्तिगत दुख भी आए। पुत्र मालेराव का स्वभाव उद्दंड था और उसके शासनकाल में जनता असंतुष्ट रहने लगी थी। अहिल्याबाई ने राज्यहित में पुत्र को पदच्युत करने जैसा कठोर निर्णय लिया, और स्वयं शासन संभाला। एक माँ का यह निर्णय यह दर्शाता है कि उनके लिए न्याय, परिवार से भी ऊपर था।
शासन के साथ-साथ उन्होंने साहित्य, संगीत और कला को भी संरक्षण दिया। तुकोराम, रामदास और कबीर जैसे संतों की शिक्षाओं से वह प्रभावित थीं। उन्होंने इन विचारों को अपने प्रशासन में भी स्थान दिया। उनके दरबार में विद्वानों और संतों को उचित सम्मान मिलता था। वे धार्मिक सहिष्णुता की प्रतीक थीं और सभी मतों के लिए समान आदरभाव रखती थीं।
आज देवी अहिल्याबाई की त्रिशताब्दी का यह अवसर केवल एक ऐतिहासिक स्मरण नहीं है, यह उस चेतना का उत्सव है जो हमें बताता है कि सच्चे नेतृत्व के लिए लिंग, वंश या परिस्थितियाँ बाधा नहीं बनतीं। अहिल्याबाई होलकर ने जिस प्रकार सेवा को सत्ता से ऊपर रखा, वह आज के हर नेता और प्रशासक के लिए एक आईना है।
वर्तमान भारत में जब महिला सशक्तिकरण की बात होती है, तब हमें अहिल्याबाई जैसे उदाहरणों को केवल गौरवगाथा तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें आज के संदर्भ में पुनः पढ़ना, समझना और अपनाना चाहिए। उनके जीवन से यह स्पष्ट होता है कि विनम्रता, कर्तव्यपरायणता और करुणा…सत्ता के सर्वोत्तम गुण हैं।
उनका जन्मस्थान चौंडी आज भी एक तीर्थस्थल की भांति देखा जाता है। उनकी समाधि इंदौर के राजवाड़ा परिसर में स्थित है, जहाँ हर वर्ष लोग श्रद्धांजलि देने आते हैं। उनके द्वारा स्थापित मूल्य और कार्य भारत की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन चुके हैं।
अहिल्याबाई का जीवन इस बात का उदाहरण है कि स्त्री यदि चाहे तो वह किसी भी सामाजिक और राजनीतिक चुनौती का सामना कर सकती है। उन्होंने अपने कार्यों से यह प्रमाणित किया कि नेतृत्व केवल युद्ध जीतने या सत्ता पाने का नाम नहीं है, बल्कि वह है…प्रजा के हृदय को जीतना, उसकी सेवा में स्वयं को अर्पित कर देना।
आज के दौर में जब शासन और राजनीति में नैतिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है, तब अहिल्याबाई जैसे चरित्र हमें मूल्यों की पुनर्परिभाषा की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने बताया कि नेतृत्व में संवेदना, न्याय और दृढ़ता साथ-साथ चल सकती हैं। वे न केवल इतिहास की एक रानी थीं, बल्कि भारतवर्ष की आत्मा में रची-बसी एक आदर्श माँ, सेविका और नेता थीं।
सादर नमन
– क्या आप मानते हैं कि अहिल्याबाई होलकर जैसे आदर्श नेतृत्व की छाया आज के भारत में फिर से उभरनी चाहिए?
– क्या आप मानते हैं कि हमारी शिक्षा प्रणाली में ऐसी प्रेरणादायक महिला शासकों की कहानियाँ अनिवार्य रूप से पढ़ाई जानी चाहिए?
जय हिंद
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर