रविवार का सदुपयोग- अंश तीसरा

रविवार का सदुपयोग
 
साप्ताहिक सूक्ष्म ब्लॉग | संवाद से परिवर्तन का प्रयास
 
अंश तीसरा
 
आज के ब्लॉग का विषय 
 
राजनीति व्यक्तित्व की ना होकर विचारधारा की होनी चाहिए।
 
“छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता,
टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।
मन हारकर, मैदान नहीं जीते जाते,
न मैदान जीतने से मन ही जीते जाते हैं।”
 
मेरे प्रेरणास्त्रोत श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की रचित इन पंक्तियों में स्वच्छ राजनीति की संपूर्ण व्याख्या की गई है, इन पंक्तियों को आत्मसात कर राजनीतिक परिदृश्य को आसानी से बदला जा सकता है।
 
आमतौर पर यह है देखा जाता है कि राजनीतिक क्षेत्र में काम करने वाले सभी व्यक्ति आमजन के समक्ष अपने-अपने विचार आम जनता के समक्ष सकते हैं और उसके बाद जनता उसे अपने कसौटी पर कसती है और अपना निर्णय सुनाती है, विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की अपनी-अपनी विचारधारा होती है, पार्टी की स्थापना के साथ ही पार्टी की विचारधारा का जन्म होता है और उसके बाद उसी विचारधारा को अपनाते हुए पार्टी राजनीतिक दिशा आगे बढ़ती है किसी भी संगठन की सफलता उसकी विचारधारा पर निर्भर करती है। 
 
विचार व्यक्ति व समाज को आईना दिखाता है और यह विचार ही है जो किसी व्यक्ति या संगठन को खड़ा करता है या रसातल में ले जाता है। व्यक्ति का निर्माण भी विचार से ही होता है और विचार की लड़ाई लड़कर ही व्यक्तियों ने इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाया है, यहां मैं यह जरूर कहना चाहूंगा कि विचारधाराएं भिन्न होती हैं इसलिए मतांतर मान्य है, परंतु किसी भी विचार को इसलिए दरकिनार कर देना कि वो अपने खुद के विचारों से मेल नहीं खाता, इसे लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता है।
 
इसलिए बेहतर समझने के लिए मैं श्रद्धेय श्री अटल बिहारी जी वाजपेयी के जीवन काल से जुड़े एक महत्वपूर्ण जीवन प्रसंग को आपके सामने रखना चाहूंगा
 
70 के दशक के अंत में जब साउथ ब्लॉक से भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का चित्र गायब हो गया लेकिन बाद में तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हस्तक्षेप से इसे फिर से लगाया गया। 
 
विचारधारा की राजनीति के उदाहरण मैंने अपने परिवार में भी कई बार देखे हैं, मेरे दादाजी स्वर्गीय श्री ओकार सिंह जी और स्वर्गीय श्री नाथूराम मिर्धा मध्य केवल विचारधारा को लेकर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जरूर रही होगी लेकिन दोनों के मध्य भाइयों से भी बेहतर संबंध थे और हमेशा क्षेत्र के विकास को लेकर दोनों के बीच मंत्रणा होती थी।
 
वर्ष 2003 में बहुत छोटा था लेकिन 2003 के विधानसभा चुनाव का जिक्र भी मैं आपके समक्ष करना चाहूंगा, 2003 में मेरे पिताजी श्रीमान गजेंद्र सिंह खींवसर जी खींवसर विधानसभा से चुनाव लड़ रहे थे तो उनके सामने कांग्रेस के दिग्गज नेता श्री हरेंद्र जी मिर्धा कांग्रेस से प्रत्याशी थे ,लेकिन जब हरेंद्र जी मिर्धा खींवसर में चुनाव प्रचार के लिए आते थे तो वह हमारे निवास स्थान पर आकर रुकते और मेरे पिताजी आदरणीय गजेंद्र सिंह खींवसर जी और श्री हरेंद्र मिर्धा जी दोनों साथ बैठकर न केवल भोजन करते बल्कि खींवसर क्षेत्र के विकास को लेकर भी चर्चा करते।
 
लेकिन पिछले 10-15 वर्षों में राजनीति क्षेत्र में इसको लेकर काफी कुछ बदलाव हुआ है। खासतौर से नागौर जिले में  राजनीति में विचारधारा की बजाय व्यक्तित्व की लड़ाई नजर आने लगी है, चुनाव में विचारधारा कोई मायने नहीं रखती है व्यक्तित्व की राजनीति हावी होने लगी है, राजनीति में जब से विचारधारा पर व्यक्तिवाद हावी हुआ है तब से भ्रष्टाचार, अहंकार, जातिवाद, जैसी कुप्रथाए भी राजनीति में पैर जमाने लगी है, लेकिन जिस तरह से मैंने कहा कि व्यक्तिवादी राजनीति का सफर ज्यादा लंबा नहीं हो सकता है मुझे उम्मीद है कि निश्चित रूप से आने वाले दिनों में राजनीति का यह स्वरूप जरूर बदलेगा और एक बार फिर विचारधारा के आधार पर राजनीतिक परंपरा की शुरुआत होगी।
 
क्या आप मानते है विचारधारा की राजनीति को खींवसर और नागौर को बहुत जरूरत है?
 
क्या विचारधाराओं की राजनीति से ही खींवसर के मूल्यों की पुर्नस्थापना हो पाएगी?
 
|| भारत माता की जय ||
 
हृदय की कलम से ! 
 
आपका 
 
– धनंजय सिंह खींवसर