
रविवार का ब्लॉग
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | इस संवाद में मेरे मन के भाव
अंश : 146 वाँ
परिवार के साथ वेकेशन और डिजिटल ब्रेक…. छोटी सी आदत, ढेर सारी खुशियां!
यह जीवन एक खूबसूरत सफर है और यह सफर और भी सुंदर हो जाता है यदि हम अपनों के साथ चलें। आज हम भागदौड़ भरी ज़िंदगी जी रहे हैं। रोज़ सुबह आंख खुलती है तो सबसे पहले मोबाइल स्क्रीन पर उंगलियां चलती हैं और रात को आंखें बंद होने से पहले भी वही चमकता हुआ फोन हमारे सामने होता है। इसी बीच हम भूलते जा रहे हैं अपनों को देखना, उनके साथ बैठना, बिना किसी रुकावट के सिर्फ साथ बिताना। क्या आपने कभी गौर किया है कि महीनों बीत जाते हैं और आपने अपने घर में सबसे करीबी लोगों से दिल से बात ही नहीं की? बस ऊपर ऊपर की बातें, कभी चाय के साथ, कभी खाना खाते हुए लेकिन फोन की टनटनाहट उन पलों को अधूरा छोड़ देती है।
इन्हीं अधूरे पलों को पूरा करने का एक खूबसूरत तरीका है एक छोटी सी फैमिली ट्रिप और एक ईमानदार डिजिटल ब्रेक।
किसी भी बड़े परिवर्तन की शुरुआत एक छोटी सी आदत से होती है। हम अक्सर सोचते हैं कि लंबी छुट्टियों की प्लानिंग, होटल की बुकिंग, पैसा और समय ये सब मुश्किलें आती हैं पर अगर नीयत हो तो एक छोटा सा सफर भी बड़ी मुस्कानें दे सकता है। जरूरी नहीं कि आप किसी हिल स्टेशन जाएं या किसी समुद्री किनारे। कभी कभी पास के ही किसी गांव, मंदिर, धरोहर स्थल या खेतों की तरफ का छोटा सा सफर भी जीवन के थमे हुए रिश्तों को नया प्राण दे देता है।
फैमिली ट्रिप का मतलब सिर्फ घूमना नहीं होता इसका मतलब है अपने रिश्तों को फिर से छूना, बच्चों की आंखों में सपनों को पढ़ना, अपने जीवनसाथी की मुस्कान में खो जाना, मां पापा की चुप्पी में छिपे अनुभवों को सुनना। और ये सब तभी हो सकता है जब आप अपना मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट एक कोने में रख दें।
डिजिटल ब्रेक का मतलब सिर्फ फोन बंद करना नहीं है बल्कि अपनी चेतना को अपने आस पास के लोगों की तरफ मोड़ना है। क्या आपने कभी देखा है कि आपके बच्चे आपको कुछ दिखाने के लिए बुलाते हैं और आप “बस एक मिनट” कहकर मोबाइल में व्यस्त रहते हैं? वह “एक मिनट” कभी पूरा नहीं होता और उस पल की मासूमियत हमेशा के लिए खो जाती है।
जब आप फैमिली ट्रिप पर निकलते हैं और यह तय करते हैं कि आज के दिन फोन सिर्फ फोटो खींचने के लिए इस्तेमाल होगा तब आप महसूस करेंगे कि असली मुस्कान स्क्रीन की नहीं सामने बैठे लोगों की होती है। आप जब साथ बैठकर खाना खाते हैं बिना किसी कॉल के बीच में बाधा डाले तो रोटी के साथ रिश्तों का स्वाद और गहराता है।
कई बार बच्चे सवाल पूछते हैं “पापा, आपके स्कूल में स्मार्टफोन थे क्या?” और हम हंसते हुए कहते हैं “नहीं बेटा, हम तो दोस्तों के साथ खेलते थे, मैदान में दौड़ते थे, पतंग उड़ाते थे” और बच्चे आश्चर्य से पूछते हैं “बिना फोन के बोर नहीं होते थे?” यही सवाल हम खुद से पूछें क्या हम आज सच में बोर हो जाएंगे अगर दो दिन फोन न देखें?
इसका उत्तर चौंकाने वाला होगा क्योंकि जब हम डिजिटल ब्रेक लेते हैं तब हम खुद को फिर से महसूस करते हैं। जीवन की छोटी छोटी बातों में जो आनंद छिपा होता है वह मोबाइल की नोटिफिकेशन में नहीं मिलता। परिवार के साथ बैठकर हंसी मज़ाक करना, पुरानी बातें याद करना, एकसाथ खाना बनाना, किसी झील के किनारे बैठकर चुपचाप पानी को बहते देखना ये वो अनुभव हैं जो हमारे भीतर बहुत कुछ भर देते हैं।
बच्चे जब देखते हैं कि उनके मम्मी पापा उन्हें बिना जल्दबाज़ी के सुन रहे हैं तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है। जीवनसाथी जब महसूस करता है कि अब बातें सिर्फ ज़रूरतों की नहीं भावनाओं की हो रही हैं तो रिश्तों में मिठास आती है। माता पिता जब देख पाते हैं कि उनके बच्चे अब केवल स्क्रॉल नहीं कर रहे बल्कि आंखों में आंखें डालकर बात कर रहे हैं तो दिल भर आता है।
ऐसी छोटी छोटी यात्राएं जीवन को बड़ा बना देती हैं। और ये कोई बाहरी खर्चा नहीं मांगतीं। बस समय, ध्यान और थोड़ी सी ईमानदारी मांगती हैं। जब हम खुद को और अपनों को यह मौका देते हैं “आज सिर्फ हम, कोई स्क्रीन नहीं” तो हम एक अनमोल गिफ्ट देते हैं संपूर्ण उपस्थिति।
आपने नोट किया होगा कि जब आप फोन पर होते हैं तब आपको बार बार लगता है कि कुछ मिस हो रहा है किसी की स्टोरी, कोई अपडेट, कोई मेसेज। लेकिन जब आप एक ट्रिप पर होते हैं फोन साइड में रखकर तब आपको लगता है कि कुछ भी मिस नहीं हो रहा बल्कि हर पल मिल रहा है।
बच्चों के साथ नदी में पत्थर फेंकते हुए हो रही खिलखिलाहट, मां के हाथ का बनाया हुआ टिफिन किसी झील किनारे खुलते ही जो स्वाद देता है, पापा की पुरानी कहानियों में जो ठहाके छिपे हैं वो इंटरनेट पर नहीं मिलते। ये सब वास्तविक हैं, स्थायी हैं, आत्मा को छूते हैं।
और हां, हम यह सब किसी लंबे प्लानिंग के बिना भी कर सकते हैं। महीने में एक बार बस एक दिन डिजिटल डिटॉक्स और फैमिली डे का संकल्प। एक दिन का ब्रेक जब न कोई मीटिंग हो, न कोई मेल, न कोई स्क्रॉलिंग। सिर्फ एक दिन जिसमें हम फिर से अपने लोगों के साथ मन से जुड़ें। यह आदत धीरे धीरे जीवन में ऐसी ऊर्जा भर देगी कि आप खुद चौंक जाएंगे।
आज जब जीवन इतनी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है कि हम पीछे मुड़ने का समय नहीं निकाल पाते तब यह छोटी सी पहल एक ट्रिप और एक ब्रेक हमें फिर से हमारे अपनों से जोड़ देती है। हमें यह एहसास कराती है कि सबसे बड़ी पूंजी रिश्ते हैं और सबसे बड़ा नुकसान उनकी उपेक्षा है।
तो अगली बार जब वीकेंड आए या कोई छुट्टी हो तो एक छोटी सी यात्रा प्लान कीजिए। न कोई बड़ा बजट, न भारी तैयारी। सिर्फ दिल से की गई कोशिश कि इस दिन हम सिर्फ परिवार के लिए जिएंगे। और जब आप ऐसा करेंगे तो देखिएगा कि उस एक दिन की गर्माहट पूरे महीने तक महसूस होती रहेगी।
आप अपने बच्चों को नया खिलौना नहीं अपनी पूरी मौजूदगी दीजिए। अपने जीवनसाथी को महंगे गिफ्ट नहीं बिना रुकावट की बातचीत दीजिए। अपने माता पिता को कोई नया फोन नहीं एक दिन बिना फोन बिताकर दीजिए और फिर देखिए यह छोटी सी आदत कैसे ढेर सारी खुशियां बन जाती है।
– क्या आप मानते हैं कि महीने या वर्ष में एक बार एक परिवार संग यात्रा और एक दिन का डिजिटल ब्रेक रिश्तों को फिर से जीवंत कर सकता है
– क्या आप मानते हैं कि असली खुशी स्क्रीन पर नहीं अपने लोगों की मुस्कान में छिपी होती है
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर