
रविवार का ब्लॉग
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | इस संवाद में मेरे मन के भाव
अंश : 145 वाँ
सादर नमस्कार,
मेरा जो ब्लॉग नियमित रूप से चलता आ रहा था, वह पिछले दो सप्ताह से स्थगित रहा। इसका कारण एक ऐसी व्यक्तिगत क्षति है जिसे शब्दों में बयां कर पाना मेरे लिए बेहद कठिन है।
5 जून को मेरे जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा मेरे हिस्से आई… मैंने अपनी मां को खो दिया। वे केवल मेरी जननी नहीं थीं, बल्कि मेरे जीवन की धुरी, मेरा संबल, मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा थीं।
आज मैं अपने इस ब्लॉग को अपनी दिवंगत माताश्री को समर्पित करते हुए, उन्हें स्मरण करते हुए, अपने भावों को शब्दों में ढालने का प्रयास कर रहा हूँ।
इन बीते दिनों में जब भी कलम उठाई, आंखें भर आईं। कुछ लिख पाना संभव नहीं हो पाया। लेकिन आज जब भीतर एक शून्य गूंज रहा है तो उसी रिक्तता में उनके स्नेह, उनकी ममता, उनके आँचल की गर्माहट को महसूस करते हुए, मैं यह ब्लॉग लिख रहा हूँ….
मां, तुम थी तो था जीवन का,
हर लम्हा सुंदर और सुहाना।
नहीं सह पा रहा ये मन मेरा,
तुम्हारा मौन-नि:शब्द हो जाना।
मां, हों विराजित परमधाम में,
पर सुनो, ज़रा मेरी करुण पुकार।
तुम बिन जीना कैसे सीखूं मैं,
लगे है सूना ये सारा संसार।
आपको अंतिम विदाई नहीं क्योंकि आप हमेशा मेरे दिल में हो मां….
मां एक ‘शब्द’ नहीं, पूरा शब्दकोश है। माँ को खो देना सिर्फ एक रिश्ता खोना नहीं है, यह जीवन की सबसे मजबूत जड़ के टूट जाने जैसा है। वह जड़ जो हमें इस धरती पर लाती है, हमारी पहली आवाज़, पहली दृष्टि, पहला प्रेम बनती है। जब वही जड़ अचानक बिना कोई संकेत दिए उखड़ जाए तो जैसे पूरी आत्मा का आधार ही हिल जाता है। उस दिन मैं माँ के पास नहीं था। हाँ, बहुत दूर भी नहीं था लेकिन यही ‘नहीं होना’ मेरे जीवन की सबसे बड़ी टीस बन गया है। उस एक क्षण में अगर मैं वहाँ होता तो शायद उस एक बार उनका हाथ थाम सकता, उनकी आँखों में झाँककर कह सकता कि “मैं यहाँ हूँ माँ…” लेकिन वह अवसर मेरे हाथों से ऐसे फिसल गया जैसे रेत की अंतिम मुट्ठी।
माँ की मृत्यु साइलेंट अटैक से हुई, बिल्कुल उसी तरह जैसे वो जीवन भर थीं…शांत, सहनशील और बिना किसी को तकलीफ़ दिए चुपचाप चली जाना। उस खबर ने मेरी साँसें जैसे रोक दी थीं। समझ नहीं आया था कि दुनिया अचानक इतनी खाली क्यों लगने लगी है। जब मैं घर पहुँचा तो सब कुछ वैसा ही था, सिर्फ माँ नहीं थीं। उस मौन में जो सबसे ज़्यादा बोल रहा था, वो था तकिए के नीचे रखी मेरी तस्वीर। शायद वही आखिरी वस्तु थी जिसे उन्होंने देखा, जिसे उन्होंने अपने पास रखा। उस एक तस्वीर ने मुझे झकझोर कर रख दिया। एक तरफ मैं था..सफल, सम्मानित, दुनिया की नजरों में दृढ़ और सशक्त…और दूसरी तरफ माँ थीं, जो इस दुनिया से विदा लेते समय भी मेरी उपस्थिति को अपने सीने से लगाए रहीं।
माँ ने कभी मुझसे कुछ नहीं माँगा। ना वक़्त, ना सुविधा, ना किसी मौके की नुमाइश। उन्होंने सिर्फ दिया…निर्बाध, निस्वार्थ और निश्चल प्रेम दिया। उनका जीवन भव्यता से भरा हुआ था लेकिन उन्होंने कभी उस भव्यता को अपने व्यक्तित्व पर हावी नहीं होने दिया। उनका होना ही सौंदर्य था। वो उस राजसी परिवार की गूँज थीं, जिनके जीवन में परंपरा और गरिमा एक-दूसरे में इस तरह घुली-मिली थीं कि एक उदाहरण बन गई थीं। माँ ने भव्यता को संयम से जिया, उन्होंने वैभव को करुणा में बदला और हर उस व्यक्ति को छुआ जो उनके संपर्क में आया। उनकी मुस्कान में आत्मा बसती थी और उनके मौन में भी बहुत कुछ कहने की क्षमता थी।
अब जब मैं उनकी अनुपस्थिति में जी रहा हूँ तो हर दिन एक नई चुनौती है। सिर्फ भावनात्मक नहीं, आत्मिक भी। हर सुबह जब उठता हूँ तो लगता है जैसे कोई साया अब नहीं रहा जो मुझे हर मोड़ पर संभालता था। माँ ने कभी रोका नहीं, बस राह दिखाई। कभी बंधन नहीं बनाए लेकिन मूल्य दिए। आज जब कोई मुझसे कहता है कि “तुममें एक संतुलन है, एक गरिमा है”…तो मैं चुपचाप माँ की ओर देखता हूँ…क्योंकि वह जो कुछ भी था, वो उन्हीं की देन है।
उनके जीवन में भेदभाव का कोई स्थान नहीं था। जो आया, वो उनका हो गया। कोई रिश्तेदार हो या कर्मचारी, कोई वृद्ध हो या बच्चा…माँ के आँचल में सबके लिए जगह थी। वो सिर्फ माँ नहीं थीं, वो एक संरक्षक थीं, एक शरण थीं, एक दृष्टि थीं। उनके होने से घर सिर्फ घर नहीं था, एक जीवंत मंदिर था। और उनके जाने से जो खालीपन आया है, वह शब्दों से नहीं भरा जा सकता। ये खालीपन हर दिन मुझे यह याद दिलाता है कि दुनिया की सारी उपलब्धियाँ एक ओर हैं, और माँ का साथ एक ओर।
अब उनके बिना जीना एक अभ्यास जैसा है..जिसमें हर दिन कुछ टूटता है और फिर उसी टूटन से कुछ सीखना होता है। मैं हर दिन एक वादा करता हूँ खुद से कि माँ की इच्छा, माँ का सपना, माँ की कल्पना में जो बेटा था, उसे मैं जीवित रखूँगा। मैं उस मार्ग पर चलूँगा जो उन्होंने मेरे लिए चाहा था। वो चाहती थीं कि मैं केवल सफल न बनूँ बल्कि संवेदनशील रहूँ। वे चाहती थीं कि मैं ऊँचाइयों तक जाऊँ लेकिन जमीन से जुड़ा रहूँ। और आज उनकी स्मृति मेरे लिए वही ज़मीन बन गई है जिसे मैं अपने हर निर्णय, हर रिश्ते, हर कर्म में महसूस करता हूँ।
माँ के जाने के बाद एक बात बहुत स्पष्ट हुई है…प्रेम की कोई अंतिम सीमा नहीं होती। उनका प्रेम आज भी उतना ही जीवित है जितना उनके जीवन में था। अब वो प्रेम मेरी ऊर्जा बन गया है, मेरी सोच का केंद्र, मेरी आत्मा की आवाज़। कभी-कभी लगता है कि माँ अब मुझमें हैं…मेरे विचारों में, मेरी प्रार्थनाओं में, मेरी खामोशी में।
माँ, आप जहाँ भी हैं, जानती होंगी कि आपका बेटा अब अकेला नहीं है। मैं भले ही आपको आख़िरी बार गले नहीं लगा पाया पर अब मैं आपको हर साँस में महसूस करता हूँ। आपने हमेशा मुझे मेरे रास्ते खुद चुनने दिए और आज मैं उसी रास्ते पर चलकर आपके लिए वह सब कुछ पूरा करना चाहता हूँ जो आप मेरे लिए चाहती थीं। आपने कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा लेकिन अब मैं अपने जीवन के हर काम को आपकी स्मृति को समर्पित करना चाहता हूँ।
काश मैं उस एक पल में आपके पास होता, काश मैं आपको रोक सकता, कह सकता कि एक बार रुक जाओ माँ, अभी बहुत कुछ कहना है। लेकिन जो नहीं हो सका, वही अब मेरी साधना बन गया है। मैं जानता हूँ, अब कोई अलविदा नहीं है। यह बिछोह सिर्फ देह का है, आत्मा तो आज भी वहीं है जहाँ आपकी गोद थी…सुरक्षित, शांत, और पूर्ण।
माँ, आपने मुझे जीवन दिया लेकिन उससे भी बड़ी बात है, आपने मुझे जीवन जीना सिखाया। अब इस अधूरे संसार में आपके पूर्ण प्रेम की छाया लिए मैं हर दिन एक नई शुरुआत करता हूँ। हर काम, हर संवाद, हर संवेदना में आप हैं। आपके हर अधूरे सपने को जीना उसे साकार करना है अब मेरे जीवन का लक्ष्य बन गया है….
कोटि-कोटि वंदन मां….
हृदय की कलम से
आपका
धनंजय सिंह खींवसर