
रविवार का सदुपयोग
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
अंश-चौदह
विलुप्त होती राजनीतिक सुचिता चिंताजनक
“राजनीतिक शुचिता” राजनीति के लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्व है लेकिन वर्तमान में विलुप्त होती राजनीतिक शुचिता चिंता का विषय है। राजनीतिक इतिहास में ऐसे कई उदाहरण है जहां राजनेताओं ने राजनीतिक शुचिता को आत्मसात करते हुए संविधान और लोकतंत्र को मजबूत करने का काम किया, वहीं वर्तमान में कुछ राजनेता इसे इतना निम्न स्तर पर ले गए हैं कि राजनीतिक शुचिता ना के बराबर रह गई है। निम्न स्तर की भाषा, राजनीतिक प्रतिनिधियों पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप करना कुछ नेताओं की पहचान बन चुकी हैं। निम्न स्तर की यहीं बयानबाजी और अनर्गल आरोप प्रत्यारोप गिरती राजनीतिक शुचिता का प्रदर्शित करती है। कई नेता सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में तार्किक राजनीतिक को दरकिनार कर व्यक्तिगत और निम्न स्तर पर राजनीति करने लगें जो को बेहद चिंताजनक है।
समय के बदलाव के साथ ही राजनीतिक क्षेत्र में कई तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं, वर्तमान में सस्ती लोकप्रियता के चक्कर राजनीतिक परिपक्वता और राजनीतिक शुचिता का जबरदस्त अभाव नजर आने लगा है।
नेताओं को अपने समर्थकों के लिए सदैव सकारात्मक प्रेरणा का स्त्रोत होना चाहिए ना की निम्न राजनीतिक सुचिता वाला उदाहरण
एक राजनेता अपने अनुयायियों के लिए प्रेरणा स्रोत होते हैं और उन्हीं से वह प्रेरित भी होता हैं। ऐसे में यदि जनप्रतिनिधि अपने व्यवहार में राजनीतिक शुचिता नहीं रखेगें तो उनके अनुयायी भी इसी तरह का व्यवहार करेंगे, ऐसा ही जनता के साथ भी है एक नेता को अपनी जनता के समक्ष सुचिता के उच्चतम प्रतिमान स्थापित करने चाहिए ना की सस्ती लोकप्रियता के लिए निम्न स्तर की व्यवहार करना चाहिए।
वर्तमान परिपेक्ष अगर देखा जाए तो पिछले कुछ समय में राजनीतिक बयानबाजी और व्यवहार का स्तर काफी तेजी से गिरा है। एक दूसरे पर अनर्गल और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप लगते हैं, यहां तक कि कई बार अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी के निजी जीवन पर भी हल्के स्तर पर बयानबाजी की जाती है।
राजनीति में शुद्धिकरण के लिए कई बार अलग-अलग स्तर पर प्रयास होते रहे हैं लेकिन अब राजनीतिक बयानबाजी और व्यवहार के भी मानक तय करने की बहुत आवश्यकता है। राजनीतिक पार्टियों के बीच विचारधारा की प्रतिस्पर्धा होती है। एक राजनीतिक संगठन अपने मतदाताओं के मध्य अपनी विचारधारा और अपने मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाना चाहिए जिसके बाद देश का मतदाता अपने विवेक के अनुसार जनादेश देती है लेकिन विचारधारा की यह लड़ाई यदि आपसी स्वार्थ की राजनीतिक लड़ाई बन जाए तो इसका खामियाजा जनता को उठाना पड़ता है। जनता को विकास के मुद्दों से इतर किसी भी प्रकार की राजनीति करने वालों और सुचिता नहीं रखने वालों का बहिष्कार करना चाहिए।
राजनीति में अब नेताओं की राजनीतिक शुचिता की कसौटी भी जांचने और परखने की आवश्यकता है। हमारे सामने ऐसे कई सफल राजनेताओं के उदाहरण है जिन्होंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में कभी भी हल्के और तुच्छ स्तर पर बयानबाजी नहीं की और अपने राजनीतिक विरोधियों को भी उतना ही सम्मान दिया जितना अपनी पार्टी के सदस्यों को। लोकतंत्र की भी यही खूबी है।
आइए हम सभी इस पर गहन मंथन करें और ऐसे राजनेताओं का बहिष्कार करें जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति और सस्ती लोकप्रियता के लिए इस तरह की बयान बाजी कर लोकतांत्रिक परंपराओं का उपहास उड़ाते हैं ।
1.क्या आप भी मानते हैं कि राजनीतिक शुचिता में गिरावट लोकतंत्र के लिए खतरा है ?
2. राजनेताओं को राजनीतिक परिपक्वता के साथ-साथ राजनीतिक शुचिता को भी अपनाने की आवश्यकता है ?
हृदय की कलम से !
आपका
– धनंजय सिंह खींवसर