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साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश : 143 वाँ
तिरंगा यात्रा बनी संकल्प शक्ति का प्रतीक: आतंक के खिलाफ भारत की एकजुटता
ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के सशक्त नेतृत्व में जब भारत ने आतंक के खिलाफ निर्णायक कदम उठाया तो देशभर में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। भारतीय सेना की सर्जिकल कार्रवाई ने आतंकवादियों के अड्डों को नेस्तनाबूद किया और पूरे देश में गौरव की लहर दौड़ गई। इस ऐतिहासिक सैन्य कार्रवाई के बाद देशभर में जो तिरंगा यात्राएं निकाली गईं, वे केवल विरोध या प्रदर्शन नहीं थीं, बल्कि भारत के नागरिकों की संकल्प शक्ति, देशभक्ति और आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता की गूंज थीं।
इन तिरंगा यात्राओं को लोगों ने केवल आयोजन नहीं, बल्कि एक मिशन की तरह लिया। चाहे वह दिल्ली का इंडिया गेट हो या देश भर के गांवों की गलियां, हर जगह नागरिक, युवा, महिलाएं और बच्चे हाथों में तिरंगा लिए सड़कों पर उतरे। ऑपरेशन सिंदूर के तुरंत बाद जब पहली बार लोगों ने एक साथ “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम्” के नारों के साथ कदम बढ़ाए तो लगा जैसे पूरा देश एक ही दिल की धड़कन बन गया है।
यात्राओं के दौरान देखने को मिला कि किस तरह गांव-शहर के हर कोने से लोग स्वतःस्फूर्त ढंग से जुड़ते गए। एक किसान ने कहा, “हमारे सैनिकों ने जब वहां सीमा पार जाकर जवाब दिया तो हमें लगा कि अब हमारी बारी है। हम अपने गांव में तिरंगा लेकर चलें ताकि उन्हें पता चले कि पूरा देश उनके साथ है।” एक कॉलेज छात्रा ने भावुक होकर कहा, “पहली बार लगा कि हम सिर्फ सोशल मीडिया पर नहीं, जमीन पर भी देश के लिए कुछ कर सकते हैं।”
कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, कच्छ से लेकर अरुणाचल तक, तिरंगा यात्राओं की यह श्रृंखला केवल किसी पार्टी या संगठन द्वारा चलाई गई पहल नहीं थी, यह जनता की आवाज थी, उनकी चेतना का उदय। लोगों ने न जाति देखी, न धर्म। स्कूलों के बच्चे अपनी यूनिफॉर्म में तिरंगा लेकर आगे-आगे चल रहे थे, महिलाएं पारंपरिक परिधानों में पूरे आत्मगौरव के साथ शामिल थीं, तो बुजुर्ग आँखों में चमक लिए कह रहे थे – “यह नया भारत है आया जो हर चुनौती के सामने सीना तानकर खड़ा होता है।”
तिरंगा यात्रा के हर दृश्य ने यह जता दिया कि भारत अब केवल प्रतिक्रियाशील देश नहीं रहा बल्कि वह मुखर होकर आतंकवाद को चुनौती दे रहा है न सिर्फ सैन्य स्तर पर बल्कि सामाजिक और भावनात्मक स्तर पर भी। ये यात्राएं सिर्फ एक दिन की झांकी नहीं थीं, वे लोगों के जीवन को छू गईं। अनेक युवाओं ने इसी के बाद सेना में भर्ती होने का संकल्प लिया। कुछ ने पुलिस या सिविल सेवा में जाने का निश्चय किया। यह आंदोलन केवल नारों तक सीमित नहीं रहा, यह जनचेतना बन गया।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद इन यात्राओं ने उन आंसुओं को भी संबल दिया जो शहीदों के घरों में गिरे थे। कई स्थानों पर तिरंगा यात्रा शहीदों के घरों तक पहुँची, जहाँ लोगों ने झंडा लहराकर उन्हें सलाम किया। माता-पिता, भाई-बहन, पत्नियाँ… सबने उस गर्व और पीड़ा के मिश्रण को जीते हुए देश के लिए अपनी प्रतिबद्धता जताई। एक शहीद की माँ ने कहा – “मेरा बेटा चला गया, लेकिन तिरंगे को यूँ सबके हाथों में देखकर लगता है कि वह कहीं गया नहीं है, वह हर झंडे में है।”
इसमें कोई संदेह नहीं कि आतंक के खिलाफ लड़ाई केवल सीमा पर नहीं लड़ी जाती, वह हर गली, हर मोहल्ले में लड़ी जाती है। जब लोग डरते नहीं, जब वे आवाज उठाते हैं, जब वे एक साथ खड़े होते हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद की तिरंगा यात्राएं इसी लड़ाई की शुरुआत थीं और वह लड़ाई आज भी जारी है।
इन यात्राओं की तस्वीरें और वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुए, तो देश के कोने-कोने से आवाजें उठीं -“हम भी तिरंगा यात्रा निकालेंगे।” और निकाली भी गईं। राजस्थान, महाराष्ट्र, असम, उड़ीसा, झारखंड, केरल … हर राज्य ने अपने अंदाज़ में लेकिन एक ही भावना से यह संदेश दिया – भारत डरने वाला देश नहीं है।
यह जोश केवल शहरों तक सीमित नहीं रहा। झारखंड के एक छोटे से गांव में जब बच्चों ने पहली बार स्कूल में झंडा फहराया और फिर गाँव के बुजुर्गों के साथ यात्रा निकाली, तो वहां के प्रधान ने कहा – “पहले हमें लगता था कि तिरंगा केवल सरकारी कार्यक्रमों का हिस्सा है, पर अब लगता है कि यह हमारा भी है, हमारी अस्मिता है।”
यह उल्लेख करना जरूरी है कि तिरंगा यात्रा में न कोई पार्टी होती है, न कोई मंच.. यहाँ सिर्फ एक पहचान होती है- भारतीय। यही वह ताकत है जो आतंक को कमजोर करती है। जब भारत एकजुट होता है तब आतंक की सोच हार जाती है।
इस यात्रा का संदेश यह है – भारत शांति चाहता है पर शांति कमजोरी नहीं है। और जब बात देश की अस्मिता पर आती है तब हर नागरिक तिरंगे के नीचे खड़ा होता है। यह यात्रा बताती है कि आतंक केवल बम से नहीं हराया जाता, उसे लोगों की एकता, उनके संकल्प, और उनके प्रेम से परास्त किया जाता है।
तिरंगा यात्रा केवल एक आयोजन नहीं, यह एक आह्वान है। यह हमें बताती है कि जब तक हमारे हाथ में तिरंगा है, जब तक हमारी आँखों में देश के लिए स्वप्न हैं तब तक कोई भी ताकत हमें डिगा नहीं सकती।
जय हिंद
– क्या आप मानते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद तिरंगा यात्रा जैसी पहलों ने देश की जनता को भावनात्मक रूप से एकजुट किया है?
– क्या आप मानते हैं कि आतंक के खिलाफ भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी जनता की चेतना और एकता है?
जय हिंद
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर